मनोरंजन

मोबाइल : जरूरत या जिंदगी

डॉ. नीरज भारद्वाज

संचार के इस युग में सभी तीव्र गति से काम चाहते हैं । पलक झपकते ही सूचनाओं का अंबार खड़ा हो जाना, इस युग की बहुत बड़ी देन भी कहीं जा सकती है। मुख से बोलते ही जानकारी का खजाना हमारे सामने है। क्या ठीक है और क्या गलत है, इसका निर्णय अब हमें स्वयं लेना होता है। साधन साधक के रूप में कार्य करने लगे हैं, ऐसा भी कई बार लगता है। इंटरनेट ने इस पूरे सूचना तंत्र को पंख लगा दिए हैं। पहले कंप्यूटर, फिर लेपटॉप और अब मोबाइल इसका सबसे सुचारू साधन बनकर उभरा है। मोबाइल केवल बातचीत करने का माध्यम ही नहीं रहा बल्कि इंटरनेट के चलते इसने कितनी ही साधन-सुविधाओं को अपने अंदर समाहित कर लिया है, कितने ही साधनों को यह निगल गया है और इसने कितने ही लोगों से दूरियां भी बना दी है।

‘मोबाइल एक सुविधा अनेक’ का यह मंत्र और साधन सभी की जेब में अपना स्थान बनाए हुए हैं। बातचीत के सफ़र से लेकर आज हर एक सुविधा इस यंत्र में धीरे-धीरे जुड़ती चली गई है। कभी पूरे गांव में एक टेलीविजन होता था. फिर घर-घर में टेलीविजन आया. अब टेलीविजन की उपयोगिता कितनी रह गई है, आप स्वयं से ही जान सकते हैं। मोबाइल के छोटे से स्क्रीन पर लोग घंटों-घंटों फिल्म, वीडियो, रील आदि देखते रहते हैं। हाथ पर बांधने वाली घड़ी को मोबाइल ने अपने अंदर समेट लिया, कैलेंडर और महत्वपूर्ण तारीखों को इसने अपने अंदर ले लिया। डायरी लेखन का काम भी इसमें अपने अंदर समाहित कर लिया। बढ़ती अर्थव्यवस्था में अब बैंक, एटीएम मशीन, शेयर बाजार का उतार चढ़ाव आदि की जगह मोबाइल ने ही ले ली है। मोबाइल में ही पैसे के लेनदेन का बहुत ही सरल तरीका हो गया है।

अब व्यक्ति समाज में बैठे या ना बैठे लेकिन सोशल मीडिया अकाउंट के माध्यम से देश-दुनिया में हो रहे व्यक्ति की हर पल की जानकारी यहां चल रही है, स्वयं भी वहीं खड़ा हुआ व्यक्ति अपनी जानकारी साझा कर रहा है। शादी के रिश्ते अब इंटरनेट अर्थात वेबसाइट के माध्यम से हो रहे हैं। लोगों का आमने-सामने का संवाद खत्म ही हो रहा है। देश की राजनीति सोशल मीडिया का आधार बनती जा रही है। हर तरफ इसी का बोलबाला है। बच्चे मैदान में काम मोबाइल गेम्स में अधिक व्यस्त दिखाई देते हैं। पढ़ने का सारा मसाला इस छोटे से यंत्र में कहीं ना कहीं से मिल ही जाता है। अच्छा देखना है या बुरा देखना है सभी इसकी परिधि में आ जाते हैं। सरकार बहुत सी साइट और कार्यों पर रोक लगा चुकी है फिर भी कोई ना कोई रास्ता निकल ही रहा है। ऑनलाइन ठगी और डिजिटल अरेस्ट ने तो नाक में दम कर रखा है। लोग एक लाइक के चक्कर में अपनी जान पर खेल जाते हैं। कितनी ही बार जान भी चली जाती है। लोग रील या अन्य वीडियो बनाने के चक्कर में अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं। सोशल मीडिया ने लोगों को भ्रमित कर दिया है, बाह्य दुनिया से दूर अब हम इस मोबाइल के अंदर की दुनिया में ही डूबे रहना चाहते हैं।

छोटे-छोटे बच्चे मोबाइल की लत लगा चुके हैं। हर जगह व्यक्ति को मोबाइल के साथ जोड़ दिया गया है। सरकारें ऑन लाईन शिक्षा अर्थात विद्यालय-विश्वविद्यालय चलाने की बात कर रही हैं। ऑन लाईन कोविड के समय मजबूरी में चलाई गई शिक्षा थी, लेकिन इसे सफल साधन-सुविधा मानकर चलाया जा रहा है। इसके दुष्परिणाम भी सामने हैं कि बच्चों की आँखें, मस्तिष्क, शारीरिक बनावट सभी कुछ खराब हो रहे हैं। फिर भी सरकारें इस ओर क्यों जा रही है, यह भी तो सोचने की बात है। एक कहावत है कि बाजार लुटने के बाद सजग होना कहां की बुद्धिमानी है। जब देश का भविष्य ही खराब हो जायेगा अर्थात युवा तो आप क्या हासिल कर पाओगे। सरकारें, माता-पिता और समाज के जागरूक लोग कह रहे हैं कि बच्चों को कैसे मोबाइल की लत से दूर किया जाए। जब मोबाइल हर क्षेत्र की जरूरत हो चुका है तो फिर इससे लोगों को कैसे दूर किया जाए। यह एक बड़ा प्रश्न है? मोबाइल से हमें स्वयं दूरी बनानी होगी, फिर बच्चों से कहकर उसे दूरी बनवानी होगी। स्वयं के उदाहरण से ही आप दूसरे को शिक्षा दे सकते हैं।

मोबाइल का प्रयोग एक निश्चित समय और सुविधाओं के लिए ही होना चाहिए। सभी चीजों को इसके साथ जोड़ने के चलते अब बहुत सी समस्याएं खड़ी हो रही हैं। हमें स्वयं इसका हल निकालना होगा। स्वयं के सुधार के साथ बच्चों को भी सुधारना होगा। आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ अच्छे नए उदाहरण हमें देने होंगे, क्योंकि विज्ञान जितना वरदान है उतना ही अभिशाप भी बन जाता है। हमें सुविधाओं का भोग करना आता है, तो हमें उन समस्याओं से निकलने के लिए भी रास्ता निकालना होगा।

डॉ. नीरज भारद्वाज