प्रो. महेश चंद गुप्ता
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 76वें जन्मदिवस के मौके पर देश के करोड़ों लोगों ने दीये जलाकर उनके दीर्घायु-शतायु होने की कामना की। यह पूरी दुनिया में बिरला ही अवसर है जब किसी समूचे राष्ट्र के लोग अपने नेता के लिए इस कदर स्नेहपूर्वक आशीर्वाद देने के लिए उठ खड़े हुए हों। देश भर में झिलमिलाते आशीर्वाद के करोड़ों दीपक मोदी के प्रति जनता के प्रेम, स्नेह और विश्वास के प्रतीक बन गए। इसी के साथ देश भर में शुरू हुआ एक महीने का सेवा संकल्प अभियान देशवासियों के लिए सहयोग, सम्बल और सेवा भाव का प्रतीक बनकर उभरा है।
देश-दुनिया में नेताओं की कोई कमी नहीं रही है लेकिन इस प्रकार का जन विश्वास हासिल करने वाले नेता बिरले ही हुए हैं जिनमें नरेन्द्र मोदी एक हैं। एक समय था जब मोदी संन्यासी बनने निकल गए थे, एक बार नहीं, तीन-तीन बार लेकिन हर बार संतों ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया कि नियति ने आपके लिए कोई और भूमिका सोच रखी है। इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने सेवा का रास्ता चुना। उनके प्रारंभिक जीवन को देखकर कहीं ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने राजनीति के शिखर तक पहुंचने की कोई सुनियोजित योजना बना रखी थी। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद जरूर उनके भीतर राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षा आकार लेने लगी होगी लेकिन उसके बाद की यात्रा बताती है कि जनता ने उन्हें लगातार स्वीकार किया।
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 13 वर्ष और देश के प्रधानमंत्री के रूप में 12 वर्ष का समय हमने देखा है। अब नरेन्द्र मोदी का सार्वजनिक जीवन भारतीय राजनीति के एक लंबे अध्याय में बदल चुका है। इस पूरे दौर को केवल चुनावी सफलता के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। मोदी की राजनीति का सबसे बड़ा आधार उनका वह विकासवादी विमर्श रहा जिसने सामान्य नागरिक की आकांक्षाओं को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया। वर्ष 2013 में देश राजनीतिक अनिश्चितता और निराशा के दौर से गुजर रहा था। ऐसे समय में मोदी विकास और निर्णायक नेतृत्व के संदेश के साथ राष्ट्रीय राजनीति में उभरे। 2014 के बाद उनकी सरकार ने जनधन, उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास, स्वच्छ भारत, जल जीवन मिशन, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं के जरिए सरकार की पहुंच सीधे आम आदमी तक बनाने की कोशिश की।
जनधन ने गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने, उज्ज्वला ने महिलाओं को धुएं से राहत देने, आवास योजना ने गरीब परिवारों को पक्का घर देने और जल जीवन मिशन ने ग्रामीण घरों तक नल का पानी पहुंचाने का लक्ष्य आगे बढ़ाया। आयुष्मान भारत ने गरीब परिवारों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का दायरा बढ़ाया जबकि डिजिटल भुगतान और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने सरकार और नागरिक के बीच लेन-देन का तरीका बदल दिया। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के जरिए किसानों को सीधे आर्थिक सहायता देने की व्यवस्था भी मोदी सरकार की महत्वपूर्ण पहलों में रही है। बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भी मोदी सरकार ने तेजी दिखाई। एक्सप्रेसवे, नए हवाई अड्डे, रेलवे का आधुनिकीकरण, वंदे भारत जैसी ट्रेनें, डिजिटल नेटवर्क और ग्रामीण कनेक्टिविटी विकास की बदलती तस्वीर पेश करते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, अंतरिक्ष, सेमीकंडक्टर और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी भारत की महत्वाकांक्षाएं बढ़ी हैं।
मोदी की राजनीति का एक दूसरा पक्ष उन फैसलों से जुड़ा है जिन्हें भाजपा लंबे समय से अपने वैचारिक एजेंडे का हिस्सा मानती रही थी। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधानों को हटाना और तीन तलाक के खिलाफ कानून जैसे फैसलों ने भारतीय राजनीति की दिशा और विमर्श को प्रभावित किया। समर्थकों ने इन्हें लंबे समय से लंबित संकल्पों की पूर्ति माना जबकि विरोधियों ने इन पर राजनीतिक और संवैधानिक सवाल उठाए लेकिन इन फैसलों ने यह जरूर दिखाया कि मोदी सरकार अपने घोषित एजेंडे पर निर्णायक कदम उठाने से पीछे नहीं हटती। मोदी को केवल जिद्दी नेता मानने वालों के सामने कृषि कानूनों की वापसी का उदाहरण भी मौजूद है। लंबे किसान आंदोलन के बाद नवंबर 2021 में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की गई। यह प्रसंग बताता है कि राजनीतिक दृढ़ता के साथ परिस्थितियों के अनुसार नीति में बदलाव की गुंजाइश भी मोदी की कार्यशैली में रही है।
मुझे मोदी का 7 फरवरी 2013 का वह भाषण आज भी याद है, जो उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दिया था। विकास, प्रगति और आर्थिक वृद्धि उनके भाषण के प्रमुख शब्द थे। वे वैश्विक परिदृश्य में उभरते व्यावसायिक मॉडल पर बोलने आए थे, लेकिन उनके संबोधन में जिस भारत की तस्वीर दिखाई दे रही थी, वह केवल उस समय के गुजरात तक सीमित नहीं थी। उस अद्भुत अवसर का साक्षी होने का मौका मुझे भी मिला था। मैंने उनका भाषण सुना और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब वे बाहर निकल रहे थे तो उनसे हाथ मिलाने का अवसर भी मिला। पता नहीं किस भावना से प्रेरित होकर मैंने उनसे कह दिया कि आप प्रधानमंत्री बनेंगे और देश आपको बड़ी उम्मीदों से देख रहा है। मोदी ने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराए और आगे बढ़ गए। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस समय उनके भीतर राष्ट्रीय राजनीति का सपना कितना आकार ले चुका था, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं था लेकिन विकास को लेकर उनकी स्पष्टता जरूर दिखाई देती थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद जिन योजनाओं और कार्यक्रमों को उन्होंने आगे बढ़ाया, उनमें उस सोच की छाप दिखाई देती है।
हाल में जब मोदी फिर श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स पहुंचे तो उन्होंने उस पुराने भाषण को याद किया। मेरे लिए यह केवल एक पुराने कार्यक्रम की स्मृति का लौटना नहीं बल्कि उस राजनीतिक यात्रा को सामने से देखने जैसा था, जिसकी एक महत्वपूर्ण झलक मैंने 2013 में देखी थी। मोदी के नेतृत्व में भाजपा का विस्तार भी भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन है। कभी भाजपा को सीमित सामाजिक आधार वाली ब्राह्मण-बनियों की पार्टी के रूप में देखा जाता था। मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने अपने सामाजिक और भौगोलिक विस्तार को काफी बढ़ाया। इसमें संगठन के साथ मोदी की व्यक्तिगत राजनीतिक शैली और व्यापक जनसंपर्क की भी भूमिका रही है। विदेश नीति में भी भारत की भूमिका अधिक मुखर हुई है। जी-20 की भारत की अध्यक्षता, ब्रिक्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की सक्रियता ने वैश्विक मंच पर देश की उपस्थिति को बढ़ाया है। भारत विभिन्न शक्तियों के साथ संबंधों में संतुलन रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
आर्थिक मोर्चे पर भारत ने भी अपनी स्थिति मजबूत की है। युवा आबादी को ताकत मानते हुए मोदी ने कौशल, उद्यमिता और तकनीक को विकास की धुरी बनाने पर जोर दिया है। हालांकि रोजगार, ग्रामीण आय, कृषि संकट, सामाजिक असमानता और विकास के लाभों के समान वितरण जैसी चुनौतियां आज भी सामने हैं। किसी भी सरकार की अंतिम परीक्षा इसी बात से होती है कि उसकी नीतियां आम नागरिक के जीवन में कितना स्थायी बदलाव लाती हैं। मोदी की राजनीतिक यात्रा के इस पक्ष को उनके विरोधी भी मानते हैं कि उन्होंने भारतीय राजनीति में बड़े लक्ष्य तय करने की शैली को स्थापित किया है। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य इसी सोच का सबसे बड़ा उदाहरण है।
76 वर्ष की उम्र में भी मोदी की सक्रियता उनकी राजनीति की पहचान बनी हुई है। वे युवाओं से संवाद करते हैं, नई तकनीक अपनाते हैं, दुनिया के नेताओं से संपर्क रखते हैं और देश के सामने नए लक्ष्य रखते हैं। प्रधानमंत्री के बजाय ‘प्रधान सेवक’कहलाना उनकी राजनीतिक भाषा का हिस्सा रहा है। राष्ट्र प्रथम और सेवा उनके सार्वजनिक जीवन की प्राथमिकता में रहे हैं। मोदी के 76 वर्ष केवल एक व्यक्ति की उम्र का पड़ाव नहीं हैं। यह भारतीय राजनीति के उस दौर का भी पड़ाव है जिसमें एक साधारण परिवार से निकलकर आया व्यक्ति गुजरात के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचा और फिर भारत की राजनीति की धुरी बन गया। मोदी ने जो सपना देखा है उसकी अंतिम परिणति क्या होगी, यह आने वाला समय बताएगा। 2047 का विकसित भारत कितना विकसित होगा, भारत वैश्विक शक्ति के रूप में कहां पहुंचेगा और मोदी की विरासत को इतिहास किस रूप में देखेगा, इन सवालों के उत्तर भविष्य के पास हैं पर मोदी ने जो सपना दिखाया है, उससे देशवासियों की उम्मीदों को पंख लगे हैं। सीएम और पीएम के रूप में सेवा के उनके 25 साल बेमिसाल हैं। मोदी ने राजनीति में ऐसी जगह बनाई है, जहां उनकी उपस्थिति केवल सत्ता तक सीमित नहीं है। वे आज भारतीय राजनीति, शासन, विकास और राष्ट्रीय आकांक्षाओं के विमर्श का एक बड़ा हिस्सा हैं। उनके जन्मदिन पर जलते करोड़ों दीपक उनके इसी राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव की एक तस्वीर हैं। कई लोग सवाल करते हैं कि क्या मोदी 2029 में फिर जीतेंगे लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि उनकी जगह लेने वाला है कौन?
प्रो. महेश चंद गुप्ता