जली पूंछ से लंका को स्वाहा करो हनुमान

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डॉ. मनोज जैन

कालेधन के मुददे पर सरकार को राजी करने के उददेश्य से रामलीला मैदान पर धरना दे रहे बाबा रामदेव को रात के अंधेरे में उस समय उठाया गया जिस समय पुलिस शातिर अपराधियों को उठाती है। यही नहीं बाबा के साथ अहिंसक आन्दोलनकारियों को बर्बरता से पीटा गया। रविवार की सुवह तक तो यही लगता रहा कि बाबा को पुलिस ने अपहरण कर लिया है। पर जब सुबह 10 बजे जौलीग्रान्ट पर बाबा देखे गये और फिर प्रेस कान्फे्रन्स में बाबा ने कहा कि वह किस प्रकार महिलाओं की वेशवूशा में जान बचा कर भागे थे। तब रात का घटनाक्रम समझ में आया। देश और दुनिया में लोकतन्त्र की दुहाई देकर शोक व्यक्त किया जा रहा है कि किस प्रकार सोनिया गांधी ने लोकतंत्र का गला घोंटा है। बाबा भी प्रेस कान्फे्रन्स में हक्के बक्के और बदहवास नजर आ रहे थे। रुंधे गले से बाबा कालरात्रि का ब्यौरा दे रहे थे उनका आरोप है कि दुनिया के इतिहास में कहीं भी इस प्रकार बेदर्दी से लोकतंत्र का गला नहीं घोंट गया है। इस सारे घटनाक्रम से कई बातें सामने आती हैं।

1. बाबा रामदेव को राजनीति मुददों की समझ कितनी है?

इस प्रश्न का विश्लेषण करने पर एक बात समझ में आती है कि योग दर्शन के प्रकांड विद्वान स्वामी रामदेव उन्हीं राजनैतिक मुददों को उठातें हैं जिनको पहलें गोविन्दाचार्य उठा चुके होते है, चाहें गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने का मामला हो या विदेशों में जमा कालेधन का मामला। ऐसा लगता है कि गोविन्दाचार्य के पास संगठन नहीं है और बाबा के पास मुददे नहीं है। देश भर में गठित की गई पंतजलि योग समितियां योग को आम जन तक पहुचानें के उददेश्य से गठित की गई थीं। सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद पर पंहुचने से रोकने के लिये विरोधस्वरुप गठित किया गया राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन तत्काल तो अपने उद्देश्यों में कामयाब हो गया था पर कालान्तर में उसकी भौतरीं पडती धार को बाबा ने स्व. राजीव दीक्षित के साथ भारत स्वाभिमान ट्रस्ट कें माध्यम से पैना किया है। बाबा राजनैतिक समझ के मामले में कपिल सिब्बल के जाल में फसं ही गये। जब कपिल सिब्बल आचार्य बालकृष्ण से वह पत्र लिखवा रहे थे तब स्वामी रामदेव का मौन रह जाना यह दर्शाता है कि घाघ राजनीतिज्ञों के मुकाबले बाबा अभी कच्चे ही है। बाबा इस पत्र के लिखे जाते समय यह आकलन ही नहीं कर पाये कि आखिर वह भेडियों के समूह से यह उम्मीद कैसे कर सकते है कि वह उनके प्रभाव में शाकाहारी हो जायेंगे।

2. बाबा को राजनैतिक आन्दोलनों का अनुभव क्या है?

स्वयं बाबा ने प्रेस कांफ्रेंस में स्वीकार किया है कि इस घटना से पूर्व उन्हौनें पुलिसिया जुर्म को केवल सुना था देखा नहीं था। दरअसल जब से बाबा ने उचाईयां पकड़ना शुरु किया है तब से बाबा ने पुलिस को अपनी सेवा और सुरक्षा में पाया है। पुलिसिया हथकडें क्या होते है। संभवत: इसका अनुमान बाबा को नहीं रहा है। और यही कारण था कि इस विराट सत्याग्रह में औरतों और बच्चों को भी निसंकोच बुला लिया गया। यदि केवल महिलाएं ही आई होती तो यह बात आन्दोलनकारियों के हक में जाती परन्तु संघर्ष के समय बच्चों के साथ होने से हर आदमी कमजोर पड़ ही जाता है। इसलिये राजनीतिक आन्दोलनों में परिवार के साथ आना और आने की अनुमति प्रदान करना बाबा को राजनैतिक आन्दोलनों की अनुभव की कमी को ही दर्शाता है।

बाबा यह क्यों नहीं समझ पाये कि गांधी के अनुयायी और नेहरु के मित्र डॉ राममनोहर लोहिया कितनी बार पुलिसिया अत्याचार के शिकार हुये। जयप्रकाश नारायण को अपनो से ही सेघर्ष का सामना करना पड़ा। ममता बर्नजी ने भी कांग्रेस पार्टी के जुल्म कोई कम नहीं सहे है। फिर अपनी सत्ता को चुनौती मिलते देख कर राजसत्ता से अहिंसक बने रहने की उम्मीद पालना नादानी नहीं तो और क्या है।

3. बाबा की संघर्ष क्षमता और साहस कितना है?

