नेता, नीति, नीयत और नियति

0
520

संसद का काम नीति बनाना है; पर ये नेताओं की नीयत पर निर्भर है। चूंकि नेता, नीति
और नीयत के मेल से ही नियति का निर्माण होता है।
महाराजा दशरथ बड़े प्रतापी सम्राट थे; पर बुढ़ापे में चार पुत्र पाकर उनका मन राजकाज
से उचट गया। अतः रावण जैसे राक्षस उपद्रव करने लगे। इस ओर ध्यान गया ऋषि
विश्वामित्र का। उनके आश्रम में पठन-पाठन ही नहीं, अस्त्र-शस्त्रों का प्रशिक्षण और
अनुसंधान भी होता था। अतः राक्षस उनके काम में बाधा डालते थे। विश्वामित्र स्वयं
राक्षसों को मार सकते थे; पर वे देश को एक नीतिवान नेतृत्व भी देना चाहते थे। इसके
लिए उनकी दृष्टि राम पर गयी।
विश्वामित्र जानते थे कि दशरथ का मन कमजोर है। अतः उन्होंने कुलगुरु वशिष्ठजी को
विष्वास में लिया। इससे राम-लक्ष्मण उन्हें मिल गये। उन्हें विश्वामित्र ने नये आयुधों का
प्रशिक्षण दिया। निर्धन, निर्बल और पीडि़तों के लिए उनके मन में संवेदना जगायी। राम
और सीता का विवाह कराया, जिससे तत्कालीन दो प्रबल साम्राज्य रिश्तेदार बन गये।
अर्थात विश्वामित्र की नीति और श्रीराम की नीयत से देश की नियति निश्चित हुई।
भारत में आजादी के बाद कई ऐसे निर्णायक क्षण आये; पर नेतृत्व नीतिविहीन था।
1947 में लोग नेहरुजी के दीवाने थे; पर अंग्रेजी संस्कारों में पले-बढ़े नेहरू लकीर के ही
फकीर बने रहे। 1971 में बंगलादेश निर्माण के बाद इंदिरा गांधी के पास भी ऐसा ही
मौका था; पर सत्ता की भूख और संजय को अपना वारिस बनाने के चक्कर में उन्होंने
आपातकाल लगा दिया। पंजाब में उन्होंने हिन्दुओं और सिखों में दरार डाल दी। 1984 में
राजीव गांधी को लोकसभा में 404 सीट मिली; पर वे श्रीलंका में उलझ गये तथा बोफोर्स
का कलंक लगवाकर सत्ता से बाहर हो गये।
कांग्रेस और कांग्रेसियों के लम्बे शासन के बाद राजनीति बदली। अटल बिहारी वाजपेयी
और लाल कृष्ण आडवाणी इस समय के दो प्रमुख चेहरे थे; पर संसद में उनके पास पूर्ण
बहुमत नहीं था। उन्हें बार-बार दल और दिलबदलू नेताओं का सहारा लेना पड़ता था।
अतः नीति और नीयत होते हुए भी वे कुछ खास नहीं कर सके।

पर अब नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का युग है। लोकसभा में भा.ज.पा को पूरा बहुमत
प्राप्त है। राज्यसभा में भी ऐसी स्थिति बन रही है। अधिकांश राज्य भगवामय हैं। उधर
कांग्रेस मरणासन्न है। वहां नीति और नीयत तो दूर, कोई नेता ही नहीं है। ऐसे में मोदी
और शाह पर अब भा.ज.पा. के दावों और वादों को पूरा करने का दारोमदार है।
जहां तक मोदी-नीति की बात है, तो पहली बार पाकिस्तान के घर में घुसकर उसे मारा
है। चीन को भी डोकलाम से पीछे हटना पड़ा। टंªप हों या पुतिन, सबसे मोदी ने अच्छे
और सार्थक संबंध बनाये हैं। यहां तक कि अरब देशों में नये मंदिर बन रहे हैं। इधर देश
में अमरनाथ यात्रा शांति से हो रही है। कश्मीर के पत्थरबाज चुप हैं। वहां की हलचल से
लगता है कि अनुच्छेद 370 और 35 ए पर कुछ ठोस निर्णय जरूर होगा। इससे सब
नागरिकों के लिए वहां रहने उद्योग खोलने का रास्ता बनेगा। अतः आम लोगों की
आर्थिक स्थिति सुधरेगी।
तीन तलाक की तलवार न जाने कब से मुस्लिम महिलाओं के सिर पर लटकी थी। कई
मुस्लिम देश इस कुप्रथा से मुक्त हो चुके हैं; पर भारत में मुस्लिम वोट के लालची नेता
और दल इसे सीने से चिपकाए रहे। अब सरकार ने तीन तलाक विरोधी नियम दोनों
सदनों में पारित करा लिया है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही यह कानून बन जाएगा। वह
दिन मुस्लिम महिलाओं के लिए सचमुच ‘मुक्ति दिवस’ होगा।
पर काम अभी बहुत बाकी है। अब प्रतीक्षा है समान नागरिक संहिता, गोवंश की संपूर्ण
रक्षा, भारतीय भाषाओं का उत्थान, अल्पसंख्यकवाद की समाप्ति, पाकिस्तान का
पुनर्विभाजन, घुसपैठियों को देशनिकाला, कश्मीरी हिन्दुओं की घरवापसी और बहुप्रतीक्षित
श्रीराम मंदिर के निर्माण की।
देश को लम्बे समय बाद ठोस नीति और सही नीयत वाले नेता मिले हैं। भगवान चाहेगा,
तो देश की नियति भी स्वर्णिम होगी, यह विष्वास है।

  • विजय कुमार, देहरादून

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

17,123 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress