लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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– पंकज झा

एक लोकोक्ति है ‘जब दो बैल आपस में लड़ते हैं तो नाहक फसल खराब होता है’. शायद सांड के बदले बैलों का कहावत में उपयोग इसलिए किया गया है क्योंकि बैल से यह अपेक्षा की जाती है कि उसके मेहनत का उपयोग पैदावार बढाने में हो. उसके ऊर्जा का अनावश्यक इस्तेमाल करने के बदले हल चलवा कर शस्य श्यामला भूमि की हरियाली कायम रखी जाय. नेताओं से भी ऐसे ही ‘हल’ तलाशने की उम्मीद ही की जाती है. गैरज़रूरी कोला-हल कर नफरत के फसल को बढावा देना कहीं से भी उचित नहीं है. ऐसे किसी भी विमर्श में अंततः हला-हल जनता के हिस्से ही आता है. बात अभी मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह और मुख्यमंत्री रमन सिंह के बीच बहस की हो रही है. लोकतंत्र पर आये इस सबसे बड़ी चुनौती जिसे नक्सलवाद कहते हैं, में दिखना तो यह चाहिए था कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियां एक साथ कदमताल कर रही है. तरीके से मामला नक्सलवाद बनाम लोकतंत्र का होना चाहिए था. लेकिन अनावश्यक ढंग से इसको कांग्रेस बनाम बीजेपी का मामला बनाने का प्रयास किया जा रहा है. इस मामले में आप भरोसे के साथ दोष इस बहस को शुरू करने वाले दिग्विजय सिंह को ही दे सकते हैं. निश्चय ही उन जैसे नेता का अपने ही पार्टी के खिलाफ या फिर नक्सलवाद के पक्ष को मज़बूत करने वाला कुछ भी लिखना माफ तो नहीं ही किया जा सकता.

हाल तक एक बड़े पुलिस अधिकारी और कथित नक्सली प्रवक्ता के बुद्धि विलास से बड़ी मुश्किल से मुक्ति मिली थी छत्तीसगढ़ को. हालाकि उस बहस के बाद भी पुलिस अधिकारी के छपास का जो दौर चलता रहा वह अंततः 76 शहीदों के काल-कवलन के बाद भी नहीं रुका. पहले तो पुस्तकालयों में सड़-गल गए, दीमकों का शिकार होने से बमुश्किल बच गए मार्क्स के पन्नों को खोज-खोज कर निकाला गया. उसका रंग-रोगन कर दोनों पक्षों द्वारा अपनी-अपनी शेखी और ज्ञान बघारने के लिए जम कर उपयोग किया. और बात जब उससे भी नहीं बनी तब शुरू हो गया इस भयंकर मुद्दे पर ‘विचार’ के बदले समाचारों की कमेंट्री. 20-20 क्रिकेट के तर्ज़ पर ही ‘इंडियन पुलिस लीग’ के समाचारों से पन्ने-के-पन्ने रंगे जाने लगे. बस फलाने तारीख को हमला हो जाएगा. अब यहां तक पहुच गयी है फौज. कथित ग्रीन हंट फलाने दिन से शुरू, आदि-आदि. खैर…ऐसा कोई हमला ना होना था ना हुआ. जब हुआ भी तो इकतरफा नक्सलियों के तरफ से और देश के 76 जवानों की शहादत हो गयी. और उसके बाद फिर बीजापुर में आधा दर्ज़न जवानों की शहादत. लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा खिलवाड यह कि अपने ही गृह मंत्री द्वारा “सेना का उपयोग करने सम्बंधित” बयान का पुलिस अधिकारी द्वारा खंडन कर तो ऐसा लग रहा है मानो इस प्रदेश में तमाम लोकतांत्रिक मर्यादाओं की ही धज्जियां उडाई जा रही है….! बहरहाल.

लेकिन इन शब्द्युद्धों से भी ज्यादे आपत्तिजनक है, और बड़े लोगों द्वारा ‘मोर्चा’ सम्हाल लेना. वैसे रमन सिंह को ज़रूर इस मामले में दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि जब ऐसे-ऐसे हादसे पर भी दिग्विजय जैसे लोग अपनी गंदी राजनीति करने से बाज़ नहीं आते तो किसी का खून खौलना स्वाभाविक है. कहते हैं ‘अति संघर्षण कर जो कोई अनल प्रगट चंदन ते होई’. सामान्यतः अपने धैर्य एवं भलमनसाहत के लिए जाने-जाने वाले रमन सिंह भी अगर लेख में वर्णित “बौद्धिक बेईमान” या ऐसे कटु शब्दों का इस्तेमाल करने पर मजबूर हुए हैं तो इस अभागे प्रदेश को उसके हालत में पहुचाने के जिम्मेदार पूर्व मुख्यमंत्री के करतूत को समझा जा सकता है. जैसा कि सब जानते हैं कि नेताओं की खाल मोटी हुआ करती है. लेकिन दिग्विजय का यह बयान कि बस्तर का विकास ना होना या उसकी उपेक्षा होना नक्सलवाद के लिए जिम्मेदार है, या यह कि यह क़ानून व्यवस्था का मामला है. ऐसे शब्दों का इस्तेमाल उस राज्य के खिलाफ करना जिसका वो खुद आधे से ज्यादा दशक तक मुख्यमंत्री रहे हों. या फिर अपनी ही पार्टी के गृह मंत्री को अक्खर या घमंडी कहना वास्तव में बेशर्मी की हद है. ऐसी हद है जिसका कोई सानी नहीं. शायद चिकित्सकों को दिग्विजय के चमड़ी की जांच करनी चाहिए कि आखिरकार वह भी सामान्य कोशिका या उसके समूह उत्तकों से ही बनी है या उसके लिए कोई अन्य धातु इस्तेमाल किया गया है.

यह देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि आदिवासी इलाकों में फैले नक्सलवाद का सबसे बड़ा कारण इन क्षेत्रों का शोषण, अनियंत्रित दोहन एवं यहां के संसाधनों से भोपाल और दिल्ली को गुलज़ार कराना रहा है. साथ ही साथ सरकारी संरक्षण में व्यापारियों द्वारा किया गया लूट-खसोट तो जिम्मेदार है ही. आखिर मध्य प्रदेश से अलग कर एक नए राज्य बनाने का कारण ही तो यही था कि अब कम से कम यहां के संसाधनों का, यहां के माटी पुत्रों के हित में उपयोग किया जायगा. अगर दिग्विजय की यह बात सही भी हो कि पहले के मुकाबले अब नक्सल हिंसा में काफी वृद्धि हुई है तो सीधी बात यह है कि पहले नक्सलियों को कोई चुनौती नहीं थी. दिग्विजय के राज में या उससे पहले के कांग्रेसी सल्तनत में मोटे तौर पर महाभारत के उस कथानक की तरह जिसमें गांव वालों ने राक्षस से समझौता किया था उसके लिए कुछ नरमुंड और अन्य संसाधन उपलब्ध कराते रहेंगे. ऐसा ही अघोषित समझोता जैसा यहाँ भी था कि इस नक्सल नामधारी नए राक्षसों को कोई चुनौती नहीं देंगे. और उसके बदले नागरिकों के जान और उनकी कुर्सी सलामत रहेगी. अब लोकतंत्र रूपी ‘भीम’ का इन अमानुषों से सामना हुआ है. तो नक्सलियों का बौखलाना अस्वाभाविक नहीं है. उनका हिंसा पर हिंसा करना कोई अप्रत्याशित बात नहीं है. इस हिंसा को ‘दीये के बुझने से पहले की चमक’ कहा जा सकता है.

