लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

Posted On by &filed under राजनीति.


 सिद्धार्थ शंकर गौतम

वर्तमान में राजनीति जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को हल करने की बजाय भोग-विलासिता का साधन मात्र बन गई है| राजनीति के गुण-दोषों में दोष की अतिरेकता अधिसंख्य हुई है| फिर नेता भी अब वैसे नहीं रहे| अन्ना, रामदेव, केजरीवाल के नेताओं-सांसदों के प्रति कहे अपमानजनक बयानों पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले नेताओं में क्या इतना नैतिक साहस है कि वे स्वयं को आरोपमुक्त करने हेतु तार्किक दृष्टि से स्वयं पर उठाये गए आक्षेपों का जनअदालत में जवाब दे सकें? शायद नहीं| विचारधाराओं के विघटन तथा नेताओं में लुप्तप्रायः होती जा रही मानवीय संवेदना अब उन्हें स्वार्थ-सिद्धि की ओर ले जा रही है| ज़रा दृष्टिपात कीजिए, आज देश में एक भी ऐसा नेता है जो राममनोहर लोहिया के समाजवाद की अवधारणा को पल्लवित करता नज़र आता हो या राजनारायण की भांति चने-चिवड़े खाकर दिनभर जनता के बीच उनकी सेवा करता हो या अंबेडकर तथा कांशीराम की भांति दलित वर्ग एवं समाज के निम्नतम तबके की खुशहाली और छुआछूत से रहित समाज की कल्पना को साकार करता नज़र आता हो| महात्मा गाँधी को आदर्श मानने वाले तथा उनके सिद्धांतों को आत्मसात करने वाले कितने ही नेताओं ने सरेआम गांधीवाद की हत्या की है| मात्र सत्ता शीर्ष तक पहुंचना परम धर्म मानने वाले नेताओं की बदौलत जनता में राजनीति को लेकर नकारात्मक भाव घर कर गए हैं| मैंने कई बार अपने संगी-साथियों को बोलते सुना है है कि राजनीति ने इस देश को बर्बाद कर दिया है| क्या यह सही है? राजनीति मात्र एक अवधारणा है, एक विचार है; वह किसी को क्या कर गंदा करेगी किन्तु धन्य हैं हमारे माननीय जिन्होंने जनता की सोच को कुंठित कर उसे सीमित कर दिया है| घृणित कार्य नेता करें और नाम बदनाम हो राजनीति का, अजीब विडंबना है|

खैर भाषणबाजी से इतर मुख्य मुद्दे पर आता हूँ| हाल ही में पता चला है कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने से पहले मुख्यमंत्री निवास की चिंता से ज्यादा पूर्व मुख्यमंत्री निवास १३ माल एवेन्यू वाले घर की चिंता की और उसकी मरम्मत में १०० करोड़ रुपये खर्च किए| स्वयं को दलित की बेटी एवं दलितों का अघोषित मसीहा घोषित करने वाली मायावती के लिए जनता की खून-पसीने की कमाई की कोई कीमत नहीं बची शायद तभी महज १०० करोड़ रुपये की राशि उनके मायावी महल के लिए खर्च भी कर दी गई| जिस बंगले की साज-सज्जा एवं मरम्मत हुई है वह बंगला मायावती तब मिला था, जब वह १९९५ में पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं| २००७ में जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं, तब इसका रेनोवेशन शुरू हुआ लेकिन काफी काम उनके मुख्यमंत्रित्व काल के खत्म होने पर हुआ| यह बंगला ५ एकड़ में बना है और इसकी २० फीट ऊंची चारदीवारी राजस्थान सैंडस्टोन से बनी है| पहले यह केवल २.५ एकड़ का प्लॉट था किन्तु मायावती ने मुख्यमंत्री रहते हुए बगल के प्लॉट पर बने गन्ना कमिश्नर ऑफिस को ढहा कर इसमें जोड़ दिया| ख़ास बात तो यह है कि मायावती का बाथरूम दर्जनों बार दोबारा बनाया गया| बंगले के सभी कमरों में पिंक इटैलियन मार्बल फ्लोरिंग है क्योंकि यह मायावती का पसंदीदा रंग है|

यदि मायावती ने अपने बंगले की मरम्मत सत्ता जाने के बाद की तो समझा जा सकता है कि हमाम में सभी नंगे है| जो थोडा बहुत दोषारोपण होता भी है वह जनता को मूर्ख बनाने हेतु काफी है| एक ऐसे देश में जहां आज भी सैकड़ों की तादाद में लोग खुले में जीवन-यापन करने को मजबूर हों वहां बहन जी के लिए बनाया गया बाथरूम दर्ज़नों बार सिर्फ इसलिए तोडा जाता है कि वह उन्हें पसंद नहीं आया| फिर मायावती ही क्यूँ, पूर्व में जयललिता, करूणानिधि, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और भी न जाने कितने नाम; जनता की गाढ़ी कमाई पर ऐश करने वाले नेताओं की फेरहिस्त को लंबा कर रहे हैं| इसे हमारा सौभाग्य कहिये या दुर्भाग्य; नेताओं की कारगुजारियों एवं शानों-शौकत रहन सहन ने देश की जो दुर्गति की है, उसकी आत्मा पर जो ज़ख्म दिए हैं उसकी भरपाई शायद ही संभव है|

One Response to “नेताओं की झूठी शान और देश की दुर्गति”

  1. yamuna shankar panday

    is desh ka netratv hi eise logon ka hia ki vah matr pahale apna ghar bharata hai fir bad me dusare ki sochata hai . Pt. jawahar lal ke jamane se hi is khaj ko badhane diya gaya, srimati gandhi ne bhi isako samapti ki or adhik dhyan nahi diya ! ek din jaldi ane wala hai jab janta road par aa kar ek-ek neta ko chun-chun kar maregi tabhi isaka ant nazar ata hai , aur koi vikalp hai nahi// neta itane dhurt hai ki inako kuch bhi kaho kitane bhi bhrshta chari हों उन्हें high lighi ho jane se vah apni khyati samajhate hain ! aur dubara aur adhik bhrashtachar karate hai abhi sunane me aya tha ki ek mantri 2 karod ki kurshi me baithata hai, usaki belt hi 5 lakh se upar ki hai!! ab batao ki jis desh ki janta ek tihai bhukh se marati ho vahan ka manri ek belt hi lakhon ki pahanata ho kahan tak uchit kaha ja sakata hai !! aaj ke netrtv me vah samvedana , udarata uchchparampara uchchadarsh , nahi milate to inhen desh me rahane ka koi adhikar nahi hai ! atah janatako chahie inakoab maar hi dena chahie???bharat ke pas ab koi vikalp nahi raha! aur na hi yah neta sudharane wale hain , sudharane ka avshar samapti ki o r hai!??? ek oor bhrsht netaon ki akut sampatti jo bhrshacharan dwara jama ki gai , aur ek ganv ka garib, ya to inaki sampattti desh hit me jabt ho ya desh nikala ho dand kathor chunana hoga!!

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *