लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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 पंडित सुरेश नीरव

पांव छूना हमारी संस्कृति के प्राण हैं। और पांव छूना और छुलवाना हमारी सनातन-शाश्वत सांस्कृतिक गतिविधि है। पद,प्रमोशन, पुरस्कार,प्रतिष्ठा नाना प्रकार की उपलब्धियां हमें पांव छूने से ही प्राप्त होती हैं। सैंकड़ों टाटा और बाय-बाय पर एक अदद पांव छूना हज़ार गुना भारी पड़ता है। आज के जीवन-संग्राम में जो चरण स्पर्श के हथियार से लैस नहीं है उसके पांव क्या उखड़ेंगे जो कभी जम ही नहीं पाते। इसीलिए अपनी चादर से ज्यादा पांव फैलानेवाले हमेशा पैर पटकते ही रह जाते हैं। कामयाबी के इतिहास में वही बड़ा है जो अपने पैरों पर खड़ा है। लड़खड़ाते-थरथराते और कांपते पाववालों का कभी कोई इतिहास नहीं होता है। और अपने पांव पर खड़े होने की ताकत भी वही पाता है जो खुशी-खुशी अपने आका की लातें खाता है। ऐसे दुर्दांत चरणसिंह-कदमसिंह ही तो डिनर में सौभाग्य से मुर्गे की लातें खाते हैं। हमारा स्वर्णिम इतिहास ऐसे अनेक चरणहिलाऊ चंडुओं से अटा पड़ा है। केवट ने राम के पांव पखारे तो खुशहाल हो गया। रावण ने विभीषण को लात मारी तो फुस्स पटाखे-सा सीधा बेचारा राम के पांवों में जाकर गिरा। भरी थाली पर लात मारना वैसे भी कहां की समझदारी है। अंगद के पाव हिलाने में उसी महा-पहलवान रावण के खुद के पांव भारी हो गए। वामन अवतार विष्णु ने जब तीन पगों में तीनों लोक ही नाप डाले तो दैत्यराज बली के हाथ-पांव फूल गए। और जब कृष्ण ने सुदामा के पांव पखारे तो सुदामा के पांव ऑटोमेटिकली चादर से बाहर हो गए। इसीलिए आजके आशिक सुदामा के तो क्या अपनी महबूबा के भी पैर धोने को तैयार नहीं होते। आपके पांव बड़े हंसीन हैं यह पर्ची उसके पास लिखकर,सिर पर पांव रखकर वे फटाक से रफू चक्कर हो जाते हैं। और खुरापाती मानसिकतावाले आशिक तो अपी मुहब्बत की सरकार पर– मेरा दिल खो गया है आज कहीं,आपके पैरों के नीचे तो नहीं का सार्वजनिक आरोप मढ़कर खुद अपने मुंह मियां लोकपाल हो जाते हैं। और इसी सार्वजनिक-घोटाली पुचकार से घबड़ाकर सरकार के भी जमीन पर पांव पड़ना बंद हो जाते हैं। कहते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते मगर अक्ल बहुत तेज होती है। कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं मगर आँखों पर पट्टी बंधी रहती है। इसी गड़बड़ का फायदा उठाकर झूठ कानून की गोद में बैठकर हाईकमान-जैसी हरकतें करने लगता है। तुलसीदास ने इसी झूठ की प्रशंसा में लिखा है कि- बिन पग चले सुनहिं बिन काना..। जिससे आनंदित होकर मीरा अपने पग में घुंघरू बांधकर नाच उठती है। पग-पग पर पगलाए पग कभी डिस्को करते हैं तो कभी भंगड़ा। और बेचारे कुछ फ्लाप सिर्फ पांव पटकते ही रह जाते हैं। अपुन के साथ तो दिक्कत ये है कि अपुन जब भी पांव आगे बढ़ाते हैं तभी लोग लपक कर टांग अड़ाते हैं। शर्मीले लोग खड़े-खड़े अपनी टांगे भींचते हैं। बहादुर लोग टांग खींचते हैं। कुछ चापलूसी के जल से चरण-कमल सींचते हैं। भले ही पांव हाथी पांव ही क्यों न हो। पैर छूकर ही लड़कीवाले दहेज उत्पीड़न के ब्रह्मास्त्र से उनके वध करने का आशीर्वाद सरकार से हथिया लेते हैं। पांव छूने का महत्व दो पांव वाले ही जानते हैं इसीलिए तो ये चारपांववाले चौपायों पर भारी पड़ते हैं। चरणवंदना,पांवपखारना,पांयलागूं,पालागन,कदमबोसी,पैरीपेना और खंबागढ़ी इसी चरण-छू क्रिया के सर्वनाम हैं। और इस मनुष्य की सारी कामयाबी का इतिहास पांव बढ़ाने,अड़ाने और पांव उठाने का ही सनातन व्यसन है जो उसके डीएनए में काफी गहराई तक अपने पांव जमा चुका है। भगवान करे आप भी जल्दी से किसी चरण-छू सिंडीकेट के सदस्य बन जाएं।

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