हां अगर अप्रत्याशित कुछ है तो दिग्विजय सिंह समेत सभी कलाम्वीरों का आलेख या अन्य बयान. जाहिर सी बात है कि दिग्विजय जैसे छत्तीसगढ़ के गुनहगारों सि ऐसे मामले पर कम से कम चुप रह जाने की अपेक्षा तो की ही जा सकती है. खास कर यह तय है कि अब एक अन्य प्रदेश के प्रभारी और अपने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री के साथ-साथ कांग्रेस के महासचिव होने के कारण पेट भरने लायक काफी कुछ है उनके पास. अगर छत्तीसगढ़ को उनसे छीन भी लिया गया है तब भी राजनीतिक भुखमरी की नौबत तो नहीं ही है उन्हें. लेकिन वह नेता ही क्या जिसकी लिप्सा का अंत हो जाय ! आखिर ‘ययाति’ ने ही तो फिर से धरती पर इन जैसे लोगों के रूप में जनम लिया है. दिग्विजय सिंह से यह अनुरोध किया जाना उचित होगा कि कृपया अब छत्तीसगढ़ को बक्श दें. सत्ताधारी बीजेपी के अलावा उनकी पार्टी के भी बहुत लोग हैं यहां जो इस प्रदेश की चिंता कर सकते हैं. यह प्रदेश आराम से श्री सिंह के बिना भी ज़िंदा रह सकता है. साथ ही रमन सिंह से भी यह अनुरोध किया जा सकता है कि वह भी अपना मूल काम करें. अच्छा प्रशासन दें. नक्सलियों से मुक्ति हेतु रणनीति बनाए और उसका अमल करवायें. लेखों द्वारा छत्तीसगढ़ का पक्ष रखने वालों की कमी नहीं है इस प्रदेश में.

हां…बड़े नेता भले ही नूराकुश्ती कर रहे हो. लेकिन सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने ज़रूर अपनी बुद्धिमत्ता और सरोकारों से देश-प्रदेश और लोकतंत्र को गौरवान्वित ही किया है. वास्तव में उम्मीद सबसे ज्यादा इन आम लोगों पर ही है. हाल ही में तमाम राजनीतिक मतभेदों को भुला कर बीजेपी और कांग्रेस समर्थित छात्र संगठनों ने जेएनयू के देशद्रोही लफंगों से लेकर रायपुर, बस्तर और दांतेवाडा तक बुद्धिजीवियों तक का सामना किया है. उससे यह स्थापित हुआ है कि मामला ‘बीजेपी बनाम कांग्रेस’ का नहीं बल्कि ‘लोकतंत्र बनाम नक्सलवाद’ का है. देश के मुख्यधारा के छात्रों की इस मामले में जितनी तारीफ़ की जाय कम है. यही वो लोग हैं जो देश को हर चुनौतियों से सामना करने का बल प्रदान करेंगे. यही लोग देश की ताकत भी है. यही लोग यह उम्मीद भी जगाते हैं कि देश में ‘लोकतंत्र’ कायम रहेगा, जेएनयू, नक्सलियों और दिग्विजय सिंह के बावजूद भी.

7 Responses to “दो सिंहों की लड़ाई में मेमना बनता छत्तीसगढ़”

  1. Amba Charan

    Naxalwad aur maovaad se ladai ek raashtriya samasya hai. Par museebat yeh hai ki hmare neta ise raajnaitik ladai bana rahe hain. Woh is se rajnaitik aur chunavi laabh uthaana chahte hain. Yadi Congress party ne aaj tak in samasayon per rashtriya hit ko dhyan mein rakh kar kaam kiya hota to aaj yeh samasyen hoti hi nahin.

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  2. अनिल सौमित्र

    अनिल सौमित्र

    मि़त्रवर,
    सवाल असली और नकली सिंहों का नही है। सवाल गद्दारों और देशघातियों का सही-सलामत बचे रहने का है। कांग्रेस में अकेले वही नहीं हैं, और भी राजघरानों के वारिस हैं। तब राजा और सामंत के रूप में और अब गद्दार और देशघाती नेता के रूप में देश और समाज का सत्यानाश कर रहे हैं ये नेता।
    अब तो ये बात किसी से छुपी नहीं है कि दिग्विजय सिंह का नक्सलियों-माओवादियों से संपर्क और राजनैतिक ताल-मेल रहा है। उनके जमाने में उनके अत्यन्त प्रिय नौकरशाह और मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यसचिव शरद्चन्द्र बेहार पर कांग्रेस के ही कई नताओं ने नक्सलियों से संबंध का आरोप लगाया था। हर बार चुनाव के पूर्व यही अधिकारी नक्सलियों और कांग्रेसियों की चुनावी ताल-मेल का ताना-बाना बुनता था।
    पंकज झा ने ठीक ही लिखा है। प्रदेश के पुलिस प्रमुख ही माक्र्स और माओ के तराने गायेंगे तो उनसे निबटेगा कौन!
    चिदंबरम-सोनिया-दिग्विजय काहे की जुगलबंदी कर रहे हैं। इससे तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों-चर्च और नक्सलियों से संबंध और उसी के प्रभाव में बयानबाजी का आरोप और पुख्ता ही होगा। क्यों नक्सल-माओ प्रभावित राज्यों में सुरक्षा बलों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। चिदंबरम-सोनिया-दिग्विजय क्यों नहीं नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों, अरुंधति, महाश्वेता और मेधा के साथ इन इलाकों में विकास को मोर्चा संभाल लेते! तब तक नक्सल विरोधी अभियान जिसे कुछ लोग ग्रीनहंट कह रहे हैं रोक दिया जाये। जंगल में मारे जा रहे जवानों को भी सुकून मिलेगा। अगर ऐसा नहीं हो सके तो नक्सली-माओवादी विरोधी लोग अब सीधे इन गद्दारों और देशघातियों को बेनकाब करने के लिए मोर्चा संभालें। सिर्फ सुरक्षा बलों के भरोसे ये नक्सली-माओवादी नहीं छोडे़ जा सकते।

