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मनुस्मृति और भारतीय संविधान, अध्याय – 7

[8:17 pm, 29/3/2026] Rakesh Arya Ugta Bharat:

राजा अथवा राष्ट्रपति की योग्यताएं

मनुस्मृति के सातवें अध्याय में महर्षि मनु के द्वारा राजधर्म विषय पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। यह सातवां अध्याय संसार के सभी देशों के लिए और संसार के उन सभी संविधान विशेषज्ञों के लिए एक चुनौती है जो यह मानते हैं कि प्राचीन काल में कहीं पर भी कोई ऐसी राज्य व्यवस्था लागू नहीं थी जो लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार प्रदान करती थी और उनके समग्र कल्याण की योजना पर कार्य करती थी। मनु को पढ़ते ही इस प्रकार की सोच रखने वाले लोगों के सारे दावे झूठे सिद्ध हो जाते हैं, क्योंकि महर्षि मनु ने मनुस्मृति के अंतर्गत राजधर्म की विस्तृत व्याख्या की है। राजधर्म के हर बिंदु को बड़ी स्पष्टता और पारदर्शिताओं के साथ छूने का सफल प्रयास किया है। जो लोग मनु की मनुस्मृति को लेकर पूर्वाग्रह रखते हैं वे मनुस्मृ…
[8:17 pm, 29/3/2026] Rakesh Arya Ugta Bharat: प्रकाशन हेतु आज का आलेख
[8:06 am, 3/4/2026] Rakesh Arya Ugta Bharat: डॉ राकेश कुमार आर्य की पुस्तक ” मजहब तो सिखाता है आपस में बैर रखना”

मज़हब, मानवता और वैचारिक संघर्ष का विमर्श: ‘मज़हब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना’

उमेश कुमार सिंह
भारतीय समाज में धर्म, मज़हब और मानवता के संबंधों को लेकर सदियों से विचार-विमर्श चलता रहा है, किंतु समकालीन समय में यह बहस और अधिक तीव्र और प्रासंगिक हो गई है। इसी संवेदनशील और जटिल विषय को केंद्र में रखकर लेखक डॉ. राकेश कुमार आर्य की पुस्तक ‘मज़हब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना’ एक वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह पुस्तक केवल धार्मिक विमर्श तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक संरचना, ऐतिहासिक घटनाओं और मानवीय मूल्यों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में अपने तर्क प्रस्तुत करती है। प्रकाशन के क्षेत्र में प्रतिष्ठित संस्था डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक ‘मज़हब ही तो सिखाता है…
[8:06 am, 3/4/2026] Rakesh Arya Ugta Bharat: प्रकाशन हेतु आज का आलेख
[12:56 pm, 4/4/2026] Rakesh Arya Ugta Bharat: तीसरा विश्व युद्ध और अमेरिका की परिणति

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के विशेषज्ञों की बात यदि मानी जाए तो उनका स्पष्ट मानना है कि सारा विश्व जितना पिछले वर्ष विश्व युद्ध के संकटों को अनुभव कर रहा था, उससे अधिक इस वर्ष के प्रारंभ में ही कर रहा है। अमेरिका इसराइल और ईरान के बीच जो कुछ हो रहा है, उसको लेकर संवेदनशील लोगों के हृदय की धड़कनें बढ़ चुकी हैं । कब क्या हो जाएगा और कब किस व्यक्ति के मस्तिष्क में इस युद्ध में परमाणु हथियारों का प्रयोग करने की जिद सवार हो जाएगी ? – इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। जिस समय युद्ध राष्ट्रीय हितों के दृष्टिगत लड़े जाते हैं अर्थात जब यह देखा जाता है कि यदि मैं एक शासनाध्यक्ष के रूप में अपने देश का वर्तमान समय में अपमान सहन कर गया तो इससे भविष्य में मेरे देश के अस्तित्व के लिए कई प्रकार के संकट खड़े हो सकते हैं ? इसलिए य…
[12:56 pm, 4/4/2026] Rakesh Arya Ugta Bharat: प्रकाशन हेतु आज का आलेख
[8:37 am, 8/4/2026] Rakesh Arya Ugta Bharat: मनुस्मृति और भारतीय संविधान,अध्याय 8

राजा और राष्ट्रपति की शपथ में अंतर

संकल्प अथवा प्रतिज्ञा मनुष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। संकल्पशील व्यक्ति संसार के लिए आदर्श बन जाते हैं। इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने कहे हुए वचनों का और अपनी प्रतिज्ञा का सदा ध्यान रखते हैं, वह भी दूसरों के लिए अनुकरणीय बन जाते हैं। भारत में राजा का पद लोक कल्याण के लिए स्थापित किया गया । यही कारण रहा कि लोक कल्याण को अपने लिए सर्वोच्च धर्म मानकर राजाओं ने धर्म के अनुसार चलते हुए राज्य को चलाने की प्रतिज्ञा लेने का शुभारंभ किया। प्रतिज्ञा लेने का अभिप्राय है कि मैं लोक कल्याण के प्रति समर्पित रहूंगा। जीवन में अन्य कार्यों को प्राथमिकता न देकर राजधर्म का निर्वाह करूंगा। उसे अपनी पूरी निष्ठा व पवित्रता के साथ निर्वाह करने का प्रयास करूंगा। मैं जनहित और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखूंगा। उसके लिए अपने निहित स्वार्थ को कभी प्राथमिकता नहीं दूंगा। आज संसार भर में जितने भी देश हैं, उनके राजा, राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री जब पद और गोपनीयता की शपथ लेते हैं तो समझ लीजिए कि वे भारत का ही अनुकरण कर रहे होते हैं।

राजा पृथु की प्रतिज्ञा अथवा शपथ

राजा की प्रतिज्ञा के बारे में ‘शतपथ ब्राह्मण’ (5. 3. 4. 5 ) में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि राजा पृथु संसार के ऐसे पहले राजा थे, जिनका राज्याभिषेक हुआ था। इसी राजा के राजा अभिषेक के साथ शपथ लेने का शुभारंभ हुआ। राजा पृथु ने राज्याभिषेक के उपरांत प्रतिज्ञा ली कि :-

” मैं “पृथु” प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं प्रजा को धरती पर आया ईश्वर मानूंगा , निडर होकर धर्म पर चलता रहूंगा , राग द्वेष को छोड़कर सबको समान मानता हुआ काम, क्रोध, लोभ, अहंकार को दूर फेंककर हर उस व्यक्ति को दंड दूंगा जो धर्म का आचरण नहीं करेगा।”
इन पंक्तियों पर तनिक विचार कीजिए। कुछ लोगों ने राजा के ” दैवीय सिद्धांत ” की आलोचना यह कहकर की है कि जब राजा ने अपने आप को दैवीय शक्तियों से भरपूर देखना आरंभ किया और स्वयं को ईश्वर का अवतार घोषित किया या स्वयं को उस रूप में प्रचारित प्रसारित करना आरंभ किया तो उसके भीतर अहंकार का भाव उत्पन्न हो गया। जिससे वह निरंकुश हो गया। परंतु यदि भारत में सम्राट परंपरा के राजाओं के चरित्र की समीक्षा की जाए और उपलब्ध साहित्य के आधार पर उनका अवलोकन किया जाए तो पता चलता है कि हमारे यहां सम्राट परंपरा के सभी राजा लोक कल्याण के लिए ही कार्य करते रहे। अपवाद स्वरूप कहीं एकाध ऐसा मिलेगा, जिसने इसके विपरीत आचरण किया। यदि कहीं ऐसा कोई राजा दिखाई देता है तो हमारी यह भी परंपरा रही है कि देश की प्रजा को उसके विरुद्ध आंदोलन करने और उसे सत्ता से हटाने का पूरा अधिकार होता था।
इस प्रकार के सिद्धांत को इसलिए भी अनुपयुक्त माना गया है कि राजा दैवीय शक्तियों से निर्मित होकर नहीं आता, अपितु वह संसार में अन्य व्यक्तियों की भांति ही आता है। उसका अधिक महिमामंडन करना उचित नहीं है। राजा के इस प्रकार के महिमामंडन से एक साधारण व्यक्ति को आगे बढ़ने में कठिनाई अनुभव होती है। लोकतंत्र में हर किसी को आगे बढ़ने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। जिसे राजा का दैवीय सिद्धांत बाधित करता है। भारतीय राज्यपरंपरा में इस प्रकार की आलोचना कोई विशेष महत्व नहीं रखती। यदि भारत की राज्य परंपरा को समझा जाए और राजा के लोक कल्याणकारी स्वरूप को तर्क कसौटी पर कसा जाए तो पता चलता है कि इस प्रकार की आलोचना पूर्णतया निराधार है।

राजा अश्वपति का संकल्प

छान्दोग्य उपनिषद ( 5.11.5) में राजा अश्वपति कहते हैं :-

न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः।
नानाहिताग्निर्नाविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतः॥

राजा अश्वपति ने इस शोक में स्पष्ट रूप से यह घोषणा की है कि मेरे राज्य में कोई चोर नहीं कोई कंजूस या मद्यपान करने वाला नहीं है दैनिक अग्निहोत्र न करने वाला भी कोई नहीं है मूर्ख या चरित्रहीन व्यक्ति भी कोई नहीं है।
क्या आज का कोई राजा कोई प्रधानमंत्री अथवा किसी देश का कोई राष्ट्रपति इस प्रकार का संकल्प अथवा शपथ पत्र अपनी ओर से अपने राज्य के बारे में दे सकता है ? यहां पर राजा ने अपने प्रजाजनों के उच्च नैतिक चरित्र का वर्णन किया है। यह तभी संभव है जब राजा अपने राज धर्म के प्रति पूर्णतया समर्पित रहता है।
राजा पृथु द्वारा ली गई उपरोक्त शपथ की पंक्तियों में बहुत उल्लेखनीय शब्दों का प्रयोग किया गया है। यहां पर राजा प्रजा को ही ईश्वर का रूप मान रहा है। राजा पृथु कह रहा है कि ” मैं प्रजा को धरती पर आया हुआ ईश्वर मानूंगा।”
जिन लोगों ने राजा के दैवीय सिद्धांत की आलोचना की है, अब वे लोग इस पंक्ति को पढ़ने के बाद क्या कहेंगे ? यहां तो राजा प्रजा को ही दैवीय शक्तियों से भरा हुआ देख रहा है।

वैदिक धर्म की सत्य साधना का प्रतीक

वास्तव में प्रजा को ही धरती पर आया हुआ ईश्वर मानना वैदिक धर्म की सत्य साधना का प्रतीक है। प्रत्येक व्यक्ति ही ईश्वर की एक अनमोल कृति है। उसे ईश्वर ने संसार में उसकी विशिष्ट भूमिका के लिए चुनकर भेजा है। जिसे केवल और केवल वही पूर्ण कर सकता है। यदि उसकी उस विशिष्ट भूमिका पर यहां लोग पहरा बैठा देते हैं अथवा उसकी प्रतिभा को बाधित और प्रतिबंधित करते हैं तो समझिए कि यह ईश्वर के आदेशों की अवहेलना करना है। उसकी व्यवस्था में हस्तक्षेप करना है। ईश्वर के विषय में हमको ज्ञात होना चाहिए कि वह हमको बसाता भी है और हमारे भीतर बसता भी है। इसलिए उसको वेद ने ” त्वं हि न: पिता वसो ….” कहा है। हमारे भीतर बसने वाले और हमें बसाने वाले उस परमपिता परमेश्वर की व्यवस्था में हम किसी प्रकार बाधक न बनें अपितु उसके अनुकूल चलते हुए अपने धर्म का निर्वाह करते रहें , यही मानव जीवन की सफलता की सबसे बड़ी गारंटी है। यह तभी संभव है जब उसकी प्रत्येक मूर्ति को सम्मान दिया जाए अर्थात प्रत्येक प्राणी के जीवन का सम्मान किया जाए। प्रत्येक मनुष्य में परमपिता परमेश्वर का ही रूप देखा जाए। इसीलिए वैदिक राजा कहता है कि मैं प्रजा को धरती पर आया ईश्वर मानूंगा। हर व्यक्ति के भीतर ईश्वर के दर्शन करूंगा और जिस प्रकार मैं अपने ईश्वर के प्रति ईमानदार होता हूं,उसी प्रकार धरती के इन सभी ईश्वरों ( करोड़ प्रजाजनों को देवता कहना भी संभवत: इसी प्रकार की भावना से प्रचलन में आया ) के प्रति भी ईमानदार रहूंगा उनकी प्रत्येक प्रकार की सुख सुविधा का ध्यान रखूंगा और उनकी पूजा करना अर्थात अपने कर्तव्य धर्म का निष्ठा से निर्वाह करना अपना सबसे बड़ा धर्म समझूंगा।

प्रजा को रियाया मानने वाले शासक

जिन शासकों ने अपने शासन काल में प्रजा को ” रियाया ” मानकर उसमें मुस्लिम को खोजा और अपने आप को मुस्लिम के साथ जोड़ा या अपनी प्रजा में से ईसाई अथवा किसी अन्य संप्रदाय को खोजा और अपने आप को उसी के साथ जोड़ा, उन्होंने भगवान की सेवा नहीं की। भगवान के आदेश का पालन नहीं किया। इसके विपरीत उन्होंने विखंडन वाद और अत्याचार को प्रोत्साहित किया। प्रजा को रियाया मानने वाले शासकों के भीतर कभी भी राजधर्म का कोई गुण विराजमान नहीं रहा। वह लुटेरे थे और उन्होंने राजपद को भी लूट में प्राप्त किया था। उसके बाद उन्होंने लुटेरे के रूप में ही शासन किया।
राजा अपनी शपथ में आगे कहता है कि ” मैं निडर होकर धर्म पर चलता रहूंगा। ” धर्म पर चलना सचमुच बड़ा कठिन कार्य है। किस परिस्थिति में किस मोड़ पर धर्म किस प्रकार हमारे लिए एक परीक्षा की कसौटी लिए खड़ा हो ? कुछ नहीं कहा जा सकता। धर्म पर चलना अपने आपको वीतराग योगी बनाना होता है। जिसमें किसी भी प्रकार का राग और द्वेष प्रकट नहीं होता। बहुत मर्यादित और संतुलित होकर अपने आपको चलाना होता है। कितने ही आवेग, उद्वेग और आवेश कदम – कदम पर हमें भड़काने और भटकाने के लिए खड़े मिलते हैं। उन सबके बीच संतुलन बनाकर चलना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। इसलिए राजा जब इस प्रकार की शपथ ले रहा होता है तो उसके इन शब्दों की गंभीरता को हमें समझना चाहिए। इस प्रकार की शपथ कोई जितेंद्रिय ,आत्मसंयमी, और आत्म विजेता राजा ही ले सकता है। यह शपथ लेना हर किसी के लिए संभव नहीं। जिसने स्वयं पर विजय नहीं प्राप्त की, जिसने आत्म संयम नहीं बनाया, वह धर्म पर नहीं चल सकता और जो धर्म पर नहीं चल सकता, वह दूसरों को धर्म पर चला भी नहीं सकता। दूसरों को धर्म पर वही चला सकता है जो स्वयं धर्म पर चलता हो। सचमुच ऐसी शपथ कोई वैदिक राजा ही ले सकता है। जिसने सत्य सनातन वैदिक धर्म की मान्यताओं और सिद्धांतों को हृदयंगम कर लिया हो। जिसने आत्मविजय का मधुरस प्राप्त कर लिया हो। निडर होकर धर्म पर तभी चला जा सकता है जब व्यक्ति स्वयं निष्पाप हो।
पापी व्यक्ति को तो हमेशा असुरक्षा का भाव खटकता रहता है।

राग द्वेष को छोड़ने वाला राजा

राजा आगे कह रहा है कि ” मैं राग द्वेष को छोड़कर सबको बराबर मानता हुआ काम, क्रोध, लोभ, अहंकार को दूर फेंककर हर उस व्यक्ति को दंड दूंगा जो धर्म का आचरण नहीं करेगा।”

राग द्वेष को छोड़ना कठिन बहुत यह काम।
छोड़ वही पाता इन्हें , होता जो निष्काम।।

राग द्वेष को छोड़ना और काम, क्रोध, लोभ,अहंकार को दूर फेंकना भी किसी वीतराग योगी के लिए ही संभव है। किसी ऐसे दार्शनिक के लिए ही संभव है जिसने आत्मतत्व को जान लिया हो। परमात्मतत्व को जान लिया हो। जिसने इतनी बड़ी विजय प्राप्त कर ली हो, इस सत्य को समझ लिया हो वही अपने आप को समझ पाता है । अपने जीवन के उद्देश्य को समझ पाता है और संसार में वह क्यों आया है – इस सत्य को समझ पाता है। इस प्रकार शपथ के इन शब्दों में भी राजा की योग्यता की पराकाष्ठा स्पष्ट परिलक्षित हो रही है।
इतनी बड़ी योग्यता बिना तत्वज्ञान की प्राप्ति के संभव नहीं है। कोई ज्ञानी – ध्यानी ही ऐसी स्थिति को प्राप्त हो सकता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे राजा कितने बड़े ज्ञानी ध्यानी हुआ करते थे ? उनके ये शब्द कहने मात्र तक सीमित नहीं होते थे, वे इसी के अनुसार अपने जीवन को बना कर भी दिखाते थे। उनकी स्पष्ट मान्यता होती थी कि:-

नास्ति विद्यासमं चक्षुः नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥

अर्थात ” विद्या के समान कोई चक्षु (आँख) नहीं है, सत्य के समान कोई तप नहीं है, राग (वासना, कामना) के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।”
यजुर्वेद 10/26 में भी बड़ी उत्तमता से देश के राष्ट्रपति की प्रतिज्ञा के विषय में चिंतन किया गया है । वेद का ऋषि कह रहा है कि ” हे राजन ! यह आसंदी या राजगद्दी आपके लिए स्योना अर्थात सोहना है । जिसका अभिप्राय है कि यह आपके लिए सुखदायक है । इस पर आप बैठो । आगे ऋषि कहता है कि राज्य सिंहासन आपके लिए सुषदा है। प्रजा के सुखार्थ बैठने योग्य है, अर्थात आपको प्रजा के सुख के साधन बनाने के लिए इस पर बैठना है । इस पर बैठकर आप को प्रजा के आत्मिक ,मानसिक ,शारीरिक सभी प्रकार के विकास की सभी योजनाओं पर काम करना है ।”
जब राजा अपनी आसंदी अथवा राजगद्दी पर बैठकर प्रजा के लिए न्याय करता है तो उसके लिए उसकी गद्दी सुखदायक हो जाती है। सुख की प्रतीक हो जाती है और जब वह उस पर बैठकर पाप कर्म करता है और जनता के हितों के विपरीत उसका शोषण करने पर उतर आता है तो वही आसंदी अथवा राजगद्दी उसके लिए कांटों की शय्या बन जाती है।

