ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त, भारत और इंडिया
मनुस्मृति में मनु महाराज ने हमारे देश की सीमाओं का उल्लेख करते हुए प्राचीन नाम ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त का उल्लेख किया है। इन दोनों नामों को आज के भारत वर्ष के प्राचीन नाम के रूप में देखा जाता है। इनका अभिप्राय यह नहीं है कि उनकी सीमाएं वर्तमान भारत को संदर्भित करती हैं अथवा भारत की तत्कालीन सीमाओं को स्पष्ट करती हैं।ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त उस समय एक विशाल प्रदेश के रूप में रहे होंगे। क्योंकि उस समय मनु महाराज ने सातों द्वीपों के राजा के रूप में शपथ ग्रहण की थी अर्थात वे संपूर्ण भूमंडल के राजा बने थे।
इससे स्पष्ट है कि ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त किसी विशाल भूभाग का नाम तो हो सकता है, परंतु उस समय ये कोई देश रहे हों,ऐसा नहीं कहना चाहिए। मनुस्मृति से अपने आपको जोड़कर देखने से स्पष्ट होता है कि हम संपूर्ण भूमंडल के स्वामी थे। संपूर्ण भूमंडल पर हमारा शासन था। यहीं से हमने समस्त संसार के लिए मनु जी के माध्यम से उत्तम आचार का निर्धारण किया था। उनका यह उत्तम आचार ही वैश्विक संस्कृति के निर्माण में सहायक बना था। उससे पहले वेदों का संदेश भी यहीं से निकलकर संसार के अन्य क्षेत्रों में पहुंचा था। इस स्थिति को देखकर हमें अपना संस्कृति बोध होता है। राष्ट्र बोध होता है। गौरव बोध होता है। ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त शब्द भी हमारी महान वैदिक संस्कृति के पवित्रतम शब्द हैं। जिनसे हमें अपने अतीत का ज्ञान होता है। ये ऋषियों की पवित्र संस्कृति की ओर संकेत करने वाले शब्द हैं। जिन्होंने अपने वेदज्ञान से संसार के लोगों का कल्याण करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया था। उस वेदवाणी की ओर संकेत करते हैं,जिसके पवित्र वेद मंत्रों के गायन से लोगों को नवजीवन प्राप्त होता था। जीवन और जगत की समस्याओं को सुलझाने का समाधान प्राप्त होता था और अंत में मुक्ति का मार्ग मिलता था। ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त सारे संसार की छत थे। जिसके नीचे संपूर्ण भूमंडल के निवासियों को सुरक्षा उपलब्ध होती थी। उनके अधिकारों का सम्मान होता था, उनके जीवन का सम्मान होता था और उनके विचारों का सम्मान होता था। इस छत के नीचे ही उनके विचारों का परिष्कार होता था, प्राणी मात्र का उद्धार होता था।
उस समय हमने अपने सात्विक भावों का प्रचार- प्रसार किया था और सारे संसार को सन्मार्ग दिखाया था। जहां कहीं टूटन थी, जकड़न थी, तनाव था – उसका हमने उपचार किया था।
संसार की सबसे बड़े ‘ उपचारक ‘ मनु
संसार की समस्त समस्याओं के ‘ उपचारक ‘ के रूप में ही लोग हमें देखते थे और महर्षि मनु संसार के सबसे बड़े उपचारक के रूप में ही उभरकर सामने आए थे। हमें अपने आप पर गर्व नहीं था,संसार को ही हम पर गर्व था। क्योंकि हमारे होने से उसकी सुरक्षा थी। हमारे होने से मर्यादाओं की रक्षा होना संभव था। हमारे होने से धर्म का प्रचार और प्रसार होना संभव था। हमारे होने से सर्वत्र सुख शांति और समृद्धि का साम्राज्य स्थापित होना संभव था।
ब्रह्मावर्त का शाब्दिक अर्थ “ब्रह्मा का आवर्त” (क्षेत्र या निवास स्थान) है। जबकि आर्यावर्त का अर्थ है “आर्यों का निवास स्थान” अर्थात “महान लोगों की भूमि। “
ब्रह्मावर्त के बारे में महर्षि मनु लिखते हैं कि :-
सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम्।
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ॥ 136॥
2.17
डॉ सुरेंद्र कुमार जी इसका अर्थ करते हुए लिखते हैं ” देव अर्थात् दिव्यगुण और दिव्य आचरण वाले विद्वानों के निवास से युक्त सरस्वती और दृषद्वती नदी-प्रदेशों के जो बीच का स्थान है उस (देव-निर्मितम्-देशम्) दिव्यगुण एवं आचरण वाले विद्वानों द्वारा बसाये और उनके निवास से सुशोभित देश को (‘ब्रह्मावर्तम्’ प्रचक्षते) ‘ब्रह्मावर्त’ कहा जाता है।”
इस श्लोक में ” दिव्य गुण और आचरण वाले विद्वानों द्वारा बसाये ” – शब्दों पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। हमारे आज के संविधान ने और संविधान निर्माताओं ने भारत को अंधविश्वासी और प्रकृति पूजक अज्ञानी लोगों की भूमि के रूप में प्रस्तुत करने की अपनी मानसिकता को दिखाया है। इसीलिए उसने भारत के अतीत से संबंध तोड़कर तथाकथित प्रगतिशील पश्चिम के साथ अपने आप को जोड़ने में भलाई समझी है।
‘ हम पश्चिम के साथ जुड़ें ‘
हमारा संविधान प्रगतिशील समाज के निर्माण के लिए वर्तमान काल के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने की बात करता है। ऐसा कहकर उसने हमें यह आभास कराने का प्रयास किया है कि हम पश्चिम के साथ जुड़ें। तभी हम प्रगतिशील बन सकते हैं और तभी हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाकर आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने 1947 से पीछे के भारत को मूर्खों की भूमि मान लिया। ऐसे जंगली लोगों का निवास स्थान मान लिया जिनमें सभ्यता तनिक भी नहीं थी।जबकि महर्षि मनु अपने आदि संविधान में कह रहे हैं कि सृष्टि के प्रारंभ से ही आर्यों की यह पवित्र भूमि दिव्यगुण और आचरण वाले विद्वानों की भूमि रही है। चिंतन के इस स्तर को समझने की आवश्यकता है। विशेष रूप से तब जब इसे हमारी संविधान निर्मात्री सभा ने समझने का प्रयास ही नहीं किया था।
महर्षि मनु ने कहीं से भी यह आभास नहीं कराया कि इस पवित्र भूमि पर सभ्यता और संस्कृति का शुभारंभ उनके समय से हो रहा है। इसलिए वह इस राष्ट्र के पिता हैं। उन्होंने अपने से पूर्व के सभी महापुरुषों के दिव्य आचरण और दिव्य जीवन को भरपूर सम्मान दिया और यह स्पष्ट किया कि मैं उस परंपरा का संवाहक मात्र हूं अर्थात उन सभी ऋषि पूर्वजों की चरण धूल समझकर उन्होंने अपने धर्म ग्रंथ का निर्माण किया जो भारत के सत्य सनातन वैदिक धर्म के लिए ज्योति स्तंभ के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुके थे। इसी को कृतज्ञता कहते हैं। क्या ही अच्छा होता कि हमारे वर्तमान संविधान के निर्माता लोग भी जहां भारत के बारे में पहले अनुच्छेद का निर्माण कर रहे थे, वहां इसे ऋषियों की पवित्र भूमि लिखते। वहीं पर यह भी स्पष्ट करते कि यह पवित्र भारत भूमि प्राचीन काल से ही दिव्य आचरण वाले विद्वानों की पवित्र भूमि रही है। इसीलिए इसको ब्रह्मावर्त ,आर्यावर्त, भारतवर्ष जैसे नामों से संबोधित किया गया है।
” इंडिया दैट इज भारत “
हमारे वर्तमान संविधान के अनुच्छेद 01 में लिखा गया है कि :-
(1) भारत, यानी भारत, राज्यों का संघ होगा।
(2) राज्य और उनके क्षेत्र प्रथम अनुसूची के भाग अ, ब और ग में निर्दिष्ट राज्य और उनके क्षेत्र होंगे।
(3) भारत का भूभाग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा —
(क) राज्यों के क्षेत्र;
(ख) प्रथम अनुसूची के भाग घ में निर्दिष्ट क्षेत्र; और
(सी) ऐसे अन्य क्षेत्र जो अधिग्रहित किए जा सकते हैं।
इसे इंग्लिश में ” India that is Bharat ” कहा गया है।
भारत के बारे में केवल इतना ही परिचय देना पर्याप्त समझ लिया गया कि ” इंडिया ” जो कि भारत है,….” जबकि होना यह चाहिए था कि ‘ ब्रह्मावर्त ‘ ‘ आर्यावर्त ‘ ‘ भारतवर्ष ‘ जो कि ‘ इंडिया ‘ के नाम से भी जाना जाता है….”
यहां ‘ इंडिया ‘ से भारत की पहचान करवाई गई है, मनु महाराज ने ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त से भारतवर्ष की पहचान करवाई है। इसे कहते हैं – मनीषा, इसे कहते हैं राष्ट्र बोध।
इसी प्रकार का राष्ट्रबोध हमारे संविधान की पहली धारा के माध्यम से होना चाहिए था। जिससे पाठक यह समझता कि यह भारत अपने मौलिक स्वरूप में क्या है ? इसका आधार क्या है ? इसके चिंतन का स्वरूप क्या है ? इसकी आत्मा की पुकार क्या है ? पहले ब्रह्मावर्त को समझाया जाता, फिर आर्यावर्त को समझाया जाता, उसके पश्चात भारतवर्ष को समझाया जाता और तब कहीं अंत में इंडिया के बारे में समझने के लिए पाठक विवश होता। परंतु जब वह इंडिया और ब्रह्मावर्त के बारे में तुलनात्मक अध्ययन करता तो उसे पता चलता कि ब्रह्मावर्त किस चीज का नाम है ?
राकेश कुमार आर्य