पुरखौती गीतों में मीणी मातृभाषा, संस्कृति और इतिहास

डॉ. हीरा मीणा

भाषा सबसे बड़ी विरासत है, जो हजारों सालों से मानव के साथ-साथ जीवित है। भाषा प्रमुख रूप से चार प्रकार की होती हैं, आंगिक भाषा, चित्रलिपि भाषा, मौखिक भाषा और लिखित भाषा। संसार की भाषाओं का विकासक्रम हज़ारों सालों से आंगिक, चित्रलिपि, मौखिक और लिखित रूप में मानव के साथ-साथ जीवित है। पुरखौती का अर्थ- पुरखों की कहन परंपरा से है। पुरखौती कहन परंपरा हजारों सालों से चली आ रही है, जो मानव मेधा के विशाल मौखिक भंडार है। पुरखौती ज्ञान भंडारों की चाबी मातृभाषाएँ ही हैं। मातृभाषाएँ वे भाषाएँ हैं जो जन्म के साथ बच्चे को अपनी माँ, दादी, नानी, परिवार और समुदाय से मिलती है।
मातृभाषाएं संसार के ज्ञान का विशाल भंडार है। आदिम जनजीवन की भाषा- बोलियाँ ही संसार की भाषाओं की जननी हैं। संसार के पुरखौती गीतों की जननी उनकी मातृभाषाएं ही हैं। सृष्टि के आदिकाल में सामाजिक चेतना के साथ पुरखा गीतों का जन्मज हुआ। इन गीतों का संबंध सामान्यक जनजीवन के जीवंत क्रिया-कलापों और नैसंर्गिक भावों से रहा हैं। पुरखों के कण्ठन की मौखिक परम्पजरा की अनमोल धरोहर पुरखौती-मौखिक गीत है, इसलिए इसे पुरखों के मानस की मौलिक चित्तपवृत्तियों के कोष कहा जाता है। वाचिक गीतों का उदय विभिन्नए अवसरों पर हुआ है। मौखिक गीत भावाकुल हृदय की सहज, सरल, अनायास और स्वभाविक अभिव्युक्ति हैं। ये समुची संस्कृकति की स्मृसत और स्रुत मेधा के भंडार और पहरेदार हैं। पुरखां गीतों के माध्यमम से लोक मौखिक रूप में स्वियं को खोलता हैं। आदिम लोक के पास सहजता है, सरलता है, खुलापन है, असीम धरती और अनंत आकाश हैं। लोकगीतों की जीवंतता मातृभाषाओं की अमृत सलीला से निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं।
आदिवासियों का प्राचीन साहित्यत है, जिसे अकादमिक जगत में ‘लोक’ और ‘फोक’ कहा जाता है और हम आदिवासी जिसे ‘पुरखां’-’पुरखौती’ साहित्यप कहते हैं, यह साहित्यत कोई कल्प ना का साहित्य नहीं है बल्कि वास्तिविक अनुभवों से रचा-बसा सच्चाेई का साहित्य हैं। इसीलिए हम आदिवासी साहित्यय को ‘मौखिक’, ‘वाचिक’, ‘ऑरेचर’ कहते हैं जो कोई ‘फिक्श न’ या ‘गल्पक‘ नहीं हैं, यह जीवंत भोगा हुआ सच हैं।
वाचिक परम्पदरा के लोकगीत संपूर्ण संसार को उर्जावान और गतिमान बनाकर अस्तित्व-, अस्मिता, संघर्ष, इतिहास और संस्कृिति का पाठ भी पढ़ाते हैं। आदिवासी समुदायों की भाषाएं संसार की प्राचीनतम मातृभाषाएं हैं। भारत में आदिवासी भाषाओं को पॉंचों भाषा परिवारों में पुरखौती/वाचिक और लिखित रूप में देखा जा सकता है इसीलिए आदिवासी भाषाओं को पूर्व आर्य भाषा कहा जाता हैं। भारत में पाये जाने वाले पॉंचों भाषा परिवारों में आदिवासी भाषा और बोलियों का होना इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं। आर्यों की भाषा संस्कृत सिर्फ एक भाषा परिवार भारोपीय भाषा परिवार की मानी जाती हैं। भारत के इन पॉचों भाषा परिवारों में आदिवासी साहित्यस मौखिक रूप में अधिक और लिखित रूप में कम मौजूद हैं।

  1. आस्ट्रो -एशियाटिक भाषा परिवार
  2. चीनी-तिब्बसती भाषा परिवार
  3. द्रविड भाषा परिवार
  4. अंडमानी भाषा परिवार
  5. भारतीय आर्य भाषा परिवार।

आदिवासी साहित्यतकार वंदना टेटे के विचारानुसार “भाषा ही हमारी पहचान, अस्मिता, संस्कृीति और इतिहास को बचाने की प्रमुख कड़ी हैं। यह हमारी सांस्कृहतिक एकता का भी सबसे प्रमुख और केन्द्रीहय तत्व है। कोई भी भाषा सिर्फ गीत-संगीत और वाचिक अभिव्य्क्ति भर नहीं होती बल्कि उसमें एक पूरी परंपरा, संस्कृकति और जीवन मूल्यव समाहित होते हैं।”
कुछ भाषाएँ इस प्रकार की भी हैं, जिन्हें हम इन भाषा परिवारों के अंतर्गत समाहित करने में पूरी तरह समर्थ नहीं हो पाते। डॉ. पिंटू कुमार मीणा के अनुसार, “लगभग 11 पुरातात्विक और मानवशास्त्रियों ने सैंधव सभ्यता को प्रोटो द्रविड़ियन सभ्यता के रूप में स्वीकार किया है। द्रविड़ियन सभ्यता से पूर्व की इस सभ्यता के बाशिंदे भील, गोंड और मीणा थे।” अब ऐसी स्थिति में या तो इन समुदायों की भाषाओं को ‘प्रोटो द्रविड़ियन भाषा परिवार’ के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए या फिर सरलीकरण करते हुए एक चले आ रहे भाषिक पैरामीटरों के तहत द्रविड़ भाषा परिवार के अंतर्गत स्वीकार किया जाना चाहिए। “सांस्कृतिक संपर्क के फलस्वरूप आदिवासी भाषाओं में आर्यभाषाओं के शब्द घुल-मिल गए।”
राजस्थाान के मीणा आदिवासी समाज की मातृभाषा “मीणी भाषा” की मुख्यघ रूप से 11 बोलियॉं हैं : 1. राठी 2. जगरोटी 3. डांगी 4. माड़ी 5. तलहटी 6. नागर चाड़ी 7. हाडौती मीणी 8. मेवाड़ी मीणी 9. गोडवाणी मीणी 10. शेखावाटी मीणी 11. ढूंढाणी-पचवारी मीणी।
ढूंढ नदी के विस्ता र क्षेत्र में आनी वाली भू सीमाओं को ढूंढाड़ क्षेत्र कहा जाता है और यहॉं बोली जाने वाली भाषा बोली को ढूंढाणी कहते हैं।
ढूंढाड़ी और ढूंढ़ाणी एक भारतीय आर्य भाषा के रूप में चिन्हित की हुई है जो पूर्वोत्त र राजस्थाीन के ढूंढाड़ क्षेत्र में बो‍ली जाती है। ढूंढाणी बोलने वाले मुख्या रूप से राजस्थाान के जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, टोंक, अलवर जिलें में रहते हैं। ‘चार कोस पर पाणी बदळे, आठ कोस पर बाणी’ यह लोकोक्ति यहॉं की बोली भाषा पर बेहद प्रासंगिक है। यहॉं रहने वाले मीणा समुदाय की भाषा में शब्दोंह के उच्चाभरण में क्रिया के अंत में ‘ण’, ‘यो’ का प्रयोग होता है ‘न’ का नहीं। जैसे आणा, जाणा, खाणा, पीणा, रहणा, सोणा, बैठणा, चलणा – आयो, गयो, खायो, पीयो, रह्यो, सोयो, बैठ्यो, चाल्योण आदि। क, ख, छ, द, म, न, र वर्णों का वाक्यों में स्वतंत्र प्रयोग होता है। जो आगे आने वाले पुरखा गीतों में प्रमाणिक रूप से देखे जा सकते हैं। वाक्योंं के अंत में ‘है’ कि बजाय ‘छ’ का प्रयोग होता है जैसें कांई करयो छ, कोडअ जाणो छ, पाणी पी रह्यो छू, रोटी खारयो छू, कोडअ गयो छो आदि शब्दोंा और वाक्योंत का प्रयोग किया जाता हैं।
प्रोफ़ेसर रामलखन मीणा ने अपने भाषाई सर्वेक्षण के उपरांत एक महत्त्वपूर्ण बात कही, “मीणा भाषा राजस्थान की प्रमुख आदिवासी मीणा-मीना समुदाय द्वारा बोली जाने वाली प्रमुख भाषा है। मीणा समुदाय के अतिरिक्त कई अन्य समुदायों द्वारा भी इसे बोला जाता है। मीणा भाषा के दो उपरूप मिलते हैं जिनमें उत्तरी मीणा भाषा और दक्षिणी मीणा भाषा प्रमुख हैं। साथ ही भीलवाड़ा के जहाजपुर, कोटड़ी, मांडलगढ़, चित्तोडगढ के मेनाल और बेगू में भी इसका एक अन्य रूप प्रचलन में है। मीणा भाषा को पूर्वधारणाओं के आधार पर हाड़ौती और ढूंढाड़ी बोलियों में शामिल किया गया था, जो भाषा-तात्विक दृष्टि से बिल्कुल गलत तथ्य है। तार्किक दृष्टि से भी यह तर्क संगत नहीं है कि राजस्थान के दक्षिणी छोर से लेकर उत्तरी छोर के हजारों मील तक एक ही भाषा का प्रभाव क्षेत्र है।” अर्थात मीणी भाषा की कई बोलियाँ हैं। जिन बोलियों में थोड़ा बहुत लेखन हुआ था उन्हें अलग भाषा का नाम दे दिया गया जबकि हाड़ौती और ढूंढाड़ी भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से मीणी भाषा की ही बड़ी बोलियाँ (समाज भाषा विज्ञान की दृष्टि से भाषाएँ) हैं।
“संस्कृँति के अजस्र प्रवाह की निरंतरता एवं समानता का एकमात्र आधार भाषा है। इसलिए कहा जा सकता है कि भाषा तथा संस्कृ ति का अभिन्ना संबंध है भाषा का इतिहास ही संस्कृ ति का इतिहास माना गया है। सांस्कृएतिक जीवन मूल्योंह, आस्थालओं, विश्वा सों तथा निष्ठा्ओं के साथ भाषा, शब्द , प्रतीक तथा अभिव्य क्ति के रूप में एक साथ आगे बढ़ती है अत: भाषा संस्कृहति की वाहक ही नहीं पोषक भी है। क्षेत्रीय सांस्कृोतिक अध्येयन की दिशा में वहॉं की भाषा अथवा बोली के एक-एक शब्द में स्थासनीय चेतना एवं परंपरा का विकास निहित मिलता है।“
राजस्थािन के मीणा आदिवासी समुदाय में पुरखां लोकगीतों की जननी स्त्रियॉं ही हैं। लोकमानस के सुख-दुःख, हास-परिहास, पर्व-त्यौ।हार, रीति-रिवाज, खेती, पशुपालन एवं जन्मा से लेकर मृत्युा तक के संस्काोर आदि गतिविधियॉं लोकगीतों के स्वंरों की असीम उर्जा से ही संभव हो पाती है। ये पारंपारिक और दैनिक जीवन से संबंधित लोकगीत किसी पुस्त क से नहीं बल्कि सीधे पुरखां लोक हृदय से समाज में उतरें हैं। ये मौखिक, श्रुत एवं स्मृतत रूप में पुरखौती कण्ठर में निरंतर प्रवाहमान है। ये मौखिक परंपरा अनुश्रुति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी द्वारा अनमोल धरोहर के रूप में सहेजे हुए हैं। पुरखौती गीतों की सदियों से चलने वाली परंपरा का सृजन करने वाली नानी, दादी, मॉं अपनी बेटी, बहूँ, नाती, पोती को पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में सौंपती रहती हैं।
डॉ. अनसूया अग्रवाल के अनुसार ‘“लोकगीत लोकजीवन के स्व र है, दर्पण है और द्वार भी, जिनमें प्रवेश करके लोकजीवन का सब कुछ देखा-सुना जा सकता है।”

