राकेश सैन
गाय का केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि पर्यावरण, कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और संवैधानिक दृष्टि से बड़ा महत्व है। इन तथ्यों के मद्देनजर गत दिनों गुजरात के एक न्यायालय ने गोहत्या का अपराधी पाए जाने पर तीन अभियुक्तों को उम्रकैद की जो सजा सुनाई है, समय की मांग है कि यह न्याय और वहां का कानून पूरे देश के लिए नाजीर व गोहत्या से जुड़े मामलों के लिए प्रकाशस्तम्भ बने।
क्या है पूरा मामला
गुजरात के गांधीनगर में गांव जामला में 22 अगस्त, 2024 को यहां एक घर में पुलिस ने छापा मारा और 6 लोगों को गिरफ्तार किया। घर से पुलिस ने 277 किलो गोमांस, गायों को काटने में प्रयोग होने वाले हथियार और मांस ले जाने वाली एक गाड़ी बरामद की। अभियोगपक्ष के अनुसार, आरोपी वसीम कुरैशी और मोहम्मद रफीक कुरैशी कमजोर या दूध न देने वाली गायें और भैंसें खरीदते थे। उसके बाद वो अहमदाबाद से चार लोगों को बुलाते और जानवरों को बेरहमी से काट देते थे। गुलाम मोईन नाम का एक व्यक्ति इन लोगों से मांस खरीदता था। पुलिस ने 6 लोगों पर गोहत्या और प्रतिबंधित मांस रखने, ट्रांसपोर्ट करने और बेचने का मुकदमा दर्ज किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 54 गवाह और 18 कागजी सबूत पेश किए।
तीन आरोपियों को उम्रकैद व 3-3 लाख का जुर्माना लगाया गया
सुनवाई के बाद गांधीनगर के अतिरिक्त जिला सत्र न्यायालय ने वसीम कुरैशी, मोहम्मद रफीक कुरैशी और असफाक बहेलिम को दोषी करार दिया। इसी 26 अक्टूबर को न्यायाधीश बीआर राजपूत ने तीनों को उम्रकैद की सजा सुनाई और 3-3 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया। यह पूरे देश में अपनी तरह का पहला निर्णय माना जा रहा है।
अदालत ने क्या कहा गाय के बारे में
फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने गाय को लेकर जो बातें कहीं वह दूसरी अदालतों के लिए मार्गदर्शक बननी चाहिएं। न्यायाधीश बीआर राजपूत ने गाय का धार्मिक महत्त्व बताते हुए कहा कि मनुस्मृति में गाय को केवल जानवर नहीं, बल्कि खुशहाली, समाज और धर्म का एक स्तंभ माना गया है। ऋषि-मुनियों ने जानवरों की सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी वैश्य वर्ग को दी थी। इसके आर्ष विवाह में गाय और बैल की जोड़ी का एक खास महत्त्व है। गाय को दुनिया की माँ माना जाता है, जिसमें 33 करोड़ देवी-देवता निवास करते हैं। उसके चार पैर चार वेदों के प्रतीक हैं। जब तपस्या की शक्ति से अमृत की बूंदें धरती पर गिरीं, तो दिव्य गाय कामधेनु पैदा हुई और उसे धरती पर सभी गायों की पूर्वज माना जाने लगा। ऋग्वेद में गाय को अघ्न्या कहा गया है, यानी जिसे नहीं मारा जाना चाहिए।
त्वं माता सर्वदेवानां त्वं च यज्ञस्य कारणम्। त्वं तीर्थं सर्वतीर्थानां नमस्तेऽस्तु सदानघे॥
गुजरात पहला राज्य बना
गोहत्या पर उम्रकैद तक की सजा देने वाला गुजरात देश का पहला राज्य है। 2011 में गुजरात के तब के सीएम नरेंद्र मोदी की सरकार ने राज्य के एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट में बदलाव करके गायों की हत्या, उनके ट्रांसपोर्टेशन और गोमांस की बिक्री पर पूरी तरह बैन लगा दिया था। इसमें गोहत्या करने पर 3 से 7 साल तक की सजा और 50 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान था। जबकि गोमांस लाने-ले जाने, स्टोर करने या बिक्री करने पर अधिकतम 3 साल की सजा और 25 हजार जुर्माना था। फिर गुजरात सरकार ने 2017 में एक्ट में संशोधन करके सजा बढ़ा दी। गोहत्या पर 10 साल जेल से उम्रकैद तक और कम से कम 1 लाख से 5 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है। गोमांस लाने-ले जाने, स्टोर करने या बिक्री करने पर 7 साल से 10 साल तक जेल और 1 लाख से 5 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है।
दूसरे राज्य भी इसका अनुसरण करें
गोहत्या से संबंधित मामलों पर कोई केंद्रीय कानून नहीं है। यह मामले राज्य सरकारों के नियंत्रण में आते हैं। सभी राज्यों के अलग नियम हैं, जिन्हें 3 वर्गों में समझ सकते है- गुजरात के अलावा महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में गोहत्या प्रतिबंधित है। इन राज्यों में 1 से 10 साल की जेल और 10,000 से 5 लाख रुपए का जुर्माने का प्रावधान है। गुजरात से लगे दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में भी गोहत्या पर उम्रकैद की सजा हो सकती है।
दूसरी तरफ असम में बिना प्रमाणपत्र के मवेशियों को मारने या मंदिर और नॉन-बीफ इलाकों में बेचने पर 3 से 8 साल की सजा और 5 लाख रुपए तक जुर्माना लग सकता है। ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी बिना सर्टिफिकेट मवेशियों को मारना मना है। बिहार में गाय और बछड़े को मारना रोक है। 25 साल से ज्यादा उम्र, खेती और प्रजनन के लिए अयोग्य बैल और मादा भैंस को भी मार सकते हैं। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, गोवा, पुड्डुचेरी, अंडमान एंड निकोबार द्वीपसमूह में भी गोहत्या पर आंशिक प्रतिबंध है।
संविधान में भी दुधारू पशुओं की हत्या पर रोक की बात कही
संविधान निर्माताओं ने राज्यों को दिए नीति-निर्देशक सिद्धांतों में गौवध एवं अन्य दुधारू पशुओं के वध पर रोक लगाने का परामर्श दिया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 के मुताबिक राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों के माध्यम से बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे। हालांकि इस अनुच्छेद में किसी भी राज्य के लिए इस कानून को बनाने की बाध्यता नहीं रखी गई। संविधान लागू होने के तुरंत बाद अधिकांश राज्यों ने गाय के संरक्षण और उसके वध पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 (ए) पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार तथा वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा की बात करता है। संविधान (42 वाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 48 (ए) जोड़ा गया जिसमें गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाने के लिए स्पष्ट रूप से कहा गया है। 26 अक्टूबर 2005 को, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में भारत में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अधिनियमित विरोधी गाय हत्या कानूनों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
देश में जिस तरह स्वदेशी नस्लीय पशुधन का घान हो रहा है, कृषि और बागवानी में रसायनों का प्रयोग बढ़ रहा है, नकली दूध की समस्या दिनबदिन सुरसा के मुंह की तरह मुंह का आकार बढ़ा रही है, ऐसे में देश की सभी अदालतों को गुजरात की अदालत के निर्णय को नाजीर बना कर उसके प्रकाश में काम करना चाहिए।
राकेश सैन