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  3. Sanjay Ramakant

    Pankaj..bahot bahot badhaaiyaan.. Zaroor yeh chamdi kisi dhaatu ki hi hogi.. Lekin jinkeliye sab kuchh vote hi hain.. unhe Desh ki pukaar sunaayi de to kaise.. Diggi Raja se poochhnaa hogaa ki aur kitni bali leneke baad khaamosh baithenge..

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  4. manoj

    bhaiya carl marks aur indian police liege jabardast hai. chhattisgarh me ye sabse dukhdayi hai ki har badi vardat ke bad HOME aur PHQ aamne samne ho jate hai. aisa lagta hai ki apni ladai khatma kar le to kuchh sochenge. diggi raja ko bhi yah yaad rakhna chahiye ki unke bad chhattisgarh congress ke hatho me thi. BJP to kuchh kar rahi hai unhone kya kiya pahle ye tay kar le

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  5. Jeet Bhargava

    छत्तीसगढ़ कभी मेमना नहीं बनेगा. यह एक परिपक्व प्रदेश है और दिग्गी राजा जैसे नकली सिंहो को मुंहतोड़ जवाब देगा.

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  6. Jeet Bhargava

    दिग्विजय भारतीय राजनीति का वह…चेहरा है जो वोट के खातिर देश वासियों के जान-माल को सूली पर चढाने को बेताब रहता है. नक्सलवाद इन्ही दिग्गी राजा के निकम्मेपन के कारण पैदा हुआ है. और उनकी बेशर्मी ही कहा जाएगा की अब वह उसे सुलझाने की बजाय रमण सिंह जैसे प्रतिबद्ध ‘सिंह’ पर दोषारोपण करके अपनी राजनीति चमका रहे हैं. वह कभी आजमगढ़ जाकर जेहादियों के वहा सिजदा करते हैं तो कभी नक्सलवाद के हिमायती बनाकर उसकी वकालात करते हैं. देश की ज्यादातर समस्याओं को पैदा करने में दिग्विजय जैसे लोगो का हाथ है. इनके लिए सत्ता ही अंतिम लक्ष्य होता है. दिग्विजय को सिंह कहना सम्पूर्ण क्षत्रीय, राजपूत और सिंह जाती का अपमान है. और ऐसे नकली सिंह जयचंद की परम्परा के वाहक हैं.
    हमेशा की तरह आपके एक अच्छे और धारदार लेख के लिए साधुवाद.

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  7. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    पंकजजी धन्यवाद।सही राष्ट्रवादी विचार रखे हैं। कांग्रेस और भा ज पा इसमें साथ दे, यह सहकारका समय है। “वयं पंचादिकम्‌ शतम्‌” का परिचय दे। नक्सली – विचार धारा, बंदूककी नली के हिंसात्मक शक्ति में विश्वास रखती है। अराजकता से ही क्रांति होनेमें विश्वास रखती है।
    इसलिए, और साथमे आदिवासी क्षेत्रोमे कुछ संकेतात्मक हि सही, पर कुछ सक्रिय-दीखे जैसे, चलते फिरते दवाखने इत्यादि , शीघ्रतासे अमल हो सके ऐसे, प्रकल्प घोषित करे- प्रारंभ करें।
    नरेंद्र मोदीके इ-गवरनन्स का अनुभव बहुत अच्छा है। परामर्श करें।

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