डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एआरसीसी ) के शताब्दी समारोह में दिया गया भाषण केवल कोई उत्सवी सम्बोधन नहीं बल्कि विपक्ष की विफल नीतियों पर तल्ख़ और निर्णायक प्रहार लगता है। यह भाषण 2013 की कांग्रेस नीतियों के विनाशकारी परिणामों को उजागर करते हुए ‘जेन-जी’ पीढ़ी को ‘मोदी नेतृत्व’ वाली सरकार की सफलताओं से जोड़ता है। विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाओं से उनकी घबराहट साफ झलकती है—जब तर्क खत्म हो जाएँ, तो केवल आक्रोश और बहाने बचते हैं। दूसरी ओर यह इस बात का प्रमाण माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री ‘जेन-जी’ की ताक़त को बखूबी पहचान रहे हैं!
‘अतीत का काला अध्याय’ :
मोदी ने अपने भाषण में 2013 के उस ‘काले दौर’ को शिद्दत से याद किया जब “ग्रोथ फर्श पर थी और महँगाई अर्श पर।” यह केवल भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि कड़वा सच था—महँगाई 10 प्रतिशत के पार, रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, और ‘करण्ट अकाउण्ट घाटा’ (सीएडी) आसमान छू रहा था। मोदी ने कहा, “घोटाले चरम पर थे, भ्रष्ट बेखौफ घूम रहे थे, और हर जगह ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ की चर्चा थी।”
विश्व बैंक और ‘मॉर्गन स्टैनली’ जैसे संस्थानों ने भारत को ‘फ्रैजाइल फाइव’ (पाँच कमजोर अर्थव्यवस्थाओं) में शामिल किया—पाँच ऐसे उभरते बाजार जो वैश्विक वित्तीय झटकों के प्रति अत्यन्त संवेदनशील थे। यह शर्म का ‘टैग’ था, जो कांग्रेस की आर्थिक नीतियों की नाकामी का सीधा नतीजा था।
मोदी की नीतियाँ : ‘तीव्रतर विकास’ तक :
मोदी ने गर्व से कहा, “तब भारत को ‘फ्रैजाइल फाइव’ कहा जाता था, आज दुनिया भारत को ‘फास्टेस्ट ग्रोइंग मेजर इकॉनमी’ (एफजीएमई) के रूप में देख रही है।” 7.8 प्रतिशत की जीडीपी ग्रोथ उन लोगों के गले नहीं उतर रही, जिन्होंने भारत को इस हालत में पहुँचाया था।
यह केवल आँकड़ों का खेल नहीं, बल्कि नीतिगत क्रान्ति है—भ्रष्टाचार पर कड़ी कार्रवाई, जीएसटी जैसे सुधार, इंफ्रास्ट्रक्चर में अभूतपूर्व निवेश, और ‘मेक इन इण्डिया’ जैसी पहलें। जहाँ पहले ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ थी, वहाँ अब ‘पॉलिसी डायनामिज्म’ है।
आतंकवाद और सुरक्षा : नरमी बनाम सख्ती :
मोदी ने कहा, “तब आतंकवादी बेखौफ घूमते थे, पाकिस्तान बेकाबू था, और देश हर मोर्चे पर संघर्ष कर रहा था।” आज स्थिति बदल चुकी है—जम्मू-कश्मीर से नॉर्थ ईस्ट तक शान्ति बढ़ी है, नक्सलवाद की कमर टूट चुकी है, और आतंकवाद के खिलाफ भारत निर्णायक कार्रवाई करता है।
यह परिवर्तन संयोग नहीं, बल्कि मोदी की सख्त सुरक्षा नीति का परिणाम है—सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, और घुसपैठरोधी कड़ी कार्रवाई। विपक्ष की नरमी और तुष्टिकरण की नीति ने देश को कमजोर किया था, जबकि मोदी की दृढ़ता ने भारत को ताकतवर बनाया है।
विपक्ष की घबराहट : खरगे के आक्रोश में साफ संकेत :
प्रधानमंत्री के सम्बोधन पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की प्रतिक्रिया से उनकी घबराहट साफ झलकती है। उन्होंने कहा, “नाराज फूफा, दिमागी नक्सल, अर्बन नक्सल, खान मार्केट गैंग, आन्दोलनजीवी और परजीवी—एडजेक्टिवेस बदलते रहते हैं, पर मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियाँ नहीं बदलतीं।”
यह बयान केवल आलोचना नहीं, बल्कि विपक्ष की निराशा और घबराहट का प्रमाण है। खरगे ने आरोप लगाया कि मोदी “युवाओं के भविष्य की बात करने के बजाय अपनी नाकामी छिपाने के लिए राजनीतिक विशेषण गढ़ रहे हैं।” पर सवाल यह है कि जब विपक्ष खुद 2013 में इन मुद्दों को सुलझाने में पूरी तरह विफल रहा, तो आज उसकी नैतिकता कहाँ है?
