लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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saltनमक राजनीति में मतदाता को लुभाने का नया फंडा सामने आ रहा है। इसलिए नमक खिलाने के ऐसे उपाय तलाशे जा रहे हैं, जिसके प्रभाव के चलते मतदाता नमक हरामी की न सोच पाए। इसी फंडे का नया समीकरण छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की भाजपा सरकारें धरातल पर उतार रही हैं। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे और अंत्योदय परिवारों को 1 रुपए किलो गेहूं और 2 रुपए किलो चावल के साथ 1 रुपए किलो आयोडीनयुक्त नमक भी खिलाया जाने लगा है। मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा नामक इस अनूठी योजना के भागीदारी दावा कर रहे हैं कि सस्ता अनाज के साथ, नमक देना गरीबों के लिए ऐसी दुर्लभ सौगात है कि वे एक दिन की मजदूरी में एक माह का खाद्यान्न जुटा सकते हैं। मसलन यह आहार पेट भर भोजन से कहीं ज्यादा लोगों को निकम्मा और लाचार बनाने का नुस्खा भी है। हो भी क्यों न ऐसे ही लोग तो सत्ताधारियों के शताब्दियों तक कृतज्ञ बने रहते हैं। हमारे राजवंश नमक के इसी कर्ज की याद-दिलाकर सत्ता-भोग के लड्डू आजादी की लड़ाई में कोई भागीदारी नहीं करने के बावजूद चखते चले आ  रहे हैं। वह भी दोनों हाथों से। राजवंशी परिवार बड़ी कुटिल चतुराई से भाजपा और कांग्रेस में भागीदारी करते हुए अपना सामंती रौब आज भी कायम किए हुए है। राजनीतिक विश्लेषक इसे नमक की महिमा का ही करिश्मा ही कहते हैं।

लोक जीवन से जुड़े होने के कारण नमक की महिमा हमेशा रही है। इसलिए हर थाली के लिए नमक जरुरी है। नमक की इसी जरुरत की महक उद्योग जगत को लगी तो उनकी जैसे बांछें खिल गईं। फिर क्या था, चिकित्सा विज्ञानियों के साथ सादा नमक में आयोडीन की कमी निकाल दी गई और आयोडीनयुक्त नमक का व्यापार सुरसामुख की तरह फैलने लगा। बाद में उद्योगपतियों, राजनेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने भारतीय नमक को सेवन करने से पहले, आयोडीनयुक्त होने की शर्त क्या जोड़ी, नमक के भाव आसमान छूने लग गए और नमक गरीब की थाली से गायब होने लगा। आसमान छूते भावों के चलते ही सदियों तक गरीब की रोटी का स्वाद बना नमक जब ग्राम झरिया के मजदूर देवदास मांझी की रोटी का स्वाद नहीं बन पाया तो उसने आत्महत्या कर ली थी। आयोडीनयुक्त होने के बाद जैसे कुदरती नमक को नजर लग गई और वह गरीब के लिए हराम हो गया।

ज्यादा आयोडीन वाला नमक घेंघा रोगियों के लिए लाभदायी होता है। निरोगी काया के लिए इसे हानिकारक माना गया है। क्योंकि आयोडीन के बहाने इसमें पोटेशियम आयोडेट मिलाया जा रहा है, जो जहरीला तत्व हैं। इसका इस्तेमाल बारुद बनाने में किया जाता है। आयोडीन युक्त नमक के साथ इसकी असलीयत बयान करने वाला एक और तथ्य जुड़ा है। यह नमक उपभोक्ताओं तक पहुंचते – पहुंचते 40 प्रतिशत कपूर की माफिक हवा में विलीन हो जाता है। 40 फीसदी खाना पकाने और मुंह का स्वाद बनते – बनते अनंत में विलीन हो जाता है। 20 फीसदी जो बचा रहता है, उसका काया की माया पर लाभदायी असर नहीं पड़ता। बावजूद देश की पूरी आबादी को नीति बनाकर जबरिया ओयोडीनयुक्त नमक खिलाया जा रहा है। जाहिर है, यह खेल इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की तिजोरियां भरने के लिए खेला जा रहा है।

समुद्र के किनारे जो नमक 25-30 पैसे प्रति किलो बिना मोल व तोल किए मारा-मारा फिरता था, वही नमक व्यापारियों के हाथ का हथियार बनते ही 15 रुपए प्रति किलो के भाव तक जा पहुंचा है। जबकि नमक को आयोडीनयुक्त बनाने में बमुश्किल खर्च आता है 10 पैसे प्रति किलोग्राम। साफ है, नमक को मंहगा करके बारे न्यारे कर लेने के खेल के खिलाड़ी कौन लोग हैं ?

नमक की महिमा दुनिया में आम आदमी की तरह आम-फहम है। नमक मानव इतिहास की गाथा में बेहद महत्वपूर्ण खाद्य वस्तु रहा है। कभी आदि मानव भी वन्य-प्राणियों की तर्ज पर नमक की चट्टानें चाटकर स्वास्थ्य लाभ उठाया करते थे। छठवीं शताब्दी में नमक के व्यापार की शुरुआत हुई। तब एक तोला नमक के बदले एक तोला सोना आसानी से विनिमय करके मिल जाया करता था। इस दौरान नमक का सेवन भोजन में चुटकी भर नमक मिलाने के साथ, खाद्य सामग्री को खराब होने से बचाने के लिए भी किया जाता था।

तमाम लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि वेतन अथवा तनख्वाह का तर्जुमा ‘सेलरी’ नामकरण एवं प्रचलन नमक के अन्य वस्तुओं से विनिमय के चलते ही हुआ। बताते हैं, रोम की ‘विया सलेरिया’ नामक सड़क पर नमक की बिक्री के लिए दुकानें लगा करती थीं और फौंजी वेतन के बदले नमक ही लिया करते थे। यही सलेरियम कालांतर में अपभ्रंश होकर ‘सेलरी’ नाम से प्रचलन में आ गया। ईसाई शास्त्रों में भी चढ़ावे के रुप में नमक की महिमा का बखान है।

महात्मा गांधी ने आम आदमी की दाल-रोटी से जुड़े नमक की जरुरत का अहसास आजादी की लड़ाई में कर लिया था। लिहाजा 1930 में अंग्रेजों द्वारा थोपे गए ‘नमक कर कानून’ की खिलाफत को आंदोलन का हथियार तक बना डाला था। ‘नमक सत्याग्रह’ और गांधी का ‘दांडी मार्च’ इसी नमक कानून की खिलाफत का हिस्सा हैं। विंडबना देखिए सादा नमक के खाने पर प्रतिबंध उन्हीं के कांग्रेसी अनुयायिओं ने लगाया और लोक को सस्ते नमक से वंचित कर दिया। नमक के लिए बेहाल हुए लोगों की हालत देख गांधी की आत्मा जरुर कचोट रही होगी। खैर, फिलहाल नमक मतदाता को हलाल करने का जरिया बना हुआ है। लेकिन थाली में सस्ता नमक परोसने के दावे राज्य सरकारें भले ही कर रही हों, अन्नपूर्णा योजना में थाली से नमक के नदारद रहने की खबरें ही आ रही हैं। अब दुविधा के धर्मसंकट में मतदाता है कि वह लागू योजना का परिणाम नमक हलाली के रुप में दे या नमक हरामी के ? क्योंकि नमक योजना में तो शामिल है, लेकिन थाली से गायब है ? नमक का सियासी फंडा किस करबट बैठता है, यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा।

One Response to “नमक का सियासी फंडा”

  1. mahendra gupta

    कहीं कोई सी भी सरकार पीछे नहीं है,कोई नमक खिल रहा है,कोई पैसे बाँट रहा है,कोई खाद्य सुरक्षा के नाम पर अनाज बाँट रहा है. चार साल इन्हें याद नहीं आई अब लैपटॉप भी बाँट रहे हैं,अलाप संख्यक भी याद आ रहे हैं,जितना कुछ किया नहीं उससे ज्यादा अपने फोटो लगाकर परचार ही नहीं शोर भी कर रहें है.ये सभी लोग चाहे वे कहीं भी किसी भी दल में बसते हों निकम्मे नाकारा एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं.चेहरा अलह है,इनकी आत्मा एक जैसी ही है.

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