मिस्टर मीडिया: टीवी देखना बंद करने जैसे फ़रमानों से भी कहीं तानाशाही की गंध तो नहीं आ रही

इन दिनों बहस आम है कि टेलिविजन देखना बंद कर दिया जाए। दो महीने के लिए। लोकतंत्र बच जाएगा। तानाशाही का ख़तरा देश पर मंडरा रहा है। अजीब सा तर्क है। सत्तर साल में इस देश ने गणतंत्र की मजबूत नींव रखी है। यह बुनियाद इतनी खोखली तो नहीं कि कुछ टीवी चैनल उसे ध्वस्त कर दें।

हिंदुस्तान के 90 करोड़ मतदाताओं में निजी चैनल दर्शकों की संख्या का आंकड़ा तो देखिए। आपकी आंखें खुल जाएंगीं। इनमें अधिकतर लोग पढ़े-लिखे हैं, अनपढ़ नहीं। कभी-कभी बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले को भी यह भ्रम हो जाता है कि बैलगाड़ी वही खींच रहा है। अफसोस!  ऐसा लगता है कि हमारे लोकतंत्र की गाड़ी खींचने का धोखा कुछ चैनलों को हो गया। मत भूलिए कि 1977 में जिन मतदाताओं ने आपातकाल के विरोध में वोट डाले थे, उनमें आधे से अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्होंने उस शक्तिशाली महिला को पराजय का द्वार दिखाया था, जिसका लोहा सारा विश्व मानता था। उन दिनों भारत में टीवी चैनलों का कोई अस्तित्व तक नहीं था। असल बात यही थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री के फ़ैसले में लोगों को कहीं न कहीं तानाशाह बन जाने की आशंका नज़र आई थी।

क्या यह हिंदुस्तान के करोड़ों लोगों की बौद्धिक क्षमता का अपमान नहीं है? दरअसल, कुछ चैनलों और वहां के एंकरों को अपने बारे में ग़लतफ़हमी हो गई है। अगर टेलिविजन के बिना भी करोड़ों लोग दशकों तक इस मुल्क़ की लोकतान्त्रिक आत्मा को बचाकर रखते रहे हैं तो इसका अर्थ यह है कि भारत की औसत चेतना किसी भी राजनेता को अब दोबारा राजा बनने का सपना पालने का अवसर नहीं देती। इस सत्य को हमारे टेलिविजन उद्योग के महारथियों को स्वीकार कर लेना चाहिए। यह वही देश है, जिसने डेढ़ हज़ार साल पहले वैशाली के ज़रिए दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया था। बाद के कालखंड में कुछ अधिनायकों, तानाशाहों, सुल्तानों, नवाबों, राजाओं और क्रूर अंगरेज़ों ने इस परंपरा को कुचलने के निरंतर प्रयास किए। सदियों तक ग़ुलामी की ज़ंजीरें भी हