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दूध में मिलावट: आर्थिक अपराध नहीं नैतिक पतन की पराकाष्ठा

भारत आज गर्व से दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश होने का दावा करता है। वैश्विक दूध उत्पादन में हमारी हिस्सेदारी लगभग 25% है। आंकड़ों की बाजीगरी में हम नंबर वन हैं, लेकिन क्या कभी हमने उस दूध के गिलास की गहराई में झांक कर देखा है जिसे हम ‘अमृत’ समझकर अपने बच्चों को पिलाते हैं? हालिया रिपोर्ट्स और समाचार पत्रों के दावे चौंकाने वाले ही नहीं, रूह कंपा देने वाले हैं।

क्योंकि दुर्भाग्य से आज देश भर में जांचे गए दूध के हर तीन में से एक नमूना जांच में फेल हो रहा है। यह महज एक सांख्यिकीय डेटा नहीं है, बल्कि हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र की विफलता का अलार्म है।

एफएसएसएआई  की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 से 2018 के बीच दूध में मिलावट का ग्राफ 16.64% था, जो 2022 तक बढ़कर 38% तक पहुंच गया। यानी लगभग हर तीसरा गिलास मिलावटी है।

उत्तर भारतीय राज्यों में यह समस्या अधिक विकराल है। दूध के नमूनों में ‘नॉन-कन्फर्मिंग’ (अमानक) होने की दर उत्तर भारत में करीब 47% तक पाई गई है।

लेकिन समस्या इतनी भर नहीं है कि दूध में मिलावट के आंकड़े खतरनाक स्तर पर पहुंच गए हैं, चुनौती यह है कि देश की सेहत से जुड़े इस गंभीर मामले को लेकर हमारा तंत्र कितना लापरवाह है।

मध्यप्रदेश के ग्वालियर की एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले 5 सालों में डेयरी उत्पादों में मिलावट के 490 केस दर्ज हुए, 3.66 करोड़ का जुर्माना लगाया गया, लेकिन वसूली शून्य के बराबर रही। जब कानून का क्रियान्वन ही नहीं हो पातातो मिलावटखोरों के हौसले बुलंद होना लाजिमी है।

क्या हमने कभी सोचा है कि उस एक गिलास मिलावट वाले दूध में वास्तव में क्या है?

हम अक्सर सोचते हैं कि मिलावट का मतलब सिर्फ दूध में पानी मिलाना है। काश ऐसा ही होता! पानी से केवल पोषण कम होता है, लेकिन आज जो मिलाया जा रहा है वह सीधे मौत का सामान है!

मुनाफाखोरों के लालच की इंतहा यह है कि दूध में झाग बनाने और फैट दिखाने के लिए वाशिंग पाउडर और यूरिया का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि यूरिया हमारे गुर्दों (किडनी) पर सीधा प्रहार करता है।

इसके अलावा दूध को सफेद और गाढ़ा दिखाने के लिए घटिया दर्जे का तेल और कास्टिक सोडा मिलाया जाता है, जो पाचन तंत्र को पूरी तरह ध्वस्त कर सकता है।

दूध को लंबे समय तक फटने से बचाने के लिए हानिकारक रसायनों का प्रयोग होता है, जो भविष्य में कैंसर जैसी घातक बीमारियों का कारण बन सकते हैं।

लेकिन लाभ की अंधी दौड़ मासूमों के स्वास्थ्य को कितनी हानि पहुंचा रही है, इस बात की संवेदनशीलता को हम समय रहते समझ जाएं यह आवश्यक है। नहीं तो जो भारत आज इस बात पर इतरा रहा है कि वो विश्व का सबसे युवा देश है उसे बच्चों और युवाओं के सबसे खराब स्वास्थ्य वाला देश बनने में देर नहीं लगेगी।

एक मां जब अपने बच्चे को दूध पिलाती है, तो इस विश्वास के साथ कि वह उसे स्वस्थ पोषण दे रही है। लेकिन क्या उस मुनाफेखोर को जरा भी आत्मग्लानि होती है जो चंद रुपयों के लिए वो एक मां की ममता से विश्वासघात कर रहा है? यह केवल एक आर्थिक अपराध नहीं है, यह नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।

दरअसल भारत में दुग्ध उत्पादन निरंतर बढ़ा है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की शक्ति है। परंतु उत्पादन की गति यदि गुणवत्ता की निगरानी से तेज हो जाए, तो संतुलन बिगड़ता है। मांग बढ़ती है, प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, और वहीं से अनैतिक शॉर्टकट का जन्म होता है। यदि निरीक्षण तंत्र अनियमित हो, यदि दंड विलंबित हो, यदि दोषियों को वास्तविक भय न हो—तो मिलावट एक “कम जोखिम, अधिक लाभ” का व्यापार बन जाती है।

समय-समय पर छापेमारी में मिलावटी घी, खोया और दूध की बड़ी मात्रा जब्त होती है। समाचार प्रकाशित होते हैं। पर क्या हमने यह देखा कि कितने मामलों में त्वरित और कठोर दंड हुआ? कितने लाइसेंस स्थायी रूप से निरस्त हुए? कितनी परीक्षण रिपोर्टें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई गईं ताकि नागरिक स्वयं गुणवत्ता जान सकें? पारदर्शिता के बिना विश्वास संभव नहीं।

इस समस्या में समाज भी निष्पक्ष दर्शक नहीं है, हम एक जागरूक नागरिक के नाते अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुरा सकते। हम सस्ता विकल्प चुनते हैं, स्रोत नहीं पूछते, लेबल नहीं पढ़ते। हम सुविधा को प्राथमिकता देते हैं और गुणवत्ता को अनुमान पर छोड़ देते हैं। जब उपभोक्ता प्रश्न पूछना बंद कर देता हैतब बाजार उत्तरदायित्व छोड़ देता है।

परिणाम स्वरूप आज मुनाफे की यह अंधी दौड़ हमें वहां ले जा रही है जहां हम ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो जवानी आने से पहले ही बीमारियों के बोझ तले दबी जा रही है।

आज श्वेत क्रांति‘  ‘श्वेत संकट‘ बन चुका है।

 स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए सरकारी स्तर पर यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि नियमों का कठोरता से पालन हो। नियमित वैज्ञानिक परीक्षण अनिवार्य हों और उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए। दोषियों के विरुद्ध त्वरित न्यायिक प्रक्रिया और कठोर आर्थिक दंड सुनिश्चित हों, ताकि मिलावट आर्थिक रूप से अलाभकारी बने।

उपभोक्ता के स्तर पर भी जागरूकता उपलब्ध करने को प्राथमिकता दी जाए। इसके लिए परीक्षण किटसूचना और शिकायत तंत्र तक उसकी सहज पहुँच हो जो आज के डिजिटल इंडिया में कोई कठिन लक्ष्य नहीं है।

अगर हम इक्कीसवीं सदी के युवा एवं स्वास्थ्य  भारत के स्वप्न को साकार करना चाहते हैं तो हमें अपनी भावी पीढ़ी के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी ही होगी और मिलावट के विरुद्ध कठोर कदम उठाने होंगे। क्योंकि दूध में मिलावट केवल कुछ स्वार्थी और मुनाफाखोर लोगों द्वारा किया गया मात्र खाद्य अथवा आर्थिक अपराध नहीं है। अपितु यह देश के भविष्य के साथ किया गया एक ऐसा खिलवाड़ है जिसके दूरगामी परिणाम पूरे देश को भुगतने होंगे ।

डॉ नीलम महेंद्र