मीणा स्त्री पुरुषों के पुरखा गीतों की बीस से भी अधिक गायन शैलियाँ प्रचलन में हैं, इनमें अऊत, पित्तर , भौम्या, भैरूं, बालाजी, माता गीत, पद, साखी, ढाँचा, सुड्डा, उछाटा, ग्याड़, नेहाड़ा, दंगल, हेला, ख्याला, रसिया, कन्हैया, गोठ, फागुरियां, लांगुरियां, जागरण, तेल मांडा, चाक-भात, जन्म-ओरनाळ गीत, त्योहार गीत, मेळा, कीर्तन, खेत क्यार के गीत, डंडेळ गीत आदि प्रमुख हैं|
डॉ. शकुंतला मीणा के अनुसार “मीणा जनजाति के लोकगीत कई रूपों में मिलते है, जैसे बालगीत, स्त्रीण गीत, पुरूष गीत, दंगल, कन्हैिया, रसिया, ख्याकल, गोठ, फागुरिया, बरवाण जागरण, नृत्य्गीत, जनगीत, पर्व उत्स व, त्यौ‍हार, ऋतु, मेला, संस्कातर आदि गीत गाये जाते है।”
साहित्यी का उद्देश्यग मनुष्यज को सामाजिक बनाना है। संपूर्ण जन-जीवन और पर्यावरण के प्रति मानवीय बनाने का कार्य पुरखौती गीत परंपरा का ज्ञान करता है। आदिवासी समाज के गीतों में खेत, खलियान, पशु-पक्षी, जंगल, पहाड़, नदियां, टीलें, झाड़, धरती, आकाश, बादल, बिजली, हवा, धुप, छाया, पेड़-पौधें, भैस, बकरी, गाय, बैल और प्रकृति के सब रूप नैसर्गिक रूप में उपस्थित रहते हैं।
पुरखां आदिवासी समाज के पूर्वज होते हैं। संसार भर के आदिवासी अपने पुरखों के साथ रहते आये है। आदिवासी समाज प्रकृतिवादी है, आदिधर्मी है, धर्मपूर्वी है। प्रकृति, वनोपज, कृषि और पशुपालन आधारित जीवन के कारण आदिवासी समाज पर्यावरण के सच्चेम रक्षक हैं। टोटम व्यकवस्थाि में एक वृक्ष, एक पक्षी और एक पशु का संरक्षण हर आदिवासी समुदाय सदियों से करता आया हैं। आदिवासी समाज स्वकर्ग और नरक की अवधारणा से परे है इसीलिए अपने परिजनों की मृत्यु के बाद वे उनको ‘ऊत’, ‘पित्तरर’, भौम्याु, के रूप में स्थाहपित करते हैं। ‘ऊत’, ‘पित्तरर’ और ‘भौम्यां’ हर कुलगोत्र में उनके अपने पुरखें ही होते हैं। आदिवासी समुदायों में सदियों से कुलगोत्र के रक्षक और देवता के रूप में उनके अपने पुरखें ‘ऊत’, ‘पित्तोर’ और ‘भौम्यान’ के रूप में पूजें जाते हैं। कोई भी मुसीबत, संकट आता है तो वे पूर्वजों का स्मतरण करते हैं। शादी-विवाह के अवसर पर और चौदस या अमावस को रात्री जागरण करके ‘ऊत’, ‘पित्तैर’ और ‘भौम्यार’ के गीत घर के सभी परिजनों द्वारा गाते हुए पुरखों का स्म,रण किया जाता हैं। ‘ऊत’ और ‘पित्तार’ सांतवी पीढ़ी में आने के बाद भौम्याे के रूप में घर या खेत में चबुतरे पर स्थांपित किए जाते हैं। ऊत’ और ‘पित्तीर’ तांबा, चॉदी व सोने की पातड़ी में घडवाकर घर के बुजुर्ग या मुखिया गले में धारण करते हैं।
‘ऊत’, ‘पित्तनर’ अर ‘भौम्याग’ गीतां सू पुरखां सुमरण :-

  1. “उड़-उड़’र जंगळ का जन्दापवर !!
    खबर तो ल्या ओं म्हाडका पितरा की !!
    उड़-उड़’र जंगळ का जन्दातवर !!
    खबर तो ल्या ओं म्हा का पितरा की !!
    बाको नाम न जाणा, बाको गॉव न जाणा !!
    कसीक सूरत छ थाका पितरा की !!
    धोळी-धोळी धोवत्तीी गुलाबी वाको साफो/फाट्टो !!
    सॉंवळी सूरत म्हा का पितरा की !!
    उड़-उड़’र जंगळ का जन्दाबवर !!
    खबर तो ल्या ओं म्हा का पितरा की …… !!”
  2. “गाड़ी जोवो भैल्याळ जोवो चालो सब परवार !!
    म्हातरा पितरा ने ढोको’र सारो परवार !!
    उतजी का बाबोजी वसै छ’र पैळी पाळ !!
    गाड़ी जोवो भैल्याै जोवो चालो सब परवार !!
    म्हाीरा पितरा ने ढोको’र सारो परवार …… !!”
  3. “हरिया नीमड़ा के नीचे बाबो भौमियों बैठ्यों !!
    या खेड़ा को रखवाळों बाबो भौमियों बैठ्यों !!
    हरिया खेजड़ा के नीचे बाबो भौमियों बैठ्यों !!
    म्हाारा चूड़ा को रखबाळो बाबो भौमियों बैठ्यों ….. !!”
  4. भैरू को गीत
    भैरूजी मेर्’या प छागी नागर बैळ
    सकरकंदी बाड़ी-बाड़ी आगी जी
    भैरूजी मेर्’या प छागी नागर बैळ
    सकरकंदी बाड़ी-बाड़ी आगी जी
    भैरू बाबा कौ न छोटोलाल
    सकरकंदी कुण खावलो’र
    सकरकंदी कुण खावलो’र
    बाई थारा दिलड़ा म थावस राख
    सकरकंदी खबाळो द्याला’र….
    मीणा की दिलड़ा म थावस राख
    सकरकंदी खावळो द्याला’र…..
    भैरूबाबा कतनोक राखू बसबास
    बुढ़ापो नीड़ो-नीड़ो आगो’र….
    भैरूबाबा कतनो राखू बसबास
    बुढ़ापो नीड़ो-नीड़ो आगो’र…..
  5. भैरू को गीत
    भैरूजी गढ़ सू उतरी मीणी
    सोना को कलस्योउ लैर
    भैरूजी गढ़ सू उतरी मीणी
    सोना को कलस्योउ लैर
    मीणा की घुंघट रा पट खोलद्यो
    भर ल्या ओ धौर झखौळ
    भैरूबाबा आगे लाजे सासरो…..
    पाछान लाजे पीर
    भैरूबाबा आगे लाजे सासरो…..
    पाछान लाजे पीर
    मीणा की कौड़ थारो सासरो
    कौड़ छ थारो पीर
    मीणा की कौड़ थारो सासरो
    कौड़ छ थारो पीर
    भैरू बाबा गढ़ म म्हा रो सासरो,
    मथरा म म्हाढरो पीर
    भैरू बाबा गढ़ म म्हा रो सासरो,
    मथरा म म्हाढरो पीर
  6. बालाजी को गीत

बालाजी चार लगाई नीमड़ी
चार्’या का मलगा पान
बालाजी चार लगाई नीमड़ी
चार्’या का मलगा पान
बालाजी आयो बनी को बांदरो
सड़ासड़ सूत्या पान
बालाजी आयो बनी को बांदरो
सड़ासड़ सूत्या पान
बालाजी छोटी नणद म्हायरी लाडली
झोली म आट्या पान
बालाजी छोटी नणद म्हा री लाडली
झोली म आट्या पान
बालाजी पाना को बणायो लाल,
गुवाड़ी म भाग्योण-भाग्योा डोल’र
बालाजी पाना को बणायो लाल,
गुवाड़ी म भाग्योण-भाग्योा डोल’र

“मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिली मुहर पर देवी का चित्र जिसके पेट पे वृक्ष निकला हुआ दर्शाया गया है तथा ऐसी असंख्य संख्या में मिली विभिन्न मूर्तियाँ इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मातृदेवी (कुलदेवी) एवं प्रकृति (धराड़ी) एकाकार थी और यह धराड़ी प्रथा का ही ऐतिहासिक प्रमाण है।“ यह परंपरा आज भी मीणा समाज के शादी विवाह, जन्म-संस्कार के समय पुरखा गीतों के साथ (गेहूँ, मक्का, बाजरा) दलिया-हलवा से पूजी जाती है।

  1. धराड़ी प्रथा का पुरखा गीत
    बंश बधावन माता
    माता झालो देर नगारा चढ़ गई
    माता झालर क झंकार
    माता धराड़ी का अगड़ घड़ास्या
    माता पाट (पातड़ी) पुवास्या
    पाटड़ी राखां हरदा मायं
    माता झालो देर नगारा चढ़ गई
    माता झालर क झंकार…………
    X X X X X
  2. अर्’र सारा दन की करूँ रुखाळी, मत मलज्यो गाळी
    सुवा पान पान खा लीज्यो, मत तोड़ज्यो डाळी
    मत तोड़ज्यो डाळी …

मीणा समाज के मौखिक गीतों में आदिवासियत, जीवन-शैली और जीवन-दर्शन जीवंत रूप में देखने को मिलता हैं। सबकों जीओ और जीनें दो के साथ कर्मठता का उदाहरण पेश करता है। मेहनतकश व स्वा भिमानी आदिवासी किसी की दया, गुलामी पर निर्भर नहीं रहता। वह अभावग्रस्तक रहने पर भी अपनी नव पीढ़ी को मौखिक गीतों के माध्युम से सत्यह और ईमानदारी से अपना कर्म करने की सीख देता रहा हैं।

  1. “पाण तो घबराज्या् छ दुसांगना मायां !!
    मैहनत कर बाळा के अन्नरधन खेले आगण मायां !!
    मैहनत कर बाळा के अन्नरधन खेले आगण मायां !!
    जो बिना काम के डोले बाका बालक मंडक्याआ बैई रौवे छ !!
    मैहनत कर बाळा तो, सुखभर नींद सौवे छ !!
    रोटी तो चोपडती पण लातगी झौटी !!
    मैहनत कर बाळा सु खेबे’छ ओरैं डीया घाल दी रोटी !!
    ओरैं डीया घाल दी रोटी !!
    सोस फक्र न है, जे है छ डील सु मोटो !!
    चावे तो लाख गरीबी आजा’बे,
    खोटो-करम बिगाडबो खोटो !!
    बैइमानी को पीसो तो, बैगों नावड्यावै छ !!
    तू मैं काई जाणा, पुरखा खैता आया छ !!
    सत का ठेवा खडो रह, उने आदमी खै छ !!
    उने आदमी खै छ !!”

