पत्रकारिता के पुरोधा : विद्यार्थी जी

”जो कलम सरीखे टूट गये पर झुके नहीं, उनके आगे यह दुनिया शीश झुकाती है

जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गई, वह तो मशाल की तरह उठाई जाती है”

Image3981राष्ट्रवादी विचारधारा से लबरेज ये पंक्तियां सुकवि रामकृष्ण श्रीवास्तव ने उस दौर में लिखी थी जब हमारे देश के युवा ब्रिटिश साम्रायवाद के विरुध्द संघर्ष का शंखनाद कर रहे थे। ये पंक्तियां स्वराज के लिए अपना तन, मन, धन और जीवन समर्पित कर देने वाले अमर शहीद और कलम के धनी जनयोध्दा गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे जुझारू व्यक्तित्व की शान में ही लिखी गई थी। विद्यार्थी जी ने पत्रकारिता के जरिये स्वराज को जनांदोलन बना डाला और अपने जीवन में 5 बार जेलयात्रा करके भी ब्रिटिश सरकार के विरुध्द उनका जोश दिन ब दिन बढ़ता गया। हम दावे से ये कह सकते है कि गुलामी के जीवन से देशवासियों को मुक्ति दिलाकर जिन राष्ट्रनायकों ने स्वराज की कल्पना को साकार कर दिखाया उसके शिल्पी गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे ही अनेक वीर थे जिनके नाम की मिसाल भारत की आजादी के इतिहास में सदा सदा के लिए सुनहरे पृष्ठ पर अंकित हो गई है।

मध्यप्रदेश की वीर प्रसूता भूमि ने राष्ट्रकी आजादी के लिए जो जननायक जन्मे गणेश शंकर विद्यार्थी जी भी उनमें से एक थे। 26 मार्च 1890 को जन्मे विद्यार्थी जी का बचपन विदिशा और मुंगावली में बीता। किशोर अवस्था में उन्होंने समाचार पत्रों के प्रति अपनी रुचि को जाहिर कर दिया था। वे उन दिनों प्रकाशित होने वाले भारत मित्र, बंगवासी जैसे अन्य समाचार पत्रों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करते थे। इसका असर यह हुआ कि पठन पाठन के प्रति उनकी रुचि दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने अपने समय के विख्यात विचारकों वाल्टेयर, थोरो, इमर्सन, जान स्टुअर्ट मिल, शेख सादी सहित अन्य रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया। वे लोकमान्य तिलक के राष्ट्रीय दर्शन से बेहद प्रभावित थे। महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरूआत की थी जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वे स्वभाव से उग्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जी ने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में ‘हमारी आत्मोसर्गता’ नामक एक किताब लिख डाली थी। वर्ष 1911 में भारत के चर्चित समाचार पत्र ‘सरस्वती’ में उनका पहला लेख ‘आत्मोसर्ग’ शीर्षक से प्रकाशि हुआ था, जिसका संपादक हिन्दी के उद्भूत, विध्दान, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा किया जाता था। वे द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं विचारों से प्रभावित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आये। श्री द्विवेदी के सानिध्य में सरस्वती में काम करते हुए उन्होंने साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति अपना रुझान बढ़ाया। इसके साथ ही वे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’ से भी जुड़ गये। इन समाचार पत्रों से जुड़े और स्वाधीनता के लिए समर्पित पंडित मदन मोहन मालवीय, जो कि राष्ट्रवाद की विचारधारा का जन जन में प्रसार कर सके। अपने सहयोगियों एवं वरिष्ठजनों से सहयोग मार्गदर्शन का आश्वासन पाकर अंतत: विद्यार्थी जी ने 9 नवम्बर 1913 से ‘प्रताप’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। इस समाचार पत्र के प्रथम अंक में ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि हम राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए, अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे। विद्यार्थी जी ने अपने इस संकल्प को प्रताप में लिखे अग्रलेखों को अभिव्यक्त किया जिसके कारण अंग्रेजों ने उन्हें जेल भेजा, जुर्माना किया और 22 अगस्त 1918 में प्रताप में प्रकाशित नानक सिंह की ‘सौदा ए वतन’ नामक कविता से नाराज अंग्रेजों ने विद्यार्थी जी पर राजद्रोह का आरोप लगाया व ‘प्रताप’ का प्रकाशन बंद करवा दिया। आर्थिक संकट से जूझते विद्यार्थी जी ने किसी तरह व्यवस्था जुटाई तो 8 जुलाई 1918 को फिर प्रताप की शुरूआत हो गई। प्रताप के इस अंक में विद्यार्थी जी ने सरकार की दमनपूर्ण नीति की ऐसी जोरदार खिलाफत कर दी कि आम जनता प्रताप को आर्थिक सहयोग देने के लिए मुक्त हस्त से दान करने लगी। जनता के सहयोग से आर्थिक संकट हल हो जाने पर साप्ताहिक प्रताप का प्रकाशन 23 नवम्बर 1990 से दैनिक समाचार पत्र के रुप में किया जाने लगा। लगातार अंग्रेजों के विरोध में लिखने से प्रताप की पहचान सरकार विरोधी बन गई और तत्कालीन मजिस्टेट मि. स्ट्राइफ ने अपने हुक्मनामें में प्रताप को ‘बदनाम पत्र’ की संज्ञा देकर जमानत की राशि जप्त कर ली। अंग्रेजों का कोपभाजन बने विद्यार्थी जी को 23 जुलाई 1921, 16 अक्टूबर 1921 में भी जेल की सजा दी गई परन्तु उन्होंने सरकार के विरुध्द कलम की धार को कम नहीं किया। जेलयात्रा के दौरान उनकी भेंट माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सहित अन्य साहित्यकारों से भी हुई।

विद्यार्थी जी ने स्वराज के लिए किये गये अपने संघर्ष को अंग्रेजी राज के विरोध तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि उन्होंने देश के भीतर सामंतवाद, पूंजीवाद से भी संघर्ष किया। वे कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता बनकर भले ही अहिंसात्मक आंदोलन में अपनी भागीदारी निभाते रहे परन्तु उनका असली काम तो क्रांतिकारियों का समर्थन करना था। विद्यार्थी से गहरी मित्रता थी। काकोरी काण्ड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा को उन्होंने ‘प्रताप’ की प्रेस से ही प्रकाशित किया था। भगतसिंह ने अपने फरारी के दिनों में छद्म नाम से ‘प्रताप’ में पत्रकारिता की थी। क्रांतिकारी विचारधारा के कारण ‘प्रताप’ और विद्यार्थी जी सदैव अंग्रेजों के निशाने पर रहे। विद्यार्थी जी ने सामंती शोषण और किसानों के दमन उत्पीड़न का भी जोरदार विरोध किया। कानपुर के मिल मजदूरों को उनका वाजिब हक दिलाने की लड़ाई प्रभावी ढंग से लड़ी तथा वे उसमें सफल रहे।

विद्यार्थी जी साम्प्रदायिक के घोर विरोधी थे और उन्होंने जीवनभर एकजुटता, कौमी एकता पर जोर दिया। भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद देश भर में जो साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए विद्यार्थी जी ने उन्हें रोकने के लिए पूरी ताकत लगा दी लेकिन दंगों को रोकने का प्रयास करते हुए वे कानपुर में राष्ट्रविरोधी ताकतों के शिकार बन गये। 25 मार्च 1931 को इस देशप्रेमी का देहान्त हो गया, लेकिन विद्यार्थी जी की जीवनगाथा आज भी देशप्रेमियों की राह रोशन करती दिखाई देती है। उनकी शहादत को हम सादर नमन करते है।

-अमिताभ पाण्डेय

1 COMMENT

  1. आप अपने पोर्टल पर छतरपुर जिला के समाचार भी प्रकाशित करते रहे. संतोष गंगेले

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