संसद की सर्वोच्चता का कितना ख्याल है सांसदों को ?

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प्रमोद भार्गव

संसद की सर्वोच्चता को कौन ठेंगा दिखा रहा है, यह तथ्य अब सार्वजनिक होकर जनमानस में पैठ बनाने लगा है। इसलिए सत्ताधारी और उसके सहयोगी घटक दलों के जो लोग यह दम भरते हैं कि ‘संसद जैसी संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों और विश्वासों को जाने – अनजाने में कम करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए’ उन्हें अब खुद अपने गिरेबान में झांकने की जरुरत है। क्योंकि संसद द्वारा संसद की अवेहलना किए जाने के दो बड़े मुद्दे सार्वजनिक हुए हैं। एक गांधीवादी अन्ना हजारे का अनशन तोड़ने के लिए संसद में पारित वह प्रस्ताव है, जिसे ‘सदन की भावना’ कहकर सदन के दोनों सदनों में सर्मसम्मति से पारित किया गया था। बावजूद संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में तीनों ही मुद्दों को खारिज कर दिया गया। दूसरा है, बहुउद्देश्यीय विशिष्‍ट पहचान पत्र, जिसे बाला-बाला 17 हजार करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान कर सोनिया गांधी के कर-कमलों द्वारा न केवल शुरुआत कराई गई, बल्कि कॉर्पोरेट घराने के नंदन नीलकेणी को इसका मुखिया भी बना दिया गया जबकि इस आधार परियोजना की मंजूरी पहले संसद से लेने की जरुरत थी। अब संसद की स्थायी समिति ने इसे अनुपयोगी बताकर बहुमत से खारिज कर दिया है। ऐसे और भी उदाहरण हैं, जो संसद को भरोसे में लिए बिना देशी-विदेशी कंपनियों के दबाव में सीधे अमल में लाए गए हैं।

अन्ना हजारे का आंदोलन जब से परवान चढ़ा है, तब से सत्तारुढ़ दल इस जुमले का ज्यादा गुणगान कर रहा है कि ‘संसद सर्वोच्च है’। लेकिन अन्ना दो कदम आगे बढ़कर यह वातावरण बनाने में कमोबेश कामयाब रहे कि संसद से भी ऊपर संविधान है और उससे भी ऊपर है जन-संसद। इसलिए अब सांसदों को इस मुगालते में रहने की जरुरत नहीं है कि वे ही देश के आधिकारिक प्रतिनिधि हैं। वे ही विधि-विधानों के निर्माता हैं। हालांकि यह तो पहले से ही स्थापित है कि विधायिका द्वारा प्रस्तावित व पारित जो कानून संविधान सम्मत नहीं है, उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकता है और न्यायालय उन्हें खारिज भी कर सकता है। लिहाजा लोकतंत्र इस दृष्टि से मजबूत हुआ है कि आम नागरिक सांसदों द्वारा उठाए गए गैर-कानूनी कदमों की आलोचना व समीक्षा कर सके।

संवैधानिक दर्जा प्राप्त हमारे सभी दलों के सांसद जन-सरोकारों के प्रति कितने प्रतिबध्द और जवाबदेह हैं, यह सच्चाई तो इसी बात से सामने आ रही है कि शीत-सत्र में किस तरह से संसद की कार्रवाई ठप पड़ी हुई है। क्या करोड़ों मतदाता इसीलिए क्षेत्र और देश की समस्याओं के निवारण के लिए सांसद को चुनता है ? मौजूदा माहौल में देश लोकपाल, मंहगाई, भ्रष्टाचार, कालाधन, परमाणुदायित्व विधेयक, नकली नोटों की भरमार, रुपये की गिरती साख और आत्महत्या करते किसानों जैसी आंतरिक समस्या से सूझ रहा है। वहीं चीन और पाकिस्तान की ओर से गंभीर चुनौतियां निंरतर पेश आ रही हैं। ऐसे दुर्निवार हालात में संसद ठप रखकर हम अवाम को क्या संसेश देना चाहते हैं ? इस समय जनता को जानने के अधिकार के तहत उम्मीद थी कि संसदीय समिति ने लोकपाल का जो मसौदा संसद में पेश किया है, उसके जन-सरोकार क्या हैं ? किंतु इसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति कहें या हमारे सांसदों की नसमझी कि वे लोकपाल कितना प्रभावी है, इस पर चर्चा करने की बजाए अन्ना और सरकार जैसा लोकपाल चाहते हैं, वैसा है अथवा नहीं, इसे सिध्द करने में लगे हैं। यही स्थिति संसद और उसकी समिति की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठाती है ? यह कितनी हैरत में डालने वाली बात है कि पिछड़े दलित और मुस्लिम सांसदों का एक समूह लोकपाल भ्रष्टाचार मिटाने की दृष्टि से कितना सार्थक साबित होगा, इस पर बहस करने की बजाए लोकपाल के चयन में आरक्षण देने की मांग के प्रति ज्यादा प्रतिबध्द दिखाई देते हैं। जबकि संविधान में प्रदत्त आरक्षण-प्रावधानों के तहत पचास फीसदी आरक्षण की सुविधा स्वमेव प्रक्रिया का हिस्सा बनना तय हैं। क्या इन सांसदों से पूछा जा सकता है कि उदारीकरण के दौर में यही ये सांसद देशी-विदेशी कंपनियों में भी आरक्षण का प्रावधान तय हो, इस नाते क्यों नहीं दिखाते ? कंपनियों के अधिनायकवादी चरित्र पर अंकुश लगे, इस हुतु इन कंपनियों को भी लोकपाल के दायरे में लाने की मांग क्यों नहीं पुरजोरी से उठाते ? जाहिर है, हमारे ज्यादातर सांसद अपने उत्तरदायित्वों के प्रति जागरुक नहीं हैं ?