गीतों के माध्य!म से गूढ़ रहस्योंै की जानकारी देने के लिए ‘साखी गायन’ का प्रयोग किया जाता है। साखी के प्रयोग से गीतों में रोचकता, उत्सुेकता और मनोरंजन के साथ बड़े-बड़े और लम्बेंख गीत भी सुग्रह्य, ज्ञानवर्धक और रोमांचकारी बन जाते हैं। मीणा स्त्रियां लोकगीतों में साखी का प्रयोग करके दिनचर्या के साथ पुरखों की ज्ञानधारा को अविरल गति देती रहती हैं। साखियों के प्रयोग से अनमोल और शिक्षाप्रद बातें सुननें व सीखनें को मिलती हैं।

  1. “उच्चाा टीबा म छेल्याोळी द’र गीत को होड़ो !!
    द’र गीत को होड़ो !!
    भाफरा में गॉव बस छ हरिपुरा म खैडो !!
    ‘उच्चा टीबा म छेल्याोळी द’र गीत को होड़ो !!

साखी : कस्साबबाजी मनखा राजी गीत मरद को खैबो !! खैबो …
चमचूरा का ऐ ई तो नतीजा डोडो नैण चलाबो !! चलाबो…….

उच्चाम टीबा म छेल्याोळी द’र गीत को होड़ो !!
द’र गीत को होड़ो !!”

आदिवासी समाज के लोकगीत मानव मन की उंमुक्तो उड़ान है, जो अपनी कर्मठता के साथ सहज-सरल भावनाओं के ज्वाकर के साथ गति पाकर अपने रूप को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ग्रहण करती जाती है। इसमें स्त्री पुरूष का कोई भेदभाव नहीं हैं। उम्र का बंधन नहीं है। स्त्रियों को तो संस्कासरों की बहुरंगी मिट्टी से गढा जाता हैं । स्त्रियॉं जन्मस से लेकर आजीवन तक लोकगीतों की स्विर लहरियों से लोकजीवन का श्रृंगार करती रहती हैं। कृषि, पशुपालन और लोकगीत मीणा आदिवासियों के जीवन का आधार है:-

  1. “परण्याु हळ बळदां’न जोड़ बाजरो बीज पाटी’म !!
    बाजरो बीज पाटी’म !!
    बिजळी कड़’क छ म्हामरी घबराव काया !!
    मोर पपयो बो’ल चाला खेत के मांया !!
    आ गई बरसात उगावगो आली माटी’म !!
    परण्याय हळ बळदां न जोड़ बाजरो बीज पाटी’म !!”
  2. “छैळया चराव छी डूंगर म !!
    जवानी बौळयाण म रैगी !!
    जवानी बौळयाण म रैगी !!”
    आदिवासी समाज में स्त्रीी-पुरूष परस्पार प्रेम, सौहार्द, समानता, सामूहिकता, सहभागिता और सामुदायिकता की भावना प्रबल पाई जाती हैं इसी कारण सार्वजनिक समारोह जैसे : शादी, समढोळा, मिलणी में स्त्रियों द्वारा उपस्थित सभी लोगों के बीच नये संबंधी स्त्री -पुरूषों (ब्याळण-ब्यांई) को ग्या ळ-गीत से संबोधित करती हुई कूदणा नृत्ये करके माहौल को खुशनुमा, रंगीन और प्रतिस्पिर्धात्मयक बना देती हैं। गाली गीत गायन में आदिवासी मीणा महिलाएं अपनी परंपरागत खान-पान का जिक्र करती हुई अपने ब्या ई-ब्या ण से हंसी-ठिठोली करती हुई बता रही है कि………. उसके जीवन साथी परदेश गये हुए है विरह में उसके बिना कुछ भी खाना चाहें तो उसे नहीं भाता…. चाहे मनपसंद मक्काक का दलिया और छाछ ही क्योंछ न हो………
  3. “ठाढ़ी-ठाढ़ी छाछ मक्कास को’र दळियों !!
    ठाढ़ी-ठाढ़ी छाछ मक्का. को’र दळियों !!
    अर् र कय्यां मारू’र सबड़को यार बना !!
    चमनी बझगी तेल बना !!
    ब्या ण म्हा री ठाढ़ी-ठाढ़ी छाछ मक्का! को दळियों !!
    अर्’र कय्यां मारू’र सबड़को यार बना !!”
    चमनी बझगी तेल बना !!
  4. “पचवारा में शौक छ भैस्या का धीणा को !!
    आदिवासी में आवै छ नाम मीणा को !!
    आदिवासी रह छ भारत देश क मायां !!
    राजस्था न में जन्मम लिया छ रैंवे पूरा देश के मायां !!
    बाजरा की रोटी चौखी लागे दूध-दही के लारें !!
    मक्का की रोटी तो खास्या- घी गुड के लारें !!
    जाडों-जाडों राबडी बडा चाव सु खावै-पीवै !!
    आदिवासी रह छ उकी भौम क माळे !!
    पुरखा की धरोहर राखे छ माथा क माळे !!
    पुरखा की धरोहर राखे छ माथा क माळे !!”

मरू प्रदेश राजस्थाेन में खेती और पशुपालन मानसून पर आधारित है अच्छे. मानसून से कृषि पैदावार के साथ-साथ अन्न भंडार, पशुधन: भेड, बकरियॉं, गाय, भैंस, ऊॅंट आदि जानवरों की संख्याा बढ़ जाती हैं। अतिवृष्टि-अनावृष्टि एवं तूफानी ओलों की मार से सब कुछ बर्बाद हो जाता हैं इसलिए फसल आने पर ब्या।ह-शादी (आखातीज सावे) बचपन में ही कर दिये जाते हैं। शिक्षा के प्रभाव, समाज-सुधार और मीणी लोकगीतों की सामाजिक चेतना से बाल-विवाह की समस्या् को हल किया जा रहा हैं, जिससे बालिग, स्विस्थस और शिक्षित होकर अपने परिवार और समाज में अपना योगदान दे सकें।

  1. “नाळे-नाळे ब्यागव, खाज्याध पाउणा पुडी !!
    बालपणे में मत परणाओं, छोडों-छोडों पाछली रूडी !!
    बालपणे में मत परणाओं, छोडों-छोडों पाछली रूडी !!
    पैली पढा-लिखार, करज्यों पगा पै खडा !!
    म्हा रा मन की बात बतारी छूँ, कोने मार रई ऐडा !!
    म्हा रा मन की बात बतारी छूँ, कोने मार रई ऐडा !!
    बालकॉं का माथा माले बौझ धर’दे छैं !!
    पढबा-लिखबा की उम्र में मीणा ब्याैव करदै छैं !!
    मीणा ब्या व कर दे’छ !!
    छोटी सी को ब्याबव कर दे, सासरैं जाबा सू !!
    काची उमर में हैगी रोगली काया, !!
    सारी उमर म सुख चैन को पावै !!
    सारी उमर म सुख चैन को पावै !!
    बन्ध करो दहेज मीणा, मत देवों गाडी !!
    चोखी लागै रैं फेरा मैं, ठारा साल की लाडी !!
    ठारा साल की लाडी !!”
  2. “म्हा री पौळी म कुण बैठ्यो,
    बोली आव पावणा की सी !!
    बांस आव चावळा की सी !!
    म्हा री पौळी म कुण बैठ्यो,
    बोली आव पावणा की सी !!
    बांस आव चावळा की सी !!”
  3. “तोरण मार घर म धसगो !!
    फैरा लेर जाऊलो, !!
    फैरा लेर जाऊलो !!
    धोळा-धोळा चावळ जा’न खार जाऊलो !!
    तोरण मार घर म धसगो !!
    फैरा लेर जाऊलो !!”

मीणी भाषा की प्रमुख बोलियों से संबंधित पुरखों के सांस्कृधतिक, भौगोलिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक क्षेत्रों का विशेष प्रभाव देखने को मिलता हैं। इस समुदाय की लोक किवदंती है कि, ‘तीन कोस पे पाणी बदले, आठ कोस पे बाणी’ भाषा के बदलने का यह स्वारूप इस भाषा की बोलियों के संबंध में उपयुक्त रूप में बैठता है। “भौगोलिक, सांस्कृातिक और पारिस्थितिक कारणों की वजह से स्थापनीय अंचल के अनुरूप इसकी बोलियों का विकास हुआ हैं। मीणी भाषा की मुख्यत रूप से 11 बोलियां हैं और इन 11 बोलियों की छोटी-छोटी विभाषाएं हैं।“
मीणा समाज के स्त्रीक-पुरूषों के गीतों के सुरताल में धरती और आकाश गूँज उठता है। सब तरफ उत्सेव का माहौल छा जाता है। इन गीतों में प्रमुख रूप से पद, सुड्डा, कन्हैरया, दंगळ, हेला, ख्यााला, ढॉचा, साखी, नेहड़ा, उछाटा, लांगुरिया, लोककथा वाचन, गायन आदि गायन और नृत्ये की प्रमुख कला हैं जिसके रंग में रंगा हुआ आदिवासी समाज का जीवन खुशियों से सराबोर होता आया हैं।
मीणी मातृभाषा के लोकगीतों में धरती गाती है, पहाड गातें हैं, नदियॉं गाती हैं, फसलें गाती हैं, उत्सगव और मेले, ऋतुऍं और परंपराऍं गाती हैं आदिवासी समाज में संयुक्त परिवार की व्यीवस्था् सदियों से कायम है। रिश्तोंत का महत्वं, अपनापन, मान-मर्यादा, हास-परिहास, प्रेम-खटास, संयोग-वियोग आदि से लोकगीतों के स्रोते अपने कण्ठ से संपूर्ण लोक को रंगीन और खुशनुमा बनायें रखते हैं। मौखिक गीतों में छोटे-छोटे गीत इस तरह से हैं:-

  1. “आधो काम बटाउ सासु को, लागे मन सासरा तोमे !!
    चाव लग्यो परणा को ऐब घणो मोमे !!”
  2. “साग तुई काट सासु बणाल्यु! चाय का दो कप !!
    तू ओछी म लाम्बी घणी सासु जोडा सू नप !!”
  3. “घर को पाछो करज्योआ काम नणद आजा चाय पी ले’न !!
    ननदोई की याद सतावे तो उने सपणा म जीले’न !!”
  4. “भाभी भला घरा की जीजी दे छ टेम सू रोटी !!
    घणी कुमेरी भाभी म्हा री को करैं काम की खोटी !!”
  5. “सपना कई तरह का आवे डिया को परदेश रहबा सू !!
    नौकरी को चाव घणों छ, न मोसू मलबा सू !!”
  6. “सासू हरदम मोसू काम करावे, बडरी छ काम की खोटी !!
    म तो थारैं लारैं काम करू जोडा सू, अब दै चौपडी रोटी !!”
  7. “मंगरा प बोल कागलो नणद हस’गी !!
    मंगरा प बोल कागलो नणद हस’गी!!”
  8. “ओ…सावो कद साधगी नानबड़ी या टन्नो गिंदोड़ी को !!
    ओ…सावो कद साधगो नानबड़ा या टन्न् गिंदोड़ी को !!”
  9. “म’तो जाउली ओ जीजी !!
    सोणी कागलों बो’ल !!
    घरा पछाड़ी मौरयो बो’ल !!
    म’तो जाउली ओ जीजी !!
    सोणी कागलों बो’ल !!”
  10. “तु तो पैल पैल आइ छ !!
    पाल्याा भैंस न पाणी !!
    पाल्याा भैंस न पाणी !!
    खैळ भर छ राजा की राणी !!
    तु तो पैल पैल आइ !!
    पाल्याप भैंस न पाणी !!
  11. “म्हानरी जीजी की गुड रोटी !!
    दनात्याै याद आव’छ !!
    दनात्याै याद आव’छ !!
    भाभी की तो सुवारे आव’छ !!
    म्हा री जीजी की गुड रोटी !!
    दनात्या याद आव’छ !!”
  12. “धोळा-धोळा बैल !!
    ज्या9ने पाव छी पाणी !!
    समदर मारयो र हबोळो !!
    चूंदड़ भीजगीं म्हा री !!
    चूंदड़ भीजगीं म्हा री !!
    साखी :
  13. “सासु बना र काई सासरो’र, !!
    भाई बना काई पीर….पीर !!
    बीर बना र काई मानबो र, !!
    सायत बना काई लाज…लाज !!”
    साहित्या का उद्देश्या मनुष्यध को सामाजिक बनाना और समाज को मानवीय बनाने का काम पुरखौती गीत परंपरा खूब करती हैं। शादी में वर/लाडा और वधु/लाडी पक्ष के ननिहाल से नाना, मामा और पीहर से पिता, भाई और अन्य सगें-संबंधियों व रिश्ते दारों के साथ ‘भात’ लाने की परंपरा का महत्वकपूर्ण स्थापन हैं। मीणी मातृभाषा के गीत स्त्रीो-पुरूष दोनों गातें हैं आदिवासी समाज में पुरूष भी मौखिक गीत परंपरा को रचते और सिरजतें आयें हैं। मौखिक साहित्यम में सच्चा ई और वास्ततविकता होती है। गॉंव के स्त्री्-पुरूष अपनी लोक परंपराओं के साथ जिन्द गी के ताल-मेल को बैठातें हैं जो देखते हैं, भोगतें हैं, सहते हैं, निभातें हैं वही अपने लोक गीतों की मौखिक परंपरा में उतारतें हैं। पिता और बेटी की बातचीत में इस परंपरा का लोकगीत इस प्रकार से हैं:-
  14. “लोड्या डूंगर ऊपर डूंगरी !!
    दस पूर को कांस’र !!
    लळ जा’र घर का पाटका !!
    झुक जा’र घर का पाटका !!”
    “बेटी क द को य थारो मांड़ो, !!
    क द की य फैरा रात!!
    लोड्या डूंगर ऊपर डूंगरी !!
    लोड्या डूंगर ऊपर डूंगरी !!
    दस पूर को कांस’र !!
    लळ जा’र घर का पाटका !!
    झुक जा’र घर का पाटका !!
    बाबल चौदस को छ मांडो !!
    सर पून्यू की फैरा रात’र !!
    लोड्या डूंगर ऊपर डूंगरी !!
    लोड्या डूंगर ऊपर डूंगरी !!
    दस पूर को कांस’र !!
    लळ जा’र घर का पाटका !!
    झुक जा’र घर का पाटका !!”
  15. “बीरा म्हाारे रमा झमा सूं आज्यो ’र !!
    आप आज्यों भावज न भी लारे लाज्योंं’र !!
    सिरदार भतीजा लारे लाज्यो ‘र !!
    बीरा म्हाीरे रमा झमा सूँ आज्योा’र !!
    बीरा चोडा लम्बार पेच म्हाँरा ससुराजी बेई लाज्योो’र !!
    कोर गोटा री साडी म्हाारी सासू बेई लाज्यो ‘र !!
    बीरा चोडा लम्बाी पेच म्हाीरा जेठजी बेई लाज्योो’र !!
    कोर गोटा री साडी म्हाेरी जेठानी बेई लाज्यो्‘र !!
    बीरा म्हा रे रमा झमा सूं आज्योय’र !!
    बीरा म्हाररे रमा झमा सूं आज्योब’र !!”
    “लोक के अंतस में सुख-दुःख का सर्जन-विनाश होता रहता है। इस प्रक्रिया में भाव की नदी की जो कलकल धारा बह निकलती है, वह कलकल नैंरतर्य आदिम राग है। वह लोकराग हैं। वह सहज राग हैं। लोक के कण्ठि से फूटी हुई हर्ष-शोक मिश्रित अभिव्यरक्ति है। वह ऐसा कण्ठस अनुष्ठाहन है, जिसे लोक पूरा करके अपने को पुनः सर्जित और पुनः शक्तिशाली बनाता है चाहे दुःख को गाये या सुख को, उसकी विरासत के बाद लोक अंतरविश्वाबस और अंतरभाव को प्राप्त करता है। हृदय से उठा, कण्ठ से फूटा और अधरों से निकला आदिम और सहज राग ही लोकगीत है।“
    ‘पाखर या’ मीणी भाषा का शब्दक है पाखरिया उस वीर को कहा जाता है जो घुड़ सवार सैनिक को युद्ध में मार डालता है । मेवाड़ के भील मीणों में पाखरिया शब्दै का इस्तेठमाल वीर, साहसी यौद्धा के लिए प्रयुक्तम किया जाता है जो स्वमयं पैदल रहकर भी घुडसवार शत्रु सैनिक को मार डालता हैं। जिसकी पुरखां उक्तिक है :
  16. “बीखू राव की पाखर सबाई !!
    बुला ले थारा पाखरया !!”
    आदिवासी समाज अधिकांशत: मातृसत्ता त्मिक व्य वस्थाा पर आधारित होते हैं। महिलाएं कर्मठ, वीर और साहसी होती हैं। मीणी मातृभाषा के लोकगीतों में प्रकृति संरक्षण और प्रकृति के सानिध्य में ‘ग्यांळ-गाली गायन’ भी एक प्रमुख कला है जो हास-परिहास, हँसी-ठिठोली से गमगीन माहौल में भी खुशी और रोमांच की मधुर स्वीर लहरियॉं बिखेरती हैं। शादी के बाद लडकी की विदाई में स्त्रियॉं दूल्हेळ के परिजनों को ब्यारई के रूप में मेहमान गिरी और खातिरदारी मजाकिया अंदाज में गाती हुई करती हैं। मीणी भाषा के ख्यााती प्राप्त गायक ‘परताप मीणा’ का गाळी गीत इस प्रकार है –
  17. “अरैं मजा का चावळिया’र, रंग डोल्यात डोल्याा जाय !!
    रशिला चावळिया’र , रंग रंग डोल्याह डोल्याा जाय !!
    धोळा-धोळा चावळ रान्यॉं वळ धोळा-धोळा चावळ रान्यॉंाई !!
    ज्यााने पेळी ब्यााई कै बान्यॉंल् , ज्या‍ने पेळी ब्याकई कै बान्यॉंाव , !!
    रंग रंग डोल्यान डोल्या जाय मजा का चावळिया’र !!
    लैरे-लैरैं दाळ रांध दी पातल ब्याबई की बांध दी’र !!
    ब्यारई म्हाळरो उबो-उबो झाके’र !!
    राज की घोडी नाचे’र, राज की घोडी नाचे’र !!
    रंग रंग डोल्याच डोल्या जाय मजा का चावळिया’र !!
    अरैं मजा का चावळिया’र,
    रंग रंग डोल्याव डोल्या जाय !!”

महिला ब्यालण के लिए ‘गाली गायन’ भरभूट्या !! (काटों वाली घास)
राजस्था्न गर्म जलवायु प्रदेश है यहॉं पर वर्षा का स्तभर कम ही रहता है। पशुओं के लिए चारा बरसात होने पर ही उगता है। मीणा समाज की स्त्रियां गाली गीत में इंद्र से प्रार्थना कर रही है कि वह अच्छे से बरसेगा तो रामा (खाली धरती) हरा-भरा हो जाएगा और पशुओं के लिए भरभूट्या की घास चारें का काम करेगी। घास पकने पर उसके कांटों से ब्यांण के साथ हंसी-ठिठोली के गीत इस तरह गाये जाते हैं : .

