मीरी – पीरी के मालिक – गुरु हरगोबिन्द सिंह

hargoving ji ( 5 जुलाई गुरु हरगोबिन्द जयंति विशेष)

परमजीत कौर कलेर

मीरी पीरी के मालिक…सच्चे पातशाह जिन्होंने अपनी आंखों से सिखी का पौधा मजबूत होते देखा है…विरासत में मिले इस पौधे की जड़े मजबूत करने में इन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी…जी हां बात कर रहे हैं सिखों के छठे पातशाह साहिब श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी की…जिनका आज है प्रकाश पर्व जिसे देशभर में बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जा रहा है…मीरी पीरी के मालिक, दाता बन्दी छोड़, भक्ति और शक्ति के मालिक साहिब श्री गुरु हरगोबिन्द जी का जन्म 5 जुलाई 1595 में …गुरु की वडाली जिला अमृतसर में हुआ …इनकी माता गंगा जी…जो औलाद न होने के कारण परेशान थी …गुरु अर्जुन देव जी ने इसके लिए बाबा बुड्ढा जी का आशीर्वाद लेने को कहा…बाबा बुड्ढा जी जो गुरु घर और गायों को घास डालने की सेवा करते थे…माता गंगा जी एक दिन तैयार होकर कई तरह के पकवान बनाकर बाबा बुड्ढा जी के पास गईं…मगर बाबा बुड्ढा जी ने ये पकवान नहीं खाए… लेकिन माता गंगा ने पुत्र का वरदान मांगा…इस पर बाबा बुड्ढा जी ने कहा कि मैं तो गुरु घर का साधारण सा सेवक हूं …लेकिन गुरु अर्जुन देव जी सब कुछ जानते थे …पुत्र की चाहत में माता गंगा जी फिर गुरु अर्जुन देव जी के पास आई तब गुरु अर्जुन देव जी ने कहा कि आप बाबा बुड्ढा जी के पास वेष बदल कर साधारण कपड़े पहन कर जाएं… इस तरह माता गंगा जी आस्था के साथ, मिस्सी रोटी , लस्सी का कटोरा, और प्याज़ लेकर गईं एक बार फिर बाबा बुड्ढा जी की सेवा में पहुंची …अब की बार बाबा बुड्ढा जी को भूख बड़ी तेज लगी थी और प्याज को हाथ से तोड़ते हुए बाबा बुड्ढा जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि पुत्री तेरे घर ऐसे पुत्र का जन्म होगा जो प्याज़ की तरह दुश्मनों के छक्के छुड़ाएंगा। इस तरह बाबा बुड्ढा जी के आशीर्वाद से गुरु हरगोबिन्द जी का जन्म हुआ…पुत्र के जन्म की खुशी में गुरु अर्जुन देव ने अमृतसर में छ हरटों वाला कुआ लगवाया ..जिसे छेहरटा साहिब कहा जाता है…गुरु हरगोबिन्द जी के प्रकाश पर्व को पूरे देश में बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है…इस दिन नगर कीर्तन निकाले जाते हैं …लंगर लगाए जाते है गुरुद्वारों में संगत गुरु घर की सेवा में लीन नज़र आती है … हर श्रद्धालु आस्था में रंगा नज़र आता है पूरा माहौल गुरु हरगोबिन्द जी के रंग में रंग जाता है…।

चेहरे पर अलग ही नूर जो किसी दरवेश के चेहरे पर ही होता है…जब गुरु हरगोबिन्द सिंह जी की उम्र महज 11 साल की थी…तब इनके पिता गुरु अर्जुन देव जी शहीद हो गए थे…गुरू अर्जुन देव जी की शहीदी के बाद गुरुगद्दी का भार गुरु हरगोबिन्द जी के कंधों पर आ गया…यही बस नही हुआ नन्हें हरगोबिन्द जी को मारने की भी कोशिशें की गईं …मगर उस अकाल पुरख के आगे किसी का बस नहीं चलता और शत्रुओं की सभी चालें धरी की धरी रह जाती हैं…गुरु हरगोबिन्द जी के जन्म से सबसे ज्यादा दुखी थे पृथी चंद …उन्होंने नन्हें साहिबजादें को मारने के लिए कई साजिशें रचीं…पहले तो उनको दूध में जहर पिलाने की कोशिश की गई …फिर सांप कटवाने की चाल चली गई…मगर पृथी चंद अपनी सभी चालों में नाकाम रहा..बाल उम्र में गुरु हरगोबिंद जी को चेचक जैसी खतरनाक बीमारी ने घेर लिया…ठीक होने के बाद गुरु साहिब ने अकाल पुरख का शुक्रिया अदा करते हुए कहा…

सदा सदा हरि जापे।।प्रभ बालक राखे आपे।।

सीतला ते रखिआ बिहारी।। पारब्रह्म प्रभ कृपा धारी।।

गुरु हरगोबिन्द जी जब 6 साल के हुए तो श्री गुरु अर्जुन देव जी ने बाबा बुड्ढा जी से  कहा बाबा जी फट्टी पर पैंती लिखकर साहिबजादे को दें…बाबा जी ने पांचों गुरुओं का ध्यान लगाकर फट्टी लिखी …इस तरह बाबा बुड्ढा जी से साहिब श्री हरगोबिन्द जी ने आस्त्र – शस्त्र , घुड़सवारी, तीरंदाजी, निशानेबाजी, राजनीति और रणनीति की शिक्षा ग्रहण की…जब इन्हें गुरुगद्दी सौंपी गई तो गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने कहा बाबा जी मुझे तलवारें पहनाओं..बाबा बुड्ढा जी ने उन्हें दो तलवारें पहनाई मीरी और पीरी। गुरु हरगोबिन्द जी के तीन विवाह हुए …माता नानकी, माता महादेवी और माता दमोदरी जी इनकी पत्नियां थीं…इनके घर बाबा गुरदिता, बाबा सूरजमल, बाबा अणी राय, बाबा अटल राय , गुरु तेग बहादुर ने जन्म लिया जबकि  बीबी बीरो आपकी पुत्री थीं। गुरु हरगोबिन्द जी ने जो दो  तलवारें धारण की थीं …वो दोनों आध्यात्मिक और शक्ति का प्रतीक थीं ।मीरी तलवार प्रतीक थी राजनीतिक शक्ति और पीरी प्रतीक थी आध्यात्मिक शक्ति का  …राजनीति में सिख अपनी अच्छी तरह से पैठ बनाए…इसके लिए 1609 में गुरु जी ने श्री हरिमंदिर साहिब, अमृतसर में अकाल तख्त का निर्माण करवाया… जहांगीर का हुक्म था कोई भी अपना निजि चबूतरा 2 फुट से ऊंचा नहीं बनवाएगा लेकिन गुरु जी ने इन बातों की कोई परवाह नहीं  की और अकाल तख्त बारह फुट ऊंचा बनवाया गया…यहां बैठकर गुरु साहिब सिखों को धर्म उपदेश के साथ साथ सिख मसलों को सुलझाते थे…गुरु जो होते है परम ज्ञानी होते हैं और वो करते हैं सबके साथ न्याय …अन्याय तो उनके दरबार में होता ही नहीं…लोग गुरु साहिब की न्यायप्रियता से इस कदर कायल हो गए कि दिल्ली और लाहौर जाने की बजाए यहीं आने लगे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी की ओर से स्थापित श्री अकाल तख्त साहिब में आज भी सिखों के फैसले होते हैं…समय की नज़ाकत को समझते हुए…गुरु हरगोबिन्द साहिब जी ने शास्त्र शिक्षा ली…वो हर तरह के हथियार चलाने में माहिर थे…वे महान योद्धा थे…वो चाहते थे कि हर एक  सिख बहादुर बने…जुल्म और अत्याचार का डटकर मुकाबला करे…गुरु गद्दी संभालते हुए जब इन्होंने मीरी और पीरी तलवारें धारण कीं…तो तब सिख इतिहास ने एक नया मोड़ लिया…छठे पातशाह साहिब श्री गुरु हरगोबिन्द जी की बातों से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें भेंट स्वरूप घोड़े और शस्त्र देने शुरू कर दिए…अकाल तख्त पर कवियों और ढाडियों ने गुरु यश और वीर योद्धाओं की गाथाएं गानी शुरू कर दीं…लोगों ने मुगल साम्राज्य को जड़ से उखाड़ने का मन बना लिया…गुरु हरगोबिन्द जी गुरु नानक देव जी के विचारों को प्रफुल्लित करने में जुटे थे…जो मुगल बादशाह जहांगीर को बर्दाश्त नहीं था …गुरु जी की यश गाथा सुन कर जहांगीर ने  गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया…

गुरु जी के  अथक प्रयासों से सिख परम्परा में नया मोड़ आ रहा था और सिख धर्म तेजी से विकास कर रहा था …गुरू हरगोबिन्द जी की आभा और शक्ति का लोगों के दिलो दिमाग पर ऐसा असर हुआ कि वो गुरु के रंग में रंग गए….उनकी आध्यात्मिक और भक्ति की शक्ति का प्रभाव धर्म के ठेकेदारों को बर्दाश्त नहीं हो रहा था…मुगल बादशाह जहांगीर को ये बात हजम नहीं हो रही थी …उसने गुरू जी को ग्वालियर के किले में नज़रबंद कर दिया…गुरु साहिबान बड़े ही दयालु होते हैं…जेल के दौरान गुरु महाराज को जो रुपए मिलते वो अन्य कैदियों को बांट देते थे…ग्वालियर के इस किले में कई राजे महाराजे भी सजा काट रहे थे …उनका जीवन नरक से भी बदतर था…जहां सच्चा शहनसाह होगा वहां का वातावरण तो बदलना जाहिर सी बात है…गुरु हरगोबिन्द जी के जेल जाने से मानो जेल की आबो हवा ही बदल गई…साईं मीयां मीर जी जो कि हजरत मुहम्मद साहिब के खलीफा वंश से ताल्लुक रखते थे…उनका मुस्लिम समाज में बड़ा ही सम्मान था..उन्होंने  गुरु हरगोबिन्द जी को आजाद करने की सिफारिश की…जब वजीरखान गुरु हरगोबिन्द जी को आजाद करने के लिए ग्वालियर के किले में पहुंचा तो गुरु साहिब ने रिहा होने से इंकार कर दिया…वो चाहते थे कि  52 राजाओं को भी उनके साथ  छोड़ा जाए…इस तरह बादशाह ने 52 राजाओं को ग्वालियर के किले से मुक्त करवाया…गुरु जी ने 52 कलियों वाला चोला बनवाया और उस पर बनी एक एक कली उन्होंने इन राजाओं को पकड़ने को कहा इस तरह सारे राजा गुरु जी का चोला पकड़कर  किले के बाहर आ गए…इस उपकार के कारण लोग गुरु साहिब को दाता बन्दी छोड़ कहने लगे। गुरु हरगोबिन्द जी इन सभी हिन्दू राजाओं को रिहा करवा कर गुरु मर्यादा अनुसार अमृतसर पहुंचे…ये दिन दीवाली की तरह थी…गुरु जी के आने की खुशी में लोगों ने घी के दीए जला कर अपनी खुशी का इज़हार किया और सारे शहर में दीपमाला प्रज्वलित की गई …

गुरू हरगोबिन्द जी ने सिख धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए कई यात्राएं की एक बार जब कश्मीर की यात्रा कर रहे थे तो इनकी मुलकात माता भाग्भरी से हुई…जिन्होंने सवाल पूछा कि क्या आप गुरु नानक देव जी हैं…क्योंकि भाग्भरी ने पहले गुरु नानक देव जी को नहीं देखा था…उन्होंने गुरु नानक देव जी के लिए 52 कलियों का चोला बनाया …माता भाग्भरी की गुरु नानक देव के प्रति श्रद्धा को देखते हुए गुरु हरगोबिन्द जी ने ये चोला पहना और इसी चोले को पहनकर गुरु जी ने 52 राजाओं को गवालियर के किले की कैद से छुड़वाया था…तभी से इन्हें दाता बन्दी छोड़ कहा जाता है…

