आर्थिकी

ग्रामीण समृद्धि की रीढ़ बनेगा पशुधन

आम बजट:- 2026

प्रमोद भार्गव

               ग्राम और ग्रामीण की समृद्धि की रीढ़ अब केवल खेती-किसानी तक सीमित नहीं रह गई है, इस आम बजट में सरकार ने पशुधन से पशुपालकों और दुग्धउत्पादकों की आय बढ़ाने के ठोस उपाय किर दिए हैं।इससे रोजगार बढने के साथ दैनिक और मासिक आमदनी में स्थिरता आएगी।खेती पर बढ़ते संकट कम होंगे।पशुधन, मुर्गी व मत्स्य पालन ग्रामीणों की आजीविका के भरोसे के सहारा बनेंगे।यह पशुधन स्वस्थ्य बना रहे, इस लक्ष्यपूर्ति के लिए 20 हजार से अधिक पशु चिकित्सकों की उपलब्धता भी तय की गई है।ताकि गांव में ही त्वरित इलाज की सुविधा मिले।फिलहाल देश में पशु-चिकित्सकों की बहुत कमी है,इस कारण उत्पादन प्रभावित हो रहा है।इस कमी को दूर करने के लिए डेढ़ लाख पशु देखभाल प्रशिक्षित सेवकों की अतिरिक्त तैनाती की जाएगी।इस उपाय से दुधारू पशुओं की असमय मृत्यु में कमी आएगी।यदि पालतू पशुओं को आरक्षित वनों में चरने की छूट दे दी जाती है तो सड़क दुर्घटनाओं में पशुओं के मरने में तो कमी आएगी ही,पौष्टिक चारा मिलने से दूध भी पौष्टिक होगा।

                 पशुधन की महिमा इस तथ्य से जानी जा सकती है कि खेती से होने वाली कुल आय में करीब 16 प्रतिशत की भागीदारी पशुपालन और उनसे उत्पादित आहार से है।इस आय में लगातार पिछले ग्यारह साल से 12.77 प्रतिशत की वार्षिक दर से वृद्धि हो रही है।यानी खेती जहां लघु व मध्यम किसानों के लिए घाटे का सौदा बनी हुई है, वहीं पशुपालन ग्रामीणों को भरोसे की आय का साधन बन गया है।भारत दूध उत्पादन में दुनिया में पहले सोपान पर  है। विश्व के कुल दूध उत्पादन में भारत 25 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। बीते 10 साल में देश में दूध का उत्पादन लगभग 57 प्रतिशत बढ़ा है। नतीजतन प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 2024-25 में 485 ग्राम प्रतिदिन हो गई है। 9 वर्ष पहले यह उपलब्ता महज 300 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन थी। कुछ साल पहले दुग्ध उत्पादों के आयात की संभावना जताई जाने लगी थी। किंतु अब पशु संवर्धन के लिए किए गए प्रयास रंग दिखाने लगे हैं। बीते एक दशक में दूध के उत्पादन एवं उत्पादकता में आजादी के बाद से सर्वाधिक वृद्धि हुई है। दूध की उपलब्धता बढ़ी तो भारतीयों के खान-पान की आदत में दूध और उसके उत्पादों का सेवन व खपत भी बढ़ गई। अब प्रत्येक भारतीय दुनिया में औसत खपत में से 65 ग्राम अधिक दूध पीने लगा है। दूध की वैश्विक औसत खपत फिलहाल लगभ 328 ग्राम प्रति व्यक्ति है।मुर्गी एवं मत्स्य पालन के साथ जलीय कृषि को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।इसीलिए अमेरिका जैसे देश भारत के दूध बाजार को हड़पना चाहते हैं।भारत ने अमेरिका के लिए निर्मित वस्तुओं को बाजार नहीं खोले तो अनर्गल टैरिफ लगा दिए।

              पशुधन का संरक्षण इसलिए जरुरी है, क्योंकि ग्रामों में दूध नियमित नकद आय का पुख्ता आधार बना हुआ है।ग्रामीण रोजगार और अर्थव्यवस्था में इसकी बड़ी भागीदारी है। देश में 2019 में हुई 20 वीं पशुधन गणना के अनुसार करीब 14 करोड़ गाएं और 11 करोड़ भैंसें हैं।याक,ऊंट,भेड़ और बकरी भी दुधारू पशुओं में गिने जाते हैं।हालांकि अभी तक हमारा राष्ट्रीय आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो महज 20 फीसदी पशुओं का ही आनुवंशिक वर्गीकरण कर पाया है। इससे पता चलता है कि हम अपने पशुधन के प्रति कितने लापरवाह हैं। जबकि घरेलू नस्ल के दुधारू जानवरों को स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों में पलने-बढ़ने व वंश वृद्धि में ज्यादा मजबूत और जुझारु पाया जाता है। ये पशु जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बर्दाश्त करने में भी ज्यादा समर्थ होते हैं।भारत दूध उत्पादन में दुनिया का अग्रणी देश है।फिर भी दूध की आपूर्ति सिंथेटिक दूध बनाकर और पानी मिलाकर की जा रही है। यूरिया से भी दूध बनाया जा रहा है। दूध की बढ़ती मांग के कारण दूध का कारोबार गांव-गांव फैल गया है।

               जैविक तकनीक के क्षेत्र में भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार इस क्षेत्र में देश में पहली बार ई-3 (इकोनोमी एनवायरमेंट, एमप्लायमेंट) नीति कुछ समय पहले जारी की हुई है। इसके तहत दूध, खाद्यान्न, पर्यावरण सहित आम जनजीवन के सामने खड़ी होने वाली प्रत्येक चुनौती से निपटने की तैयारी है। इस क्षेत्र में फिलहाल जनता को सबसे बड़ा लाभ जैविक दूध के रूप में मिलने वाला है। पशुधन के बिना मिलने वाला यह जैविक दूध, दूध की कमी पूरा करने के साथ पौष्टिक भी होगा। यह नई औद्योगिक क्रांति, जैव तकनीक और बायो मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में होगी। आईटी क्रांति की तरह जैविक दूध और खाद्य सामग्री अभी भले ही लोगों को एक चौंकाने वाली बात लग रही हो, लेकिन भविष्य की जरूरतें इसी से पूरी होंगी। यह दूध केवल जैविक उत्पादों से तैयार होगा। इसमें रसायन का प्रयोग कतई नहीं होगा। 

                अब तक बिना किसी सरकारी मदद के दूध का कारोबार फलता-फूलता रहा है। दूध का 70 फीसद कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है। इस व्यापार में लगे ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं। लेकिन पांरपरिक ज्ञान से न केवल वे दुग्ध उत्पादन में दक्ष हैं, बल्कि दूध के सह-उत्पाद बनाने में भी कुशल हैं। दूध का 30 फीसदी कारोबार संगठित क्षेत्र, मसलन दूध डेयरियों के माध्यम से होता है। देश में दूध के उत्पादन से 96 हजार सहकारी संस्थाएं जुड़ी हैं। 14 राज्यों की भी अपनी दुग्ध सहकारी संस्थाएं हैं। देश में कुल कृषि खाद्य व दूध से जुड़ी प्रसंस्करण संस्थाएं केवल दो प्रतिशत हैं। बावजूद वे अशिक्षित किंतु पारंपरिक ज्ञान से कुशल ग्रामीण स्त्री-पुरुष ही हैं, जो दूध का देशी उपायों से प्रसंस्करण करके दही, घी, मक्खन, पनीर आदि बना रहे हैं। इस कारोबार की विलक्षण खूबी यह भी है कि इससे सात करोड़ से ज्यादा लोगों की आजीविका चलती है।
               एक अनुमान क अनुसार भविष्य में जलवायु परिवर्तन और उच्च तापमान के चलते, सालाना दूध उत्पादन में 32 लाख टन की कमी आ सकती है। इस दूध का मूल्य 5,000 करोड़ रुपए के बराबर होगा। इसलिए जरुरी है कि दुधारू पशुओं की सभी प्रजातियों की नस्लों का संरक्षण व संवर्धन किया जाए।इस दृष्टि से 20 हजार पशु चिकित्सक, डेढ़ लाख दक्ष पशु सेवा प्रदाताओं के प्रबंध के साथ, 84 पशु चिकित्सा महाविद्यालय खोलने का प्रावधान इस बजट में किया गया है। भारत में गिर, राठी, साहिवाल, देवनी, थरपाकर, लाल सिंधी जैसे देशी नस्ल के दुधारू पशु उत्तर, मध्य, पूर्व और पश्चिम भारत में पाए जाते हैं। वाकई यदि इनके आनुवंशिक स्वरुप को उन्नत करने और इनके वंश की वृद्धि के कारगर प्रबंध किए जाते हैं तो देसी नस्ल की गायों से दुग्ध का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। दक्षिण भारत में पाई जाने वाली पंगुनूर, विचूर और कृष्णा घाटी की गायों के आनुवंशिक संरक्षण की आवश्यकता को भी  पूरा किया जाना जरुरी है। क्योंकि इस नस्ल के पशुओं की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। हालांकि अब पहली बार आम बजट में पशुधन के संरक्षण को व्यापक महत्व दिया गया है,जो सराहनीय पहल है।यदि यह योजना प्रभावी ढंग से क्रियान्वित होती है तो आने वाले चंद सालों में पशुधन ग्रामीण भारत की रोजगार की पुख्ता गारंटी बन जायेगा।पशुधन जब तकदीर बनेगा तो ग्रामों से पलायन भी थम जाएगा।

प्रमोद भार्गव