  1. “भरभूट्या’र लाल हरियो रामों कर’र कर !!
    म्हांरा दांताळा’र लाल, हरियो रामों कर’र कर !!
    सावण मायां उग आयो चारों ढांढा ढोरों को गतिया’र !!
    लावण लपट लुगडी लपट्यो म्हाीरी ब्यारन के धुंधी सेत्यां घुस’र घुस’र….. !!
    भरभूट्या लाल हरियो रामों कर’र कर !!
    म्हाटरा दांताळा’र लाल, हरियो रामो कर’र कर !!
    भरभूट्या’र लाल हरियो रामों कर’र कर !!
    म्हाटरा दांताळा’र लाल, हरियो रामो कर’र कर !!”
    मीणा आदिवासियों में ग्याड़ गायन महिलाओं द्वारा विशेष रूप से पर्यावरण संरक्षण और जीव-जंतुओं के संरक्षण के साथ रोजगार के लिए भी होता है| ‘छिला’ का पेड़ आदिवासी जीवन में विशेष स्थाकन रखता है इससे राजस्थािन की शुष्कस जलवायु में भी पर्यावरण हरा-भरा और खुशहाल रहता है। रोजगार के लिए दोना पत्तल छीला के पत्तों से ही बनाए जाते हैं| पशुओं को खाने के लिए पत्तेंज, जलावन के लिए लकड़ी आदि मिलती रहती हैं।
  2. छिला गाळी गीत : ……
    “मार कचोटो लोड़ी छीला माळे छंढ़गी !!
    मार कचोटो लोड़ी छीला माळे छंढ़गी !!
    छीलो-छीलो करती छीला माळे छंढगी !!
    अर’र म्हालरा सुसरा को राख ल्यालई पेट !!
    छीलो बेरी गजब करी !!
    मार कचोटो लोड़ी छीला माळे छंढ़गी !!
    अर’र म्हाेरा छेला को राख लाई पेट !!
    छीलो बेरी गजब करी !!
    मार कचोटो लोड़ी छीला माळे छंढ़गी !!
    छीलो-छीलो करती छीला माळे छंढगी !!
    अर’र म्हालरा छोरा को राख लाई पेट !!
    छीलो बेरी गजब करी !!
    छीलो बेरी गजब करी !!”
    मद्यपान करना स्वस्थ्य के लिए हानिकारक है इससे परिवार और कुटुंब बर्बाद हो जाते हैं आदिवासी समुदायों में दारू-शराब, शादी-विवाह, जन्मह–मृत्युर, उत्स.व, खुशी और गम के अवसर पर पीना और पिलाना एक कुप्रथा बन गयी है। जागरूक और समझदार लोगों ने इस प्रथा पर प्रतिबंध लगा कर कम करने का प्रयास किया है। दारू का गीत स्त्रीो और पुरूष दोनों के द्वारा विवाह और समढोळा में पसंदीदा गीत के रूप में गाया जाता हैं ……..
  3. “धोळी-धोळी बोतल दुबारा की दारू !!
    पीवांला रै बड़ की छाया म !!
    कैद भलाई म्हा़री ह जा ज्यो !!
    मांणाला रे बड़ की छाया में !!”
  4. ब्याडय को ग्याीळी गीत
    ( दारू स घर बर्बादी की झॉंकी )
    फाट गिया गदड़ा बखर गया गाबा
    फाट गिया गदड़ा बखर गया गाबा
    अर्’र ब्या ण म्हा री खोर्’डा म सोव’र
    फाट गया गदड़ा बखर गया गाबा
    ब्यागय म्हाारो दारू म बर्बाद
    लात गई भैंस बीत गियो धीणो
    लात गई भैंस बीत गियो धीणो
    अर्’र ब्यायण म्हा री मंडक्यांं पोव’र
    ब्यागइ साळो दारू म बर्बाद
    बीत गियो तेल बीत गियो साबण
    बीत गियो तेल बीत गियो साबण
    अर्’र ब्यािण फचाटा सुं धौव’र
    ब्यागइ साळो दारू म बर्बाद
    छौरा अर छोरी उका रोटी मांगे’र
    छौरा अर छोरी उका रोटी मांगे’र
    अर्’र ब्याोण म्हा’री बैठी-बैठी रोव’र
    अर्’र ब्याोण म्हा’री बैठी-बैठी रोव’र
    ब्या इ साळो दारू म बर्बाद
    अर्’र ब्याळण म्हाारी बैठी-बैठी रोव’र
    अर्’र ब्याळण म्हाारी बैठी-बैठी रोव’र
  5. “लाव टूटगी चड़स फाट्गो !!
    लाव टूटगी चड़स फाट्गो !!
    ले चालो दल्लीस’म, दल्लीै’म भारयो रूजगार !!
    ले चालो दल्लीस’म, दल्ली’म भारयो रूजगार !!
  6. ओ ……. कीला मानी टूटगा सासू की चाकी का !!
    जामण गरंड भीजगो पाणी सू म्हाकरी गलती सू !!
    चाकी को चाले बदला दे कीला मानी कू !!
    प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेीय ने वेबीनार में बताया कि “मौखिक साहित्यर को मातृभाषा में गढ़ने का काम अधिकांशत: स्त्रियां करती हैं।“
    आदिवासी समाज में प्रेमपूर्ण संबंधों की प्रधानता रही हैं। युवा लडका और लडकी आज भी अपने जीवन साथी का चयन पुरखां परंपरा के अनुसार स्वीाकार करते हैं। संयोग और वियोग में सुख-दुख की अनुभूति दोनों को प्रभावित करती हैं। पुरूष भी महिला के बिछडने से विरह में तड़पता है, और अपने रूदन को गीतों की स्वडर लहरियों में पिरोता है :-
  7. काजळ घाल’छी कोया म !!
    बो दन भूलगी कइय्यां !!
    बो दन भूलगी कइय्यां !!
    बापल्याू की एक बेटी सूखगी कइय्यां !!
    काजळ घाल’छी कोया म !!
    बो दन भूलगी कइय्यां !!
  8. “छोड़ र परदेशा में चाल्यों , गाड़ी देर हे ज्यावजो !!
    गाडी लेट हे ज्याछजो !!
    अरज करू हे धरती माता मने चेत हे ज्या!जो !!
    छोड़ र परदेशा में चाल्योंे, गाड़ी देर हे ज्या जो !!”
  9. “सात जनम को वादों सपना छोडती दीखे…… !!
    मेंहदी हाथॉं कि तडपावे, दिल ने तोडती दीखे …. !!
    हाथॉं मेंहदी देख, रोटी पाणी नहीं भावे … !!
    सपना बचपन की भायेली, आखातीज को सावों ….. !!
    चिट्टी ना संदेश, हिचकी थारी को आई !!
    बर-बर मैं थारी याद आवै, हिवडों भर-भर जावे ….. !!
    तू काई पत्थंर दिल छ सपना, तोने म्हा.री याद को आवे ….. !!
    झूठो छ या प्या र, झूठी दुनिया छ थारी … !!
    सूनी कर दी तने सपना म्हािरा दिल की फूलवारी … !!”
  10. छाबण देताई जोवन आगो पीळी लूगड़ी तौम !!
    पीळी लूगड़ी तौम !!
    छाबण देताई जोवन आगो पीळी लूगड़ी तौम !!
    पीळी लूगड़ी तौम !!”
  11. “काळी बादळी बायेली धीरे-धीरे छोड़ बरखा, !!
    धीरे-धीरे छोड़ बरखा, !!
    ले ब आवलो री परण्योड म्हालरा घरखा, !!
    धीरे-धीरे छोड़ बरखा, !!
  12. “म्हा़री जीजी बिद्या करली खड़ोई रिज्यों! नीमडी तळ !!
    पारस पीपळी तळ !!
    जीजी काको मलणी करगो, खडो ही रिज्योक नीमडी तळ !!
    पारस पीपळी तळ !!”

“आदिम मानव हृदय के गानों का नाम लोकगीत है। मानव जीवन की, उसकी उमंगों की, उसकी करूणा की उसके रूदन की, उसके समस्तख सुख-दुख की …… कहानी इनमें चित्रित है।“
गीत संगीत प्रत्येेक समाज की सभ्यउता और संस्कखति का बोलते हुए दर्पण होते हैं। मीणा समाज सदियों से प्रकृति और पशु-पक्षियों के साथ कृषि आधारित जीवन शैली पर निर्भर रहता आया है। सर्वश्रेष्ठ महिला लिंगानुपात और मातृसतात्म क व्य वस्थां आदिवासी समुदायों की संसार को अनमोल देन हैं आदिम कबीलों से आज आधुनिक युग में भी आदिवासी स्त्रिसयां अपने समाज की रीढ़ हैं । संसार के दूसरे समाज की अपेक्षा आदिवासी समाज में स्त्रीा और पुरूष के बीच समानता का भाव देखने को मिलता है। बदलते मौसम के अनुसार फसलें भी बदल जाती है और गीत भी उसी के अनुरूप अपनी राग सुनाते हैं।
सर्दी में सरसों की फसल तरूणाई लेकर पीले रंग के फूलों से धरती को सजाती है। तब बसंत ऋतु का मादक अहसास जनमानस को खुशी से भर देता है। पीले फूलों की बहार से लदी-सजी सरसों और पीली लूँगडी ओढी नायिका दोनों ही प्राकृतिक सौंदर्य को अनुपम बनाती हुई प्रेम और साहचर्य के गीत गाती है। प्रेमी युगल प्रेम में मदमस्तऋ होकर अपने कार्यों को पूर्ण करते हैं। और जो एक दूसरे से दूर है या बिछूड गये हैं वे विरह वेदना से व्यायकुल होकर साथी से मिलने की कामना करते हैं। बाल-विवाह होने पर सावा या मुकलावा (वर-वधु) लाड़ा-लाड़ी के युवा होने पर किया जाता है और किन्हीं कारणों से इसमें देरी होती है तो युवा दम्पसत्ति मिलन की आतुरता और वेदना से गुजरता है तो स्वैत: ही उसके दिल से पुकार उठती है :-

  1. “तो’न पॉंच बरस होगा’र टाच्या डील घड़ता !!
    आंगल्याे की रेखा घसगी दन गणता !!
    तो’न पॉंच बरस होगा’र टाच्या: डील घड़ता !!
  2. “सौ भरी खुंगाळी जंतर पैरया ही र’छ !!
    छुट्टी दे द’र सरकार घराळी म्हाहरी एकली र’छ !!
    धराणी म्हा री एकली र’छ !!
    सौ भरी खुंगाळी जंतर पैरया ही र’छ !!
    घराळी म्हागरी एकली र’छ !!
  3. “आकड़ा क बाथ भरली, परण्यार के भोळ !!
    म्हाीरो पैल्या ई मरगो छो, दे दी डूंढ़ क डोळ !!”
  4. “पीली लूगडी पाणत म बसंती राग सुणाब’र….!!
    संध्याम धीरे-धीरैं ढळ’र , सरसो माळे हाथ को झालों !!
    सरसों में झूम उठ्या गदराया पीला-पीला फूलन को झालों !!
    आया फूल सरसू क प्यापरा छुट्टी माले आजा’र!!
    म्हाफरा मन की मनसा मन म दो दिन लाड लडाजा !!
    पीली लूगडी पाणत म बसंती राग सुणाब‘र….!!”

जीवन के सुख-दुःख का वास्तदविक आईना पुरखौती गीत हैं। जिसमें आदिवासी समुदाय के संपूर्ण लोक जीवन के संस्काार, रहन-सहन, जीवनानुभूतियों, मूल्यों , आदर्शों और पुरखों के कर्मठ, संघर्षशील गौरवशाली इतिहास का प्रतिबिम्बस उनकी मातृभाषाओं में जीवंत मिलता है। आदिवासी मौखिक परंपरा के लोकगीत संपूर्ण मानवता को दिशा देते हैं। अपनी अलौकिक ऊर्जा से उसे संचालित करते हैं। ये अतीत अंधकार में विलीन अनेक महत्वीपूर्ण रहस्यों को उद्घाटित करते हैं।
“मानव समुदाय समय के सत्य और अच्छांइयों को समेट लेता है और उसे लोकगीतों, लोककथाओं, दंतकथाओं आदि में पिरो लेता है और पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कृीति के रूप में उसका संवाहन करती है। इसलिए लोकगीत समाज विशेष के द्वारा सदियों से अर्जित सामाजिक संपत्ति है जिसमें यथार्थ और इतिहास भी होता है और समाज के लिए शिक्षा और मनोरंजन भी। इनमें समाज के सुख-दुःख समाहित होते हैं और गीतों में समाज की अनेक विशेषताएँ होती हैं।“
पुरखों द्वारा सृजित मौखिक साहित्य अधिकांशत: मातृभाषाओं में रचा जाता है। भारत में लगभग 781 आदिवासी समुदाय हैं। जिनमें अधिकांश की अपनी मातृभाषाएं और बोलियां हैं। कुछ समुदायों की उनकी अपनी लिपियां भी हैं। भारत में पाये जाने वाले पॉंचों भाषा परिवार में आदिवासी भाषाएं और बोलियां जीवंत रूप में मौखिक और लिखित साहित्यम के रूप में जनजीवन के साथ सबका मार्ग प्रशस्तं कर रही हैं। भारत में आदिवासी समाज की कुल जनसंख्याव 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 12 करोड़ हैं जो देश की कुल जनसंख्याख का 8.5 प्रतिशत हैं। जिसमें मीणा जनजाति जनसंख्याी की दृष्टि से भारत के आदिवासी समुदायों में पॉंचवें स्थापन पर हैं। क्षेत्रफल की दृष्टि से देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में जनसंख्या की दृष्टि से मीणा आदिवासी समुदाय पहला स्थान रखता है।
प्रोफेसर हेमराज मीणा के अनुसार “कुछ आदिवासियों को छोडकर अधिकांश आदिवासियों की अपनी बोली और अपनी भाषा हैं, जिसे हम आदिवासी बोली या आदिवासी भाषा कहते हैं। मीणा समुदाय की अपनी कोई भी बोली, भाषा नहीं है। इस समुदाय के पास जनजातिय विरासत के रूप में अपनी लोक संस्कृलति और लोक परंपराएं सुरक्षित हैं। अपने समुदाय के जनजातिय लोक देवी-देवता हैं तथा लोक गीतों की समृद्ध परंपरा हैं।“ किसी समुदाय के समृद्ध लोक-साहित्य होने पर और उस समुदाय के पुरखां गीत-कथा लोक साहित्य की 20 से अधिक विधाओं में गायन-वादन होने के बावजूद उस समुदाय की भाषा को नकारने का कारण है, उस भाषा पर समुचित काम नहीं होना। इस भाषा को भाषाविदों ने उपेक्षित रखा। सर्वेक्षणकर्ताओं ने अपने-अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए सर्वेक्षण कराए। उपनिवेशकाल के अधिकांश सर्वेक्षण इसी कारण सवालों के घेरे में हैं।
न्गूसगी वा थ्यों्गो इस संदर्भ में कहते हैं कि मौखिक परंपरा बहुत समृद्ध और बहुआयामी है यह कला कल समाप्त नहीं हो गयी है यह एक जीवंत परंपरा है……… मौखिक साहित्यद से अगर परिचय हो तो नई संरचनाओं और तकनीकों की जानकारी मिलती है इससे ऐसी मानसिक प्रवृत्ति का भी निर्माण होता है जो नये-नये रूपों के साथ प्रयोग करने को प्रेरित करती हैं।
“भाषाएं न तो कभी बूढ़ी होती है और न ही मरती हैं। वे अपनी संरचना में किसी तात्विक दोष के कारण ‘आधुनिक युग’ के लिए अप्रासंगिक भी नहीं होतीं। वे तभी गुम होती है जब समाज के प्रभुत्व‘कारी वर्ग के पास उनकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती।“
20 वीं शताब्दी के महानतम अफ्रीकी रचनाकार, आदिवासी चिंतक और विचारक जिनका सर्जनात्मीक लेखन उपन्याअस, नाटक, कहानियां, भाषा, संस्कृीति, समाज और सत्तार के अंतर्संबंधों आदि पर विशेष कार्य करने वाले केन्या,ई लेखक न्गूहगी वा थ्योंागो के विचारानुसार भाषाएं उस समाज के लोगों के साथ हमेशा जिन्दाक रहती हैं।
सिंधुघाटी सभ्यषता के वंशज, मत्स्य प्रदेशों के गणतंत्रीय शासक, मीन गणचिह्न का समुदाय मीणा-मीना-मैना भारत के सबसे बड़े राज्या राजस्थाणन में आदिवासियों में सबसे बड़ी जनसंख्या- के रूप में आज भी निवासरत है और भारत के कई राज्योंर में भी विभिन्न कारणों (विदेशी आक्रमणकारियों के साथ हुए सैंकड़ो संघर्ष, युद्ध, हत्याभकांड, विस्थासपन, पलायन, बेदखली, रोजगार आदि) से निवास कर रहे हैं। जो अपनी भाषा, संस्कृसति, जीवन-शैली, आदिवासियत और अपने गौरवशाली इतिहास के साथ महत्वरपूर्ण पहचान रखते हैं।