पंजि पिआले पंजि पीर छठमु पीरु बैठा भारी।

पंज प्याले से भाव यह है सच, संतोष, दया, धर्म और धीरज के गुण उस अकाल पुरख में ही हो सकते हैं…गुरुहरगोविंद सिंह साहिब जी ने लोक भलाई के ऐसे ऐसे काम किए हैं जिनकी तारीफ में शब्द भी कम पड़ सकते हैं….और हमारी जुबान इस लायक नहीं है कि हम उनकी तारीफ कर सकें…सभी गुरुओं में एक ही जोत है इसलिए तो कहा भी गया है…

अरजुन काया पलटि कै मूर्ति हरगोबिन्द सवारी

दलिभंजन गुरु सूरमा वड जोधा बहु परउपकारी ।।

दलभंजन गुरू सूरमा से भाव यह है कि उनमें गुण ही गुण  भरे पड़े हैं…गुरु हरगोबिन्द जी और मुगलों के बीच चार युद्ध हुए… जिसमें गुरु हरगोबिन्द जी ने जीत का परचम फहराया…पंजाब के आधुनिक नगर हरगोबिन्दपुर में भगवानदास क्षत्रिय ने इस जमीन पर अपना हक जताया और जबरदस्ती इस जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की…इसमें भगवानदास मारा गया…जिसमें मुगलों की बुरी तरह से हार हुई। मुगलों और गुरु हरगोबिन्द साहिब में दूसरी जंग अप्रैल 1634 नें हुई…इस जंग की वजह बड़ी ही मामूली थी…सिखों ने गलती से शाहजहां की मुगल फौज का शाही बाज उठा लिया…सिख अमृतसर के गुम्मटाला गांव में शिकार कर रहे थे और मुगल भी इस इलाके में थे …बाज उठाने के कारण दोनों पक्षों में ये युद्ध हुआ…बेशक इस लड़ाई में गुरु हरगोबिन्द जी शामिल नहीं थे…मगर शाहजहां इस कदर भड़का कि  उसने लोहगढ़ के किले पर हमला कर दिया..बेशक सिखों की संख्या कम थी…मगर उन्होंने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए…इस तरह तीसरी और चौथी लड़ाई में गुरु के सिख ही विजेता रहे और मुगलों की जबरदस्त हार हुई…गुरु हरगोबिन्द साहिब जी ने बाणी की रचना नही की …मगर गुरु अर्जुन साहिब तक की बाणी को संकलित किया और इसका प्रचार -प्रसार किया…आखिरकार गुरु जी सतलुज नदी पार करके कीरतपुर पहुंचे…यहां इन्होंने धर्म प्रचार का एक सैंटर खोला…जहां पर उन्होंने तकरीबन 10 साल व्यतीत किए…गुरु हरगोबिन्द जी की याद में 85 गुरुद्वारा साहिब बने हुए हैं …यही नहीं धन धन साहिब श्री हरगोबिन्द जी ने पहले ही  पातालपुरी नाम का कोठा बना रखा था उन्होंने सारी संगत को हुक्म किया कि कोई भी इस कोठे में न आए …चार दिन लगातार आप दरवाजा खोल कर पाठ करते  और दरवाजा बंद करके प्रभु भक्ति में लीन रहते थे…यहां पर वे प्रभु का सिमरन करते थे…जब पांचवें दिन गुरु हर राय ने दरवाजा खोला तो वो आसन अवस्था में 19 मार्च 1644 को ज्योति जोत में समा गए…ये चैत्र की 5 और 6तारीख को सम्वत 1701 थी।

साहिब श्री गुरू हरगोबिन्द जी तो बेअंत है ..उनके गुणों को न तो कागज पर लिख कर और  ना ही ये जुबान बयां  कर सकती है…वो तो हैं गुणों के भंडार…इसे तो कोई गुरु का प्यारा भक्त ही महसूस कर सकता है….वो तो उस गूंगे व्यक्ति के मुंह में गुड़ के समान है…जो मीठे स्वाद का मज़ा ले तो सकता है पर मिठास को बयां नहीं कर सकता है…वैसे ही हमारी ये जुबान भी गुरु के गुणों को बयां करने के काबिल नहीं है ।

परमजीत कौर कलेर

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