लेख हिंदी दिवस

अनुवाद शब्द पर दृष्टि

डॉ. नीरज भारद्वाज

21वीं सदी जहाँ ज्ञान-विज्ञान एवं सूचना प्रौद्योगिकी की सदी है, वही निश्चित रूप से अनुवाद की भी सदी है। यह समूचा ज्ञान-विज्ञान सुविज्ञ अनुवाद के माध्यम से ही भावी पीढ़ी के बहुमुखी व्यक्तित्व के निर्माण तथा आर्थिक रूप से सबल राष्ट्र के निर्माण का आधार बना है। वास्तव में ‘विश्वग्राम’ की परिकल्पना में ज्ञान के प्रचार-प्रसार तथा विभिन्न व्यक्तियों को एक दूसरे से जोड़ने में और ‘वसुद्यैव कुटुंबकम्’ की भावना सुदृढ़ बनाने में अनुवाद महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है और जनसंचार के सबसे शक्तिशाली माध्यम प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अनुवाद के सहारे अपनी शक्ति और सार्थकता को बढ़ा रहे हैं। सम्प्रेषण की इस समूची प्रक्रिया को तीव्रतर बनाने में अनुवाद की अहम् भूमिका है।

संचार क्रांति के युग में अनुवाद का महत्वपूर्ण स्थान है। ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में जिस प्रकार नित-नूतन आविष्कार हो रहे हैं, उससे देश-विदेश के अनेक भाषा-भाषी समुदायों और संस्कृतियों का मेल-मिलाप संभव होता जा रहा है। इस प्रकार के संगम में अनुवाद की अहम् भूमिका देखी जाती है। यहाँ कहना असमीचीन न होगा कि अनुवाद की भूमिका का महत्त्व आधुनिक युग में ही नहीं वरन् आदिकाल से ही इसकी महत्ता मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रें में बनी रही है। अनुवाद का महत्व आदिकाल से ही बढ़ता चला आ रहा है और वर्तमान तक आते-आते अनुवाद ने संचार और सूचना क्रांति के साथ जनसंचार के क्षेत्र में एक युगांतकारी बदलाव भी किया है। विश्व को आपसी संवाद देकर अनुवाद ने सूचना प्रवाह को एक विशाल आकाश दिया है। इस सारे तंत्र व सूचना प्रवाह का आधार अनुवाद ही कहा जा सकता है, क्योंकि अनुवाद ही वह शक्ति है, जिसने भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में संमग्र विश्व को बांधा दिया है।

भारतीय दर्शन, वेद, पुराण, शास्त्र के साथ-साथ बाइबिल, कुरान आदि अनेक ग्रंथों का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार अनुवाद द्वारा ही संभव हो सका है। अनुवाद से साहित्य, संस्कृति और कला की विश्व-चेतना का विकास तो हुआ ही साथ में प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विकास करने में इसकी भूमिका उल्लेखनीय रही है। अनुवाद सेतु का काम करता रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो विश्वग्राम की परिकल्पना, मीडिया और संचार क्रांति में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका है।

अनुवाद का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। भारत में प्रचीन काल से ही अनुवाद परम्परा सुदृढ रही है। प्राचीन भारत में शिक्षा की परम्परा मौखिक थी। गुरूजी जो कहते थे, शिष्य उसे दुहराते थे। इस दुहराने को ही ‘अनुवाद’ या ‘अनुवचन’ कहा गया है। ‘अनुवाद’ भी मूलतः यही है। संस्कृत में अनुवाद का प्रयोग गुरू की बात का शिष्य द्वारा दुहराया जाना, पश्चातकथन, दुहराना, पुनःकथन, कहना, ज्ञात को कहना, समर्थन के लिए प्रयुक्त कथन, विद्या या विहित का पुनः कथन, आवृति, सार्थक आवृति आदि अर्थों में हुआ है।पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार अनुवाद का व्यवास्थित विकास लगभग छः सौ (600) वर्ष पुराना माना जाता है अर्थात् अंधाकार युग के बाद पुनजगरण काल से ही अनुवाद का विधिवत विकास पश्चिम में हुआ। फ्रलोरा रास ने अपनी पुस्तक ‘अर्ली थियरीज ऑफ ट्रांसलेशन’ में यूरोप में हुए अनुवादों और प्रतिपादित सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन किया और मध्यकाल में यूरोप में हुए अच्छे अनुवादों का वर्णन किया। इसके बाद ही ‘बाइबिल’ के अनुवादों का दौर आया। पाश्चात्य विद्वानों का कथन हैं कि चौदवीं सदी के उत्तरार्द्ध में बाइबिल के अनुवाद यूरोप में सामने आए। विश्व भर में अनुवाद के क्षेत्र में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, लौजाइनस आदि मनीषियों के नाम परिचित हुए।

‘अनु’ का अर्थ होता है ‘पीछे’ या ‘बाद में’ इस प्रकार अनुवाद का अर्थ हुआ ‘किसी के कहने या बोलने के बाद कहना या बोलना’।  प्रोफेसर कृष्ण कुमार गोस्वामी लिखते हैं कि, हिन्दी में अनुवाद का अर्थ है- एक  भाषा में कही हुई बात को दूसरी भाषा में कहना। यह एक प्रकार का भाषांतर है। दरअसल अनुवाद एक भाषा से दूसरी भाषा में विश्लेषण की प्रक्रिया है, जिसमें दोनों भाषाओं के बीच अर्थ सुरक्षित रखा जा सके। अनुवाद का सम्बन्ध स्रोत भाषा से पाठ के लक्ष्य भाषा के पाठ में अंतरण से है और यह अंतरण इस ढंग से किया जाए कि जो कुछ कहा गया है न केवल उसको सुरक्षित रखा जाए वरन् कैसे कहा गया है उसको ध्यान में रखा जाए। अनुवाद करते समय विषय वस्तु और उसकी शैली दोनों का अपना महत्व है तथा अनुवाद करते समय ये दोनों बातें विचारणीय भी होती है। अनुवाद भाषात्मक खाई को मिटाने का महान् कार्य करता है। इसने संवाद को एक सशक्त भाषा प्रदान की है। मूल वक्तव्य अपने नए रूप में जितना सहज और सुबोध होगा अनुवाद उतना ही सफल कहा जाएगा। अनुवाद में प्रतिस्थापन से काम नहीं चल सकता वरन् कथ्य की भाव-प्रवणता आवश्यक होती है। अनुवाद में अर्थ की दृष्टि से स्पष्टता, सुबोधता एवं सुनिश्चितता होनी चाहिए और शब्द ऐसे हो जिनमें अपेक्षित उर्वरता हो। किसी भी शब्द का जो भी अनुवाद किया जाए, वह सार्थक होना चाहिए।

डॉ. नीरज भारद्वाज