  1. “कांकड़ बाज्याअ घूघरा !!
    पळसा बाज्याभ ढ़ोल !!
    ओठो बावड़’र खाटू का तेजा !!
    थारो अमर’र ज्या गो कूळ म बोळ !!”
    (पी.एन.बैफलावत, सामाजिक चिंतक, समाज-सुधारक, इतिहासकार, मीणी भाषा और संस्कृमति के वाहक और लोक नृत्यम कलाकार से साक्षात्का र के दौरान विशेष साभार प्राप्ता ऐतिहासिक जानकारी)
    यह पुरखो के द्वारा सुनाई गयी मौखिक, ऐतिहासिक और सच्चीा कथा हैं। बहन अमरादे के भात भरने जाते समय गॉंव खानावास के तेजा बैंफलावत व लालसोट के चौहानों के बीच लालबाग और सामंतशाही की रोक-टोक को लेकर हुई तनातनी और युद्ध के संस्मारण का सजीव चित्रण है। कवि द्वारा तेजा के वीरत्व और शौर्य को दर्शाने वाला बोल है। यह युद्ध लालसोट के घाटा में हुआ जिसमें तेजा बैफलावत ने बुलंद हौसलों से डटकर मुकाबला किया था। मीणा समाज की आन-बान-शान को बचाने के लिए अपना बलिदान दिया था। तेजा मीणा का स्माेरक खानावास गॉंव में बना हुआ हैं।
    दो और चार पंक्तियों की पुरखौती गीत कथा एक हजार साल का इतिहास अपने में समेटे हुए है जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्त्री और पुरूषों के गीतों में मीणी भाषा के माध्याम से मौखिक रूप में सुनतें आ रहे हैं। जो भाषिक, सांस्कृणतिक, भौगोलिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक है, जो बेजोड़ और अनुठा है जो इस तरह से हैः-
  2. “कुची को छो बोतड्यों, लढा में जो दियो !!
    आछी बगडी रैं मीणा की, हाथॉ राज खो दियो !!
    हाथॉ राज खो दियो !!”
  3. “सुलखण सुत आलण भया, म्या!रण कुल अवतार !!
    खोह गंग चांदा भयो, सूरवीर दातार !!
    चँहु दिश सुत आलण तणां, सोभा भनो अनूप !!
    संका मानै गढपति, आलणसी बडभूप !!”
    यह पुरखां गीत मीणा समुदाय के साम्राज्य! के एक हजार साल पुराने वैभवशाली वर्चस्वे का सांस्कृातिक, सामाजिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक पराभव की महागाथा को पुरखौती साहित्यि में आज भी मौखिक और लिखित रूप में बयान कर रहा है।
    राजपूत नरवर नरेश सोढाराव की मृत्युय के बाद पुत्र दुलहराय को और उसकी मॉं को चॉंदा गोत्र के मीणा राजा आलणसिंह ने अपने आश्रय में शरण देकर रक्षा की थीं। दुलहराय को अपना भॉंजा और उसकी मॉं को अपनी बहन समान माना था। उसकी देखभाल, शिक्षा, दीक्षा और युद्ध कौशल की व्यपवस्थान अपने बच्चोंक के समान दी थी। दिल्लीो के तोमर नरेश अनंगपाल को लगान वसूली देने के लिए युवा दुलहराय को भेजा गया था तब दुलहराय ने तोमर सेना से मिलकर राजा आलन सिंह के खिलाफ षडयंत्र रचा। दिपावली के दिन मीणा समुदाय के सभी पुरूष बिना हथियारों के निहत्थेंं रहकर अपने पुरखों को (पूजा-तर्पण) पानी देते हैं। इस परंपरा को दुलहराय बचपन से देख रहा था। दिल्लीय के तोमर नरेश के साथ मिलकर दुलहराय ने चॉंदा मीणा आलणसिंह और उसके परिजनों को मौत के घाट उतार कर राजपूत साम्राज्यय की स्थालपना कीं।
    मीणा समाज के बड़े-बुजुर्गों के दिल से आज भी धोखेबाज राजपूत भाणजे दुलहराय के विश्वामसघात की हूक उठती रहती है जो मीणी भाषा में इस प्रकार है :
  4. “भाणजो कुग्गैतल गैबी मामा न खागो !!
    काळी बादली को काळस चॉंदा राज प छागो !!”
    (मीणी भाषा के आंचलिक चिंतक, लोक मर्मज्ञ, प्रसिद्ध कथाकार, विजय सिंह मीणा जी की वॉल से विशेष साभार उद्धृत है)
    मीणा लोकगीतों की मूल परंपरा आज भी मौखिक हैं यह स्त्रियों के कारण सर्वाधिक जीवंत और हरियाली विधा है। इन गीतों के माध्य म से हजारों वर्षों का हमारा भाषिक, सांस्कृ तिक, भौगोलिक, प्राकृतिक, ऐतिहासिक ज्ञानभंडार सुरक्षित हैं। मीणी मातृभाषा के लोकगीतों से ही परंपराऍं, शादी-ब्याऐह, जन्म -मरण संस्काोर, खेती, पशुपालन, जीवन दर्शन संपूर्ण समाज का मार्गदर्शन करते रहे हैं। सनातन संघर्ष और उत्कट जिजीविषा का ऐतिहासिक उर्वर जीवन दर्शन अपने आप को पुरखौती के जीवंत रूप में प्रस्तुहत करता रहा है। आदिम भाषाएँ अलिखित और उपेक्षित होने के बावजूद अपनी उत्कृंष्ट जिजीविषा के कारण समय के झंझावतों से संघर्ष करती हुई मौखिक-पुरखौती कंठों में आज भी जीवंत रूप में स्थि‍त हैं।
    “लोकगीतों का उद्भव वास्तरव में आदिम जातियों से माना जाता है परंपरा से जो लोकगीत भारतीय ग्रामीणांचल में फैले हैं, उनका उद्गम शहर नहीं बल्कि अनपढ, अशिक्षित और नगरीय चमक-दमक से दूर आदिम जातियां हैं। हम सब उन्हीन के संशोधित रूप है।“
    आज मीणा समाज में बाजारवादी प्रभाव के कारण इन लोकगीतों में रिमिक्स से अश्लील और फुहड एलबम बनाकर इनकी मौलिकता को प्रभावित किया जा रहा है। दूसरा पढ़े लिखे लोगों द्वारा इनमें रूचि नहीं रखने के कारण लोकगीतों की मौलिक परंपरा लुप्ति होने लगी है, यह काफी चिंतनीय है क्यों कि आज भी मीणा समाज की संस्कृरति, परंपराएं और इतिहास की महत्वरपूर्ण जानकारी अशिक्षित ग्रामीण लोगों में मौखिक रूप से लोकगीतों के माध्यसम से ही संचित है।
    हजारों सालों से जो विधाएं लोक जीवन के राग-विराग, शोक-संघर्ष और उमंग उल्लांस को अभिव्यक्त करने का सबसे सशक्त और प्रमाणिक माध्यधम रही है, आज वे सभी संकट में हैं चाहें वे लोकगीत हो, लोकोक्ति, मुहावरें, पहेलिया, फैणी, पुरखों के अनुभव भंडार सिनेमा, टेलिविजन और मोबाइल के आने से ये विधाएं उपेक्षा की शिकार हो गयी हैं। बाजारवाद और आधुनिकीकरण की दौड़ में शिक्षित मानव समाज व्यस्त, हताश, निराश, बेचैन होकर मानसिक रोगों का शिकार बन रहा हैं। जिसका उपचार पुरखों की ये मौखिक ज्ञानधारा की बहुरंगी विधाओं की औषधी खूब करती हैं। मौखिक साहित्य मातृभाषाओं में जीवंत और प्रभावशाली होता हैं। साहित्य मनुष्य को सामाजिक बनाता हैं और समाज को मानवीय बनाने का काम पुरखौती साहित्य पुरजोर करता है।
    मौखिक और लोकसाहित्य के विद्धान डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार ‘’लोक हमारे जीवन का महासमुद्र हैं, उसमें भूत, भविष्य, वर्तमान सभी कुछ संरक्षित रहता हैं। ……. लोक राष्ट्र का अमर रूप है, लोक कृस्न ज्ञान और संपूर्ण अध्य्यन में सब शास्त्रों का पर्यावसाय है। अर्वाचीन मानव के लिए लोक सर्वोच्च प्रजापति हैं।‘’
    पुरखों की मौखिक, वाचिक परंपरा को पुरखौती साहित्य कहा जाता हैं। हिंदी साहित्यक के विद्धानों ने पुरखौती की मौखिक विधाओं के लिखित रूप को लोक, लोक साहित्य का नाम दिया है जो इनकी सहजता, सुन्दरता, स्वभाविकता, नैसर्गिकता, कर्मठता, उदारता, सामुहिकता, समता, सामाजिकता, कृषि, पशु-पालन, जंगल, वन्य, जनजीवन आदि से वंचित कर देता हैं।
    मानव जीवन में लोकगीत अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और अज्ञान से ज्ञान का संचार करते हैं। ये पुरखालोक की समाज के लिए नि:शुल्क और व्याापक संपदा है जो मौखिक और पुरखौती साहित्यक भंण्डाुर के रूप में संग्रहित की जानी चाहिए। मौखिक परंपरा से पुरूष और स्त्रियों के द्वारा सहेजें अनमोल भण्डापर मौखिक गीत संपूर्ण जनजीवन के लिए बहुमूल्य् उपहार हैं।
    प्रोफेसर रामलखन मीणा के विचारानुसार मीणी भाषा –“मीणा आदिवासी राजस्थापन के प्राचीन आदिवासियों में से एक हैं। अत: राजस्थािन में बसने वाले आदिवासियों में मीणा आदिवासी की जनसंख्याम सर्वाधिक हैं। विश्वप की प्रमुख भाषाओं की पुस्तदक ‘एथनॉलोग’ में वर्णित सूची में ‘मीणा’ भाषा (myi) कोड के साथ 1971 की जनसंख्याॉ के साथ इसके बोलने वालों की संख्यां लगभग 9 लाख थी जो 1991 में 19 लाख दर्शायी हैं और 2001 में 38 लाख और 2011 में 52 लाख मानी गयी हैं।“
    राजस्थाान के भाषा-भूगोल सर्वेक्षण में प्राप्तं सामग्री के आधार पर किये गये भाषिक-विश्लेाषण से यह सुस्प-ष्ट् होता है कि मीणी भाषा स्व्तंत्र रूप धारण करने वाली भाषा हैं।
    मौखिक कण्ठख की संपदा पर ग्रामीण अशिक्षित और कर्मठ स्त्रियों का ही वर्चस्वे है। दूर से आती हुई, लोकगीतों के गीत संगीत की मंधुर स्वठर ध्वकनियों से दुनियां हर्षोल्लाेस से थिरक उठती है। गांव हो या शहरी परिवेश लोक गीतों की स्व्र लहरियों में भाव विभोर और आनन्दिैत होकर गाता हुआ नृत्य ही नहीं करता बल्कि उसके सारें मनोविकार भी धुल जाते हैं, और नवजीवन की शुरूआत के लिए जीवन संघर्षों का सामना करने के लिए पुनः तैयार हो जाता हैं।
    संसार भर में मातृभाषा के लोकगीत स्त्री शिक्षा के महान केन्द्रक हैं। पुरखां गीत वेदों से भी पुरानी और महान परंपरा का नाम हैं जो मानव के जन्म से लेकर आजीवन अनिवार्य अंग की तरह सहयोगी और पोषक बने रहते हैं। लोकगीतों के सृजन में जितना नारी ने सहेजा और समर्पित किया है, उतना पुरूषों से संभव नहीं हैं। आदिवासी समाज की नारी सीधी, सरल, भावप्रवण होती हैं स्त्री स्वसरों में श्रृंगार, प्रणय, वियोग, वात्साल्यम का भाव प्रचूर मात्रा में होता हैं। साहस, संघर्ष, हर्ष, विषाद, प्रेम, घृणा, उमंग, करूणा, विलाप और रोद्र भी नारी जीवन के बालिका, वधु एवं जननी आदि रूपों में यथा अवसर अमृत स्रोते की तरह गीत बनकर कण्ठा से फूट पड़ते हैं। वह प्रत्ये क उत्सोव, त्योघहार, रीति-रिवाज, पर्व-प्रथा आदि को मनाने के लिए मातृभाषा में ही गाती है। प्रकृति के साथ सहजीवी जीवन जीने वाले आदिवासी समाज की मातृभाषाओं के पुरखां गीतों की अमृत धारा से संपूर्ण जनजीवन आनंदमय और संगीतमय बनाता हुआ अपनी अविरल धारा की तरह सदियों से बहता रहा हैं।
  5. “बावन कोट छप्पपन दरवाजा !!
    मीणा मर्द नाहन का राजा !!”
    कर्नल टॉड द्वारा उद्धृत यह दोहा मीणा समुदाय में बहुत प्रचलित और विश्वबसनीय हैं। नाहण के परम पुररूषार्थी बादा राव मीणा राजा के दुर्ग के 52 गढ़ और 56 दरवाजें थें। नहाण के मीणों का ढूंढाड पर राज था जिसको हथियानें के लिए अकबर के कहने पर भारमल ने बादा राव मीणा के साथ कई बार युद्ध कियें, जिसमें शुरूआत में जबरदस्ता शिकस्त से वह पराजित हुआ था बाद में भारमल ने षड़यंत्रों से नाहण को अधीन कर लिया था।
  6. “बावन गढ नौबत पुरे छप्पुन कोट जुहार !!
    बादो राजा नाहन को ब्याढरण बड़ सरदार !!
    महलां तो ढ़ोल बज्यो् हड़प्पाड डोव बाल को !!
    बजै ढूढाड़ में ढोल, बलवंत बादाराव को !!”

डॉ. शकुंतला मीणा ने मीणा जाति का अभ्यु द्य नामक पुस्तुक में कर्नल टॉड के दोहें के समानार्थी दूसरा दोहा बेहद गौरवशाली और प्रासंगिक उद्धृत किया है। जिसमें नाहण के बादाराव मीणा को बड़ा सरदार बताया गया है। क्योंयकि उसने राजपूतों से आमेर, जमवारामगढ़ को वापस जीत लिया था। मीणों की खोयी हुई विरासत को पुन: स्था पित कर ढूँढाड़ में बादाराव मीणा की गौरवगाथा के ढोल बजने लगे थे।
महलां तो ढोल बाज्यो हड़प्पाथ डोब बाल को पंक्ति से सीधा संबंध सिंधु घाटी की हड़प्पाप सभ्यंता के मीन गण चिन्ह्धारी डोब बाल मीणा समुदाय के गौरवशाली अतीत के जीवंत साक्ष्यो मिल रहे हैं, जो इतिहास में विश्वी की सबसे सर्वश्रेष्ठ व प्राचीन सिंधुघाटी, मोहनजोदडों और हड़प्पा सभ्याता कहलाती है।
पुरखौती गीत आदिवासी समाज की अपनी जीवन शैली, संस्कृति एवं इतिहास को स्वयं बयां करता आया है। मौखिक साहित्य में पुरखों के ज्ञान की अपार संपदा हैं सदियों से चले आ रहे इस ज्ञानरूपी भंडारों से पुरखों ने लोकगीतों की अमृतधारा में संपूर्ण समाज को ऊर्जा और चेतना से संपन्नभ किया है।
संस्कृऔति ऊपर से नीचे नहीं पहुँचती बल्कि नीचे से ऊपर आती हैं। जड़ से ही पेड़ बनता हैं, हम पत्िर‍चयों और फूलों को ही सभ्यनता का चिन्हा मान बैठें हैं जिन्होंपने पूरी दुनिया को सभ्यदता सिखायी उन्हेंृ ही स्वरयं घोषित सभ्यच लोग, असभ्य मानते हैं। इससे बड़ी अज्ञानता, नासमझी, चालाकी, धूर्तता और क्या, हो सकती है?
‘’सिंधु लिपि के अधिकांश उपलब्धर लेख मुहरों पर उत्की र्ण हैं। ये मुहरें खेलखड़ी, चीनी मिट्टी तथा हाथीदांत की बनी हुई हैं। अधिकांश मुहरें चौकोर हैं। कुछ मुहरों के कूबड़ निकले हुए हैं और कुछ मुहरों की पीठ पर मुठें भी हैं जिनमें डोर डालने के लिए छेद बने हुए हैं। इन्हींं मुहरों पर पशु, पेड़ तथा लिपि संकेत खोदे गये हैं। पशुओं की आकृतियां बडी सजीव, सुंदर एवं कलात्महक हैं।‘’
‘हिंदुस्ता न की कहानी’ पुस्तंक के लेखक जवाहर लाल नेहरू ने लिखा है कि ‘’सिंध घाटी की सभ्यदता, ईरान, मेसोपोटामिया और मिश्र की उस काल की सभ्यकताओं के संपर्क में रही हैं, इसके और उनके लोगों में आपस में व्यापार होता रहा हैं और कुछ बातों में यह उनसे बढ कर रही हैं। यह एक शहरी सभ्य्ता थी जहॉं के व्यांपारी मालदार और प्रभावशाली लोग थें।‘’
सिंधुघाटी सभ्यीता, मोहन जोदडों के मीन गणचिन्ह , कुल गोत्र और धराड़ी व्यशवस्थां से इनकी आदिवासियत की प्राचीनता सिद्ध होती हैं इसे मातृभाषा के मौखिक गीतों के रूप में जीवंत रूप में सहेजना बेहद जरूरी हैं क्योंेकि भाषा ही संबंधित समाज की संपूर्ण पहचान होती हैं।
मीणा समाज के वरिष्ठह चिंतक, कवि, साहित्यिकार, इतिहासकार, पूर्व आईपीएस हरीराम मीणा ने अपने शोधालेख में लिखा है कि ‘’फादर हैरास ने मोहें-जो-दड़ो की प्रोटोद्रविड़ चित्रलिपि माना है, उत्खलनन में मछुवारा व नाव के चित्र मिले हैं जो प्राचीन आदिम समुदाय ‘मीनावर’ मत्य्िखा अथवा मीणा लोगों से संबंध जोड़ते हैं, सिंधी विद्धान मनु गिदवानी की धारणा है कि सिंध में जिन मछुवारों को ‘मुहाणों’ कहा जाता हैं वे वस्तु त: मीणा ही हैं । ……
……..मीणा समुदाय का प्रथम आधिकारिक इतिहास ग्रंथ की सामग्री झूंथालाल नाढ़ला ने एकत्रित की जिसे ‘मीणा-इतिहास’ शीर्षक से रावत सारस्वात ने लिखा । उन्हों ने समर्पण में लिखा है–‘सिंधुधाटी सभ्यधता से लेकर समस्ती भारतीय इतिहास में अपना अस्तित्वम प्रमाणित करने वाली संघ तथा गणबद्ध प्रणाली द्वारा जनतांत्रिक सिद्धांतों में आस्थाय रखने वाली और सहस्राधिक वर्षों से आक्रामक विदेशियों और राजपूतों के साथ अपने अधिकारों के लिए अनवरत संघर्षरत रहने वाली निश्छलल, शौर्य, उदारता और चारित्रिक दृढ़ता की धनी पर युगों तक शोषित और पीडित मेर, मेव, मेद आदि विविध नामों में विभक्तक महान मीणा जाति को समर्पित हैं ।‘’29
आदिवासी दर्शन व साहित्य का मूलाधार बड़को की कहन परम्पवरा ही पुरखां साहित्य हैं। पुरखां साहित्यव आदिवासी समाज में हजारों वर्षों से जारी मौखिक गीत, कथा परंपरा हैं। आदिवासी समाज और संस्कृसति में पुरखों का बहुत महत्व होता है । कहन या मौखिक परंपरा में मिलने वाले गीत, कथाएं, लोकोक्ति, मुहावरें, साखी, पद, गाली, नेहड़ा, दंगल, फैणी, उक्ति यां, ढॉचा, सुढ़डा, कन्है या, रसिया, लांगुरिया, हैल्याा, ख्या ला, कीर्तन, जागरणी, गोठ, डेंडैल गीत आदि पुरखों ने ज्ञान भण्डानर के रूप में सहेजी और रची हैं। मीणा समुदाय के स्त्री-पुरुष स्वयं ही गीतकार, नृत्यकार, संगीतकार, वादक, कृषक, चित्रकार, शिल्पकार, कलाकार, मौसम वैज्ञानिक, चिकित्सक, इतिहासकार, साहित्यकार और पुरखौती मौखिक परंपरा के हजारों सालों के ज्ञान के अथाह भंडार है।
मीणी भाषा में पुरखां साहित्यो की समृद्ध परंपरा मौजूद हैं। पुरखों का जीवन-दर्शन, ज्ञान-परंपरा, जीवन-मूल्योंी, लोक-विश्वागसों, संस्कृ्ति, भाषा-बोली और इतिहास को पुरखौती संपदा के अनमोल भंडारों के रूप में संपूर्ण समाज को बहुमूल्यह धरोहर का अद्भुत भंडार हैं। जो मीणी मातृभाषा के माध्यंम से ही अपने मूल रूप में सहेजा जा सकता हैं।

  1. ‘भारत का जनजातीय इतिहास’ पुस्तक के लेखक मंगल चंद मीणा ने लिखा है कि ‘’सिंधुघाटी सभ्यता से लेकर ब्रिटिश शासन काल तक भारतीय इतिहास वृतांत उन सब घटनाओं से भरें पड़े हैं जिनमें जनजा‍तीय लोग देश की स्वातंत्रता की रक्षा के लिए हजारों लाखों सालों तक निरंतर युद्ध करते रहे इसी तरह अपने अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षार्थ उन्होंने सामंती रियासतों जिन्होंने उनकों दबाने और शोषण करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, उनके खिलाफ अनवरत् संघर्ष किया जिनका भारतीय इतिहास में विस्तार से वर्णन मिलता हैं, जिनमें गोंड़, मुंडा, मैर, मेवाती, भील, मीना, कोली, खांसी, नागा, सैंधव, संथाली व दूसरे अनेक जनजातीय लोग शुमार थे यही नहीं इन लोगों ने ही बाहरी आक्रमणकारियों को जैसे अरबी, ग्रीक, पार्थियन, स्किथियन आदि को आगे बढ़ने से रोक के रखा ….. इसी तरह बाहरी शत्रुओं की तरह-तरह की कुटिल चालों से भारत को गुलामी की जंजीरों में जकड़ने की हर चंद कोशिशों को नाकाम कर उनसे सदा लोहा लेते रहें।
    29 सिंधुघाटी की सभ्येता का आलेख भाग 2 में फेसबुक वाल से साभार लेखक हरीराम मीणा

इसी वजह से उनके त्याग और देश प्रेम को सदा याद रखा जाएगा। इतिहास गवाह है कि लाखों भारतीयों ने जिनमें जनजातीय लोग भी हैं, किस तरह अपनी मातृभूमि के मान-सम्मान की रक्षार्थ सन् 1947 की आजादी की लडाई के अलावा सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व ही अपनी जान को जोखिम में डालकर अंग्रेजी हुकूमत को उखाड फैंकने में अपनी सारी ताकत झोंक दी जिसका जीता जागता साक्ष्य यह मानचित्र हैं।‘’30
मौखिक गीत आदिवासी समुदाय की ग्रामीण संस्कृति के आँगन में प्रस्फुटित हुआ है, जिसमें घर, बाड़ा, खेत, खलियान, जंगल, पहाड़, दर्रे, घाटियाँ, रेगिस्तान, नदियाँ, समुद्र, धरती, आकाश, हवा, पानी, अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा सभी तत्व शामिल होते हैं। भाषा केवल बात करने का ही माध्यम नहीं है, बल्कि भाषा सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक और प्राकृतिक समाज के पूरे हिस्से को एक पीढ़ी से लेकर दूसरी पीढ़ी को देने की ज्ञानधारा है। यह पूरा ज्ञान का सरोवर है। भाषा जितनी पुरानी होती है उसका ज्ञान विस्तार भी उतना ही विस्तृत होता है। पुरखा गीत उस समाज की भाषा का संपूर्ण ज्ञान भंडार है। हजारों साल बाद भी आदिवासी समुदाय शोषण, संघर्ष, विद्रोह, युद्ध, विस्थापन और पलायन की मार झेलता हुआ मैदान, पहाड़ और जंगल में सामूहिक रूप से रहकर अपनी मातृभाषा, संस्कृति और सभ्यता के बीच जीवन-यापन करता हुआ सबका संरक्षण कर रहा है।

-::परिशिष्ट::-
संदर्भ ग्रंथ सूची:-

  1. भारत का जनजातीय इतिहास : मंगल चंद मीणा : रावत पब्लिकेशन, जयपुर, संस्कोरण- 2019
  2. सैंधव लिपि का गोंडी में उद्वाचन : मो. छ. कंगाली (डॉ. मोति रावण कंगाली) : एस. बी. कंप्यूटर्स, नागपुर, संस्कचरण- 2002
  3. मीणा जनजाति का इतिहास : डॉ. यशोदा मीणा, जयपुर पब्लिसिंग हाऊस, चौडा रास्ताो, जयपुर, संस्कूरण- 2013
  4. मीणा जाति का अभ्युहदय : डॉ. शकुंतला मीणा, आलोक प्रकाशन, जयपुर, संस्कारण- 2015
  5. मीणा जाति का उत्कुर्ष : डॉ. शकुंतला मीणा, अजय प्रकाशन, जयपुर, संस्कारण- 2016
  6. मीणा इतिहास : रावत सारस्व त, राजस्थाेनी ग्रंथागार, सौजती गेट, जोधपुर(राज.), संस्क रण 2012
  7. भारत के आदिवासी चुनौतियां एवं संभावनाएं : संपादक- डॉ. जनकसिंह मीना एवं डॉ. कुलदीप सिंह मीना, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली , संस्कॉरण- 2017
  8. मेरी कहानी : एम सी मैरीकॉम – अनुवाद- नीलाभ, मंजूल प्रकाशन, भोपाल, संस्कररण- 2014
  9. आदिवासी साहित्यी परंपरा और प्रयोजन : वंदना टेटे, प्या रा केरकटा फाउण्डेतशन, रांची, संस्कमरण- अप्रैल, 2013
  10. आदिवासी दर्शन और साहित्यं : संपादक- वंदना टेटे, विकल्पा प्रकाशन, दिल्लीं, प्रथम संस्कमरण- 2015
  11. भारतीय जनजातिय समुदाय : सांस्कृमतिक धरोहर और मान्यगताएं, संपादक- प्रो. सतीश गंजू, डॉ. रवि कुमार गोंड, अनंग प्रकाशन, दिल्लीत, संस्कगरण- 2018
  12. उत्तीर-आधुनिकता और आदिवासी विमर्श नए विश्वालसों, नई आस्थांओं की ओर कदम, संपादक- डॉं. विनोद विश्व कर्मा, जे.टी.एस. पब्लिकेशन्सन, प्रथम संस्कजरण- 2016
  13. आदिवासी विमर्श इतिहास और संस्कृिति संघर्ष एवं नये जीवन के सपने : संपादक- डॉ. विनोद विश्वककर्मा, संस्कसरण- 2016
  14. मीणा जाति का सतत् विकास एवं संस्कृणति : दुर्गा प्रसाद माथुर : प्रकाशक- साहित्यावगार जयपुर, संस्ककरण- 2014
  15. धूणी तपे तीर : हरिराम मीणा, साहित्यप उपक्रम, दिल्ली, संस्किरण- 2008
  16. आदिवासी दुनिया : हीरराम मीणा, राष्ट्री य पुस्तपक न्याकस, भारत, संस्कारण- 2012
  17. आदिवासी विद्रोह : केदार प्रसाद मीणा, अनुज्ञा बुक्स , दिल्लील, संस्क रण- 2015
  18. आदिवासी शौर्य एवं विद्रोह : संपादक- रमणिका गुप्ता्, सुरभी प्रकाशन, दिल्ली, संस्क0रण- 2015
  19. काळा बादल रे अब तो बरसादे बळती आग : संपादक- राम नारायण मीणा ‘हलधर’, ओम नागर, बोधी प्रकाशन, संस्कबरण- 2017
  20. आदिवासी चिंतन की भूमिका : गंगा सहाय मीणा, अनन्यप प्रकाशन, दिल्लीप, संस्कररण- 2017
  21. आदिवासी मीना (मीणा) समाज का ग्रंथ : संपादक- ताराचंद चीता, चीता प्रकाशन श्री माधोपुर, संस्क रण- 2018
  22. हिंदुस्ताान की कहानी : जवाहर लाल नेहरू, प्रकाशन- सस्ताा साहित्यह मंडल, दिल्ल्ली, संस्कॉरण- 1997
  23. भारतीय लिपियों की कहानी – गुणाकर मुले, राजकमल प्रकाशन, दिल्लीर, संस्कलरण- 1974
  24. आदिवासी लोकगीतों की संस्कृनति : डॉ. रामरतन प्रसाद, अनंग प्रकाशन, दिल्लीस, संस्क9रण-2014
  25. आदिवासी साहित्यं, समाज और संस्कृनति : संपादक- जर्नादन, रविकुमार गोंड, राकेश कुमार सिंह, अनंग प्रकाशन दिल्ली्, संस्कृरण- 2017
  26. भारतीय सभ्यरता की निर्मिति : भगवान सिंह, प्रकाशन- साहित्यस उपक्रम, दिल्ली, संस्कंरण-2007
  27. लोक साहित्यर विज्ञान : डॉ. सत्ये न्द्रक, राजस्थातनी ग्रंथागार जोधपुर, संस्किरण- 2007
  28. लोक एवं लोक का स्विर : विद्यानिवास मिश्र, प्रभात प्रकाशन, दिल्लीज, संस्कधरण- 2009
  29. हिंदी लोकसाहित्यव शास्त्र सिद्धांत और विकास : डॉ. अनसूया अग्रवाल, नीरज बुक सेंटर दिल्लीं, संस्क रण- 2009
  30. लोक परंपरा, पहचान एवं प्रवाह : श्यावम सुंदर दुबे, राधाकृष्ण् प्रकाशन, दिल्ली , संस्कररण- 2003
  31. भारतीय संस्कृोति के आधार : विद्यानिवास मिश्र, प्रभात प्रकाशन, दिल्लीर, संस्किरण- 2006
  32. परंपरा इतिहास बोध और संस्कृ ति : श्यावमा चरण दुबे, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्लीर, संस्क रण-2008

सहयोगी पत्र/पत्रिकाएं

  1. आदिवासी साहित्यर
  2. अरावली उद्घोष
  3. झारखण्डीद भाषा साहित्य संस्कृवति अखड़ा
  4. गोंडवाना स्व‍देश
  5. आदिवासी सत्ता्
  6. गोंडवाना दर्शन
  7. जय मीनेश
  8. जनसत्ताश
  9. मीणा भारती
  10. चौमासा
  11. गोंडवाना समय

पुरखौती गीतों के लिए सहायक समाज के बड़े-बुजुर्गों की सूची:-
क्र. सं. नाम श्रीमती / सुश्री उम्र गोत्र गांव
1 रूकमणी देवी मीणा 68 गुमलाडू सरोळी / सोडाला जयपुर
2 तुलसा देवी 65 बैफलावत नांगळ प्या रीवास
3 कल्या णी 65 नारली/बडगोती पॉचूंडा, शिवदासपुरा जयपुर
4 सुशीला मीणा 41 खोड़ा नांगळ नटाटा
5 लक्षमा देवी 68 ब्याडवाल मालवीया नगर जयपुर

  1. छोटी मीणा 47 मांडळी बगरिया जयपुर
  2. कैलासी 56 देवाना गुणावता
    8 लछमा देवी 60 छापोला काली पहाडी
  3. कानी बाई 66 चांदा बीलवा, जयपुर
    10 दाफली बाई 65 चांदा दौलतपुरा जयपुर
    11 भागवती देवी 52 गुमलाडू सांगानेर जयपुर
    12 प्रभाती देवी 61 ध्याावणा लूनियावास जयपुर
    13 श्री कैलाश बैंदाडा 48 बैंदाडा लोक गायक
    14 श्री हीरा लाल 52 जागा जागा आमेर
    15 श्री परताप मीणा 62 गोमलाडू प्रसिद्ध पुरखा लोक गायक
    16 हुडमानी 59 लोटण रामनगरिया
    17 छोटा देवी 70 सीरा सादड
    18 मनफूली 55 खोडा खाजलपुरा
    19 मुन्नीर देवी 63 ब्यानडवाल जगतपुरा
    20 नैना देवी 64 नीमवाल रामबास दौसा

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