सारे संघर्ष में यह देखने में आया कि बाबा इतने भोले हैं कि गांधी जी की भतिं सत्याग्रह करने के लिये देशभर से ऐसे लोग बुला लिये जैसे कि वह किसी राजनैतिक आन्दोलन में नहीं सत्सगं कार्यक्रम में आये हों। जबकि एक ऐसे मुददे पर जो सीधा सत्ता के केन्द्र में व्याप्त गन्दगी को ढकें हुये है। उस पर संघर्ष क्या इतनी आसानी से हो सकता है कि आप मागें और राजसत्ता आपकी सारी बात मान लें। इतना बड़ा आन्दोलन और सारे ही लोग सोते रहे। रात 11 बजे से पुलिस बल जमा होता रहा रहा और आन्दोलनकारी सोते ही रहे यह भोलापन राजनीति मे नहीे चलता। यदि कार्यकर्ता चौकन्ने होते तो पुलिस इस प्रकार बेदर्दी से निहत्थे लोगों को नहीं कुचल पाती। स्वंय बाबा का महिलाओं के वस्त्रों में ंछिपकर जान बचाने के लिये भागना यह दर्शा रहा था कि एक बहुत बडे मुददे पर सरकार को चुनौती देने के लिये बहुत कम संगठनात्मक तैयारियों के साथ बहुत बडें जनसमुदाय को आमंत्रित कर लेना राजनैतिक अदूरदर्शिता है।

कार्यक्रम के लिये की गई विशाल तयौरियों को एकतरफा संघर्ष और दमन से कुचल कर फिलहाल तो काग्रेसं ने बाजी मार ली है क्यों कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश भी बाबा को अनशन की अनुमति नहीं दे रहे है। ऐसे में पतंजलि योगपीठ से आन्दोलन को चलाना कितना सफल बनायेगा यह तो वक्त ही बतायेगा।

4. आखिर कांग्रेस ने बाबा के आन्दोलन को क्यों कुचला।

कल तक बाबा के लिये लाल कालीन विछा रहे केन्द्रीय मंत्री अचानक रात के अंधेरे मे हिसंक पशु कैसे हो गये। अन्ना हजारे के आन्दोलन को बाला बाला पलीता लगाने में सफल कांग्रेस बाबा के मामले में क्यों बौखला गई? क्या कांग्रेस के कर्णधार नहीं जानते कि इस अत्याचारी शासन की गूंज इतनी हल्की नहीं है कि 2014 तक शान्त हो जाये। फिर क्यों कांग्रेस ने बाबा के गले में दुप्पटे से फांसी लगाने का प्रयास किया। क्यों कांग्रेस पार्टी में केन्द्रबिन्दु पर यह सहमति बन गई कि बाबा मरता है तो मरने दो पर कालेधन की आवाज नहीं उठनी चाहिये। दरअसल भ्रष्टाचार के लपेटे में अब तक कलमाड़ी, कनिमोझी जैसे आउटर सर्किल के लोग ही लपेटे में आये हैं पर कालेधन का मुददा अब वहॉ तक पंहुचने लगा था जहां से इनर सर्किल के लोगों की गर्दन तक इसके हाथ पहुचनें लगे हैं। यदि विदेशों में जमा कालेधन को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित कर दिया गया तो सब जानते है कि सर्वाधिक धन किन लोगों का वहां पर जमा है। आजादी के बाद से अब तक कोल्हू के बैल की तरह पहले दादा, फिर पिता और अब नाती जुते रहे पर घर में खुशहाली नहीं आई। उनकी मेहनत क्यों रंग नहीं लाई। उनके हिस्से की कमाई पर कौन डाका डाल ले गया। देश की सम्पत्ति का असमान वितरण करके कौन उनकी खुशिंयां बटोर ले गया है। यदि इस कालेधन का खुलासा हो जायेगा तो गांधी नेहरु परिवार और उनके करीबियों का इस देश की राजनीति से हमेशा के लिये पतन हो जायेगा। अपने अस्तिव की रक्षा के लिये सत्ताकेन्द्र के सामने इस आन्दोलन को कुचलने के सिवाय कोई चारा ही नही बचा था।

बाबा हनुमान बन कर देश की जनता का संदेश लेकर लंका गये थे जहां रावण के यहां बधंक बनी देश की लक्ष्मी सीता को छुडाने का संदेश उन्हौने रावण को सुना दिया पर रावण ने तो हनुमान की पूंछ में आग तो लगा दी है अब यह हनुमान को तय करना है कि अपनी अधजली पूंछ कटा कर सारी जिन्दगी जिल्लत की जिंदगी जीता है या लंका को स्वाहा करता है।

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