खरगे ने कहा, “युवा भी रिपोर्ट कार्ड लेकर खड़े हैं।” यह बयान असल में विपक्ष की ‘घबराहट’ को उजागर करता है—जब आपके पास कोई वैकल्पिक नीति न हो, और जनता आपके शासनकाल की विफलताएँ याद दिलाये, तो केवल आक्रोश और बहाने बचते हैं।
राहुल गाँधी : बिहार के वीडियो से ध्यान भटकाने का प्रयास
राहुल गाँधी की प्रतिक्रिया और भी स्पष्ट संकेत देती है। उन्होंने बिहार में पुलिस फायरिंग में घायल छात्रों का वीडियो शेयर करते हुए पूछा, “क्या पीएम , एके-47 से टूटे सपने लौटा सकते हैं?”
यह रणनीति साफ है—जब मोदी के विकास मॉडल और 7.8 प्रतिशत ग्रोथ का जवाब न हो, तो किसी अन्य मुद्दे को उछालकर ध्यान भटकाने का प्रयास हो रहा है। राहुल का यह प्रयास उनकी घबराहट को उजागर करता है कि जेन-जी पीढ़ी मोदी के विकास मॉडल को समझ रही है, और विपक्ष के पास कोई वैकल्पिक दृष्टि नहीं है।
‘दिमागी नक्सल’ : विपक्ष की असलियत :
मोदी ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का प्रयोग करते हुए कहा, “मैंने आजादी के दिन यह शब्द गढ़ा था। दिमागी नक्सल एजेण्डे को मञ्च दे रहे हैं।” होम्योपैथिक दवा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इसके प्रयोग से शुरुआत में बीमारी के लक्षण ज्यादा साफ दिखते हैं—ठीक वैसे ही जैसे स्वतंत्रता दिवस के बाद ‘दिमागी नक्सल’ एक-एक करके सामने आ गये।
विपक्ष की प्रतिक्रियाएँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि मोदी का निशाना सही जगह लगा है। जब तर्क खत्म हो जाएँ, तो केवल ‘जनविरोधी नीतियाँ’ जैसे खोखले नारे बचते हैं।
जेन-जी : मोदी का नया लक्ष्य :
दरअसल, राजनीतिक नज़रिये से देखें तो प्रधानमंत्री का एसआरसीसी का दौरा जेन-जी में पहुँच प्रगाढ़ करने की रणनीति का हिस्सा था। मोदी ने युवाओं से कहा, “अगर भारतीय प्रतिभा दुनिया की शीर्ष कम्पनियों का नेतृत्व कर सकती है, तो भारतीय उद्यम भी विश्व का नेतृत्व कर सकते हैं।” यह सन्देश उद्यमशीलता, आत्मविश्वास और ‘विकसित भारत’ के सपने से जुड़ा है।
विपक्ष घबराया हुआ है क्योंकि ‘जेन-जी’ पीढ़ी मोदी के विकास मॉडल को समझती है। खरगे का बयान कि यह “राजनीतिक प्रचार” था, असल में विपक्ष की घबराहट का सबूत है।
निष्कर्ष : इतिहास गवाह है :
मोदी का भाषण विपक्ष पर केवल खुला राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि इतिहास के सामने दो नीतियों का मुकाबला है—एक तरफ 2013 की कांग्रेस नीतियाँ, जिसने भारत को ‘फ्रैजाइल फाइव’ बनाया, और दूसरी तरफ मोदी की नीतियाँ, जिसने भारत को ‘फास्टेस्ट ग्रोइंग मेजर इकॉनमी’ बनाया।
हकीकत में विपक्ष के पास आज भी कोई वैकल्पिक दृष्टि नहीं, वह जनता के सामने अपना कोई मॉडल रख पाने में अक्षम है! केवल ‘नाराज फूफा’ वाली मानसिकता है। मोदी ने सच कहा—”सच की हुंकार के आगे झूठ की गूँज टिक नहीं सकेगी।” इतिहास गवाह है कि 2013 की विफल नीतियों का बोझ विपक्ष कभी नहीं उतार पाएगा। खरगे और राहुल की प्रतिक्रियाएँ इस बात का सबूत हैं कि विपक्ष घबरा चुका है—जब तर्क खत्म हो जाएँ, तो केवल आक्रोश और बहाने बचते हैं।