वेद, ज्ञान का आदि स्त्रोत

वेद यदि सृष्टि का आदि ग्रंथ है तो संसार के लोगों को, राजनीति के विद्वानों को और राजनीतिशास्त्रियों को एक स्वर से यह घोषणा करनी चाहिए कि राजनीतिशास्त्र के लिए आदर्श वाक्य और आदर्श ज्ञान स्रोत कहीं मिल सकता है तो वह वेद में ही मिल सकता है। वेद के अनुसार बनाई गई मनुस्मृति में मिल सकता है।
यजुर्वेद का ऋषि कह रहा है कि राज्य सिंहासन राजा के लिए अपना गौरव बढ़ाने के लिए नहीं है अर्थात उसे इस भूल से बाहर निकलना चाहिए कि वह गद्दी पर बैठकर सुशोभित हो रहा है अपितु उसे अपने कर्तव्य कर्म और व्यक्तित्व से राज्य सिंहासन को ही सुशोभित करना चाहिए और यह तभी संभव है जब वह प्रजा हित चिंतन के कामों में लगा रहेगा।
राजा के प्रजा हितैषी कार्यों से उसका सिंहासन उसके लिए आभूषण बन जाता है और अपने पाप पूर्ण आचरण से वह सिंहासन के लिए बन जाता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह प्रजा के लिए ही संकल्प लेगा । प्रजा के लिए ही व्रत धारण करेगा और प्रजा के लिए अर्थात उसके कल्याण के लिए ही प्रतिज्ञा धारण करेगा।
राजा का अपना कोई संकल्प नहीं होता, अपना कोई व्रत नहीं होता और अपने लिए कोई प्रतिज्ञा नहीं होती। इसलिए राजा का अपने लिए कोई समय भी नहीं होता अर्थात उसका कोई व्यक्तिगत जीवन भी नहीं होता। राष्ट्र और संगठन के ऐसे नेताओं के होने से ही राष्ट्र और संगठन आगे बढ़ते हैं।
कौटिल्य ने राजा के लिए लिखा है कि उसे चौबीसों घंटे प्रजा का ही हितचिंतन करना चाहिए। प्रजा हित में ही लगा रहना चाहिए :-

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥

भावार्थ: प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, यदि प्रजा सुखी है, समृद्ध है, प्रसन्न है तो राजा का होना सार्थक है। यदि राजा के रहते प्रजा में दुःख – दारिद्रय, कष्ट – क्लेश फैला हुआ है तो राजा का होना निरर्थक है। इसलिए राजा को प्रजा हित का ध्यान रखते हुए प्रजाहित में काम करने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए । जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे , उसमें है।
मुस्लिम काल में और उसके पश्चात ब्रिटिश काल में भारत में देश की जनता विदेशी शासकों के विरुद्ध स्वाधीनता का संघर्ष करती रही। इसका कारण केवल एक ही था कि उस समय के शासको का धर्म ‘ लूट ‘ हो गया था। लोकतंत्र में उनकी आस्था नहीं थी और प्रजाहित में सोचना उनके लिए संभव नहीं था। कौटिल्य ने राजा के लिए यह भी व्यवस्था दी है कि :-

तस्मान्नित्योत्थितो राजा कुर्यादर्थानुशासनम्् ।
अर्थस्य मूलमुत्थानमनर्थस्य विपर्ययः ॥

इसलिए राजा को चाहिए कि वह नित्यप्रति उद्यमशील होकर अर्थोपार्जन तथा शासकीय व्यवहार संपन्न करे अर्थात वह स्वयं तो उद्यमशील हो ही देश की जनता को भी उद्यमशील बनाने के लिए कार्य करे। प्रमादी आलसी राजा और प्रमादी आलसी प्रजा मिलकर राष्ट्र का अहित करते हैं। कौटिल्य कहते हैं कि उद्यमशीलता ही अर्थ (संपन्नता) का मूल है एवं उसके विपरीत उद्यमहीनता अर्थहीनता का कारण है ।
यदि राजा और प्रजा आलसी हैं उद्यमशील नहीं हैं तो योगक्षेम का विनाश हो जाता है।

अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च ।
प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम् ॥

कौटिल्य कहते हैं कि उद्यमशीलता के अभाव में पहले से जो प्राप्त है एवं भविष्य में जो प्राप्त हो पाता उन दोनों का ही नाश निश्चित है अर्थात योगक्षेम नष्ट हो जाता है। राष्ट्र की उन्नति के लिए राजा और प्रजा दोनों मिलकर योगक्षेम की साधना करें। उसके लिए पुरुषार्थ करें। प्रयास करें। प्रयत्न करें।।उद्यम करने से ही वांछित फल प्राप्त होता है और उसी से आर्थिक संपन्नता मिलती है।

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति पद की शपथ

भारत के राष्ट्रपति की शपथ संबंधी प्राविधान अनुच्छेद 60 में दिया गया है। सामान्य रूप से भारत का राष्ट्रपति इन शब्दों में अपने पद की शपथ लेता है :-
“मैं, (नाम), ईश्वर के नाम पर शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं भारत के राष्ट्रपति के पद का निष्ठापूर्वक निर्वहन करूँगा/करूँगी और अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि (कानून) का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूँगा/करूँगी और मैं भारत की जनता की सेवा और कल्याण में निरत (समर्पित) रहूँगा/रहूँगी।”
अब आप भारत के संविधान में राष्ट्रपति की इस शपथ का राजा पृथु की इस प्रतिज्ञा के साथ तुलना कीजिए :-
” मैं “पृथु” प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं प्रजा को धरती पर आया ईश्वर मानूंगा , निडर होकर धर्म पर चलता रहूंगा , राग द्वेष को छोड़कर सबको बराबर मानता हुआ काम, क्रोध, लोभ, अहंकार को दूर फेंककर हर उस व्यक्ति को दंड दूंगा जो धर्म का आचरण नहीं करेगा।”
इन दोनों प्रतिज्ञाओं में जमीन आसमान का अंतर है। हमारा आज का राष्ट्रपति प्रजा को अर्थात देश के आर्यजनों को धरती पर आया ईश्वर नहीं मानता, वह यह भी नहीं कहता कि मैं निडर होकर धर्म पर चलता रहूंगा। वह काम, क्रोध, लोभ, अहंकार को दूर फेंककर अर्थात इन पर विजय प्राप्त कर प्रत्येक उस व्यक्ति को दंड देने की बात भी नहीं करता जो धर्म का आचरण नहीं करेगा। यह चिंतन का अंतर है। सामान्य रूप से संसार में यह माना जाता है कि हम निरंतर विकास की ओर आगे बढ़ रहे हैं, यानी हम चिंतन के जिस स्तर पर बीते हुए कल में खड़े थे ,वहां आज नहीं हैं, आज उससे कुछ आगे बढ़े हैं और अपेक्षा की जाती है कि आने वाले कल में और भी आगे बढ़ेंगे। परंतु भारत के ऋषियों के चिंतन के संदर्भ में हमारी स्पष्ट मान्यता है कि वह अपने काल में जहां खड़े थे, वहां से हम निरंतर पीछे हटते जा रहे हैं। जिस दिन भारत इस वास्तविकता को समझ लेगा, उस दिन का भारत सचमुच सनातन के प्रति समर्पित होकर दौड़ने लगेगा… और हमें दौड़ने की ही आवश्यकता है।
हमें विधि के प्रति समर्पित होकर उसके परिरक्षण ,संरक्षण, और प्रतिरक्षण की आवश्यकता नहीं है। हमें अपने ऋषियों के मौलिक चिंतन के प्रति समर्पित होकर उनकी धार्मिक व्यवस्थाओं, नैतिक मर्यादाओं, आदर्श जीवन चरित्र, आदर्श जीवन शैली, आदर्श राजनीतिक व्यवहार और आदर्श सामाजिक संस्कारों के प्रति समर्पित होने की आवश्यकता है। इन्हीं बातों का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करना हमारे राष्ट्रपति की शपथ में झलकना चाहिए। बौद्धिक क्षमताएं अपने आप पैदा करनी पड़ती हैं। उन्हें उधार पर लेकर जीवन बसर करना, किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता।
हमारे प्राचीन आर्य राजाओं की शपथ में उनका पराक्रम दिखाई देता है। राष्ट्र का संचालन पराक्रम से ही किया जा सकता है नदी के किनारे किनारे चलकर आप नदी पार नहीं कर पाएंगे। नदी को पार करने के लिए या तो नदी में कूदना पड़ेगा या नौका का सहारा लेना पड़ेगा। इसी प्रकार समस्याओं पर लीपापोती करके आप उनका समाधान नहीं खोज सकते। समाधान खोजने के लिए उस मानसिकता का उपचार करना ही पड़ेगा जो राष्ट्र की प्रगति में बाधक है। इस प्रकार की राष्ट्र विरोधी मानसिकता का उपचार करने के लिए पराक्रम को अपनाना आवश्यक होता है। अथर्ववेद का मन्त्र ( 6/10/18/1 ) हमें बताता है कि राजा व सभापति ऐसा हो जो देश के मनुष्यों के समुदाय में परम ऐश्वर्य का कर्ता हो तथा शत्रुओं को जीत सके। उनके भीतर पराक्रम का भाव उत्पन्न कर सके। उनको शौर्य संपन्न बना सके। उन्हें शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर सके। राजा ऐसा होना चाहिए जो शत्रुओं से पराजित न हो। उसे अपने अन्य समकक्ष राजाओं में सर्वोपरि विराजमान प्रकाशमान होना चाहिए ।उसके प्रशंसनीय गुण कर्म स्वभाव सभी के लिए सत्करणीय हों। उसे अपने देश के सभी प्रजाजनों अथवा बहुमत का सम्मान प्राप्त होना चाहिए। जिसमें इस प्रकार के गुण उपलब्ध हों ,ऐसे व्यक्तित्व को ही देश का राजा अथवा राष्ट्रपति बनाकर देश की तीन शीर्ष सभाओं का सभापति बनाना चाहिये।
इस संबंध में स्वामी दयानंद जी महाराज भी लिखते हैं कि :-” कम से कम दस विद्वानों अथवा बहुत कम हों तो तीन विद्वानों की सभा जैसी व्यवस्था करे उस धर्म अर्थात् व्यवस्था का उल्लंघन कोई भी न करे।”
यहां पर यह बात उल्लेखनीय है कि यदि विद्वानों के माध्यम से कोई निर्णय लिया जाता है अथवा किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है अथवा किसी समस्या का कोई समाधान खोजा जाता है तो वह न्यायसंगत ही होगा। क्योंकि विद्वान लोग पक्षपात शून्य होकर निर्णय लेते हैं। बिना किसी राग द्वेष से प्रभावित होकर निर्णय लेते हैं। ऐसे विद्वानों के द्वारा लिया गया निर्णय समाज हित और राष्ट्रहित में होता है। इसलिए स्वामी दयानंद जी महाराज कह रहे हैं कि जब ऐसे विद्वानों की सभा द्वारा कोई निर्णय लिया जाए अर्थात जब उनके द्वारा कोई व्यवस्था प्रतिपादित कर दी जाए तो उस धर्म अर्थात व्यवस्था का उल्लंघन कोई भी ना करे। यहां पर धर्म को व्यवस्था के साथ जोड़कर स्वामी दयानंद जी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि धर्म किसी बाहरी दिखावे का नाम नहीं है। धर्म एक व्यवस्था की ओर संकेत करता है अथवा कहिए कि धर्म एक व्यवस्था का स्वरूप है। जिसे निभाने के लिए सभी को प्रयास करना चाहिए।
धर्म के इस मर्म को यदि समझा जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि आज हम जिस प्रकार धर्म शब्द को लेकर लड़ रहे हैं, वह सब व्यर्थ ही है और हमारे बौद्धिक दिवालिएपन का प्रतीक भी है।

नोट: लेखक की यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है

डॉ राकेश कुमार आर्य