कुबड़ी आधुनिकता

-दीप्ति शर्मा-  poem

मेरा शहर खांस रहा है

सुगबुगाता हुआ कांप रहा है
सडांध मारती नालियां
चिमनियों से उड़ता धुआं
और झुकी हुयी पेड़ों की टहनियां
सलामी दे रहीं हैं
शहर के कूबड़ पर सरकती गाड़ियों को,
और वहीं इमारत की ऊपरी मंजिल से
कांच की खिड़की से झांकती एक लड़की
किताबों में छपी बैलगाड़ियां देख रही हैं
जो शहर के कूबड़ पर रेंगती थीं
किनारे खड़े बरगद के पेड़
बहुत से भाले लिये
सलामी दे रहे होते थे।
कुछ नहीं बदला आज तक
ना सड़क के कूबड़ जैसे हालात
ना उस पर दौड़ती /रेंगती गाड़ियां
आज भी  सब वैसा ही है
बस आज वक़्त ने
आधुनिकता की चादर ओढ़ ली है ।

2.दमित इच्छा

 

इंद्रियों का फैलता जाल
भीतर तक चीरता
मांस के लटके चिथड़े
चोटिल हूं बताता है
मटर की फली की भांति
कोई बात कैद है
उस छिलके में
जिसे खोल दूं तो
ये इंद्रियां घेर लेंगी
और भेदती रहेंगी उसे
परत दर परत
लहुलुहान होने तक
बिसरे खून की छाप के साथ
क्या मोक्ष पा जायेगी
या परत दर परत उतारेगी
अपना वजूद / अस्तित्व
या जल जायेगी
चूल्हे की राख की तरह
वो एक बात
जो अब सुलगने लगी है।

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