संसद की गरिमा और सर्वोच्चता के प्रति हमारे सांसद कितने गंभीर व जागरुक हैं, यह आधार परियोजना के अंतर्गत बनाए जा रहे विशिष्ट पहचान पत्र को सीधे अमल में लाए जाने से भी साबित होता है। इसका संसद में कोई मसौदा पेश किए बिना ही सोनिया गांधी ने इसकी शुरुआत कर दी। यही नहीं कार्पोरेट घराने के मुख्य कार्यपालन अधिकारी नंदन नीलकेणी को सीधे इसका मुखिया बनाकर 17 हजार करोड़ की बड़ी धनराशि भी सौंप दी गई। अब संसदीय समिति ने आधार की अवधारणा को ही खारिज कर दिया। इसे राष्ट्रीय नागरिकता की दृष्टि से भी खतरा बताया जा रहा है। क्योंकि इसमें किसी भी राजपात्रित अधिकारी से पहचान का प्रमाण-पत्र लेकर, परिचय-पत्र देने का प्रावधान है। इससे बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारतीय नागरिकता मिल जाने की आशंका जताकर आधार परियोजना को तत्काल खारिज करने की वकालात संसदीय समिति ने की है। सुरक्षा एजेंसियां भी इस परियोजना का विरोध कर रही हैं।

इसी तर्ज पर राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया मामलों पर निगरानी रखने के लिए नेशनल इंटेलिजेंस की मंजूरी केंद्रीय मंत्रीमंडल की समिति ने दे दी। यही नहीं, राष्ट्रीय अस्तित्व व संप्रभुता से जुड़े इस नैटग्रिड का प्रभार भी महिंद्रा सोशल समूह के निदेशक रह चुके कैप्टन रघुरमन के सुपुर्द कर दिया गया। हैरानी है कि नैटग्रिड को वजूद में लाने से लेकर उसकी जिम्मेदारी रघुरमन को सौंपने तक न तो संविधान की सैध्दांतिकता की परवाह की गई और न ही संसद की सर्वोच्चता की ? यह अविश्वास किसके प्रति ? हैरानी है इस मामले में भी सांसदों ने अपनी प्रासंगिकता के प्रति कोई जागरुकता नहीं दिखाई ?

कॉर्पोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया संसद की सर्वोच्चता को ठेंगा दिखाकर ए-राजा को संचार मंत्री बनवा लेती हैं और फिर स्पेक्ट्रम आबंटन में भी अपना दबदबा कायम रखकर पौने दो लाख करोड़ का घोटाला कराने में शिरकत करती हैं और संविधान व संसद की सर्वोच्चता धरी की धरी रह जाती है।

यह कौन नहीं जानता कि देश की संप्रग सरकार अमेरिका के दबाव में संसद की उपेक्षा कर लगातार अमेरिका के हित साधने में लगी है। मुरली देवड़ा को पेट्रोलियम मंत्री अमेरिका के दबाव में बनाया गया। अमेरिका के दबाव में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के हितैषी रहे देश ईरान के खिलाफ मतदान किया गया। परमाणु करार के समय डॉ मनमोहन सिंह ने अपनी कुर्सी तक अमेरिकी हित पूर्ति के लिए दांव में लगा दी थी। प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश को भी थोपने की कोशिश की गई। ममता बनर्जी यदि समर्थन वापिसी की धमकी नहीं देतीं तो एफडीआई की मंजूरी तय थी। क्या ये मामले संसद की अवहेलना नहीं करते हैं ?

सांसद अपनी जिम्मेबारियों के प्रति कितने सजग हैं, इसका खुलासा राज्यसभा में इसी शीत सत्र के दौरान किसानों के संकट पर हुई चर्चा के समय देखने में आया। राज्यसभा के कुल 245 सांसदों में से महज 50 सांसद सदन में हाजिर थे। इनमें से भी कई सांसद अपना संबोधन देने के बाद सदन छोड़कर चलते बने। देश के सांसद न तो अन्नदाता के हितों के प्रति चिंतित हैं और न ही अपने दायित्वों के प्रति ? इसीलिए सरकार बाला – बाला रासायनिक खादों और बीजों में दी जाने वाली 2010-11 के बजट में 20 हजार करोड़ की कटौती कर देती हैं, वहीं दूसरी तरफ कॉर्पोरेट जगत को 88 हजार 263 करोड़ रुपये की विभिन्न करों में छूट दे देती है और देश की संसद मौन बनी रहती है ? संसद की यह चुप्पी जताती है कि सांसद अपनेर् कत्तव्यों के प्रति कितने सचेत हैं और उन्हें संसद की सर्वोच्चता का कितना ख्याल है ?

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