लेखक परिचय

लक्ष्मी जायसवाल

लक्ष्मी जायसवाल

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा एम.ए. हिंदी करने के बाद महामेधा तथा आज समाज जैसे समाचार पत्रों में कुछ समय कार्य किया। वर्तमान में डायमंड मैगज़ीन्स की पत्रिका साधना पथ में सहायक संपादक के रूप में कार्यरत। सामाजिक मुद्दों विशेषकर स्त्री लेखन में विशेष रुचि।

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दर्द तुझसे नफरत थी मुझे बेइन्तहां
पर अब तू ही मेरा सच्चा साथी है
जाने अनजाने हुई तुझसे मेरी दोस्ती
अब तू ही मेरे सफर का हमराही है।
कह न सकी जो दास्तां कभी किसी से
वो तू मेरे दर्द बिन कहे पढ़ लेता है।
आखिर जीवन की यह अनकही दास्तां
भी तो तेरी ही यारी का तोहफा है।
सपने में भी सोचा न था कभी कि तुझसे
यूँ मेरा नाता इतना गहरा जाएगा कि
तू कभी भी मेरे इतने करीब आ पाएगा।
भागती थी तेरे साये से भी बहुत दूर मैं
पर आज तेरे साथ जीने को हूँ मजबूर।
ज़िन्दगी ने करवट ऐसी बदली कि
जाने कब तुझसे नाता गहराया कि
लगता है अब तू मुझे मेरा हमसाया।
तुझसे हुई यारी तो सबने छोड़ा साथ
पर तूने आज भी थामा है मेरा हाथ।
कहते हैं रिश्ते बड़े अजीज होते हैं, वही
हमारे दिल के सबसे करीब रहते हैं।
पर कमजोर थी उन रिश्तों की डोर
दर्द से नाता होते ही छोड़ा अधर में
ढूंढने चली हूँ अब मैं रिश्तों के मायने
उलझी हूँ जाने कौन-कौन से भंवर में
कोई न अपना हुआ, अपनों का साथ
जो जैसे मेरे लिए सपना हुआ, अब न
कोई उम्मीद न कोई जीवन में आस है
अब न मुझे किसी ख़ुशी की तलाश है।
दर्द अब तो तू ही मेरा दोस्त, हमदम
और मेरे जीवन भर का साथी है , पर
तू भी छोड़ न देना साथ मेरा क्योंकि
अब तू और केवल तू ही मेरे साथ है।

लक्ष्मी जयसवाल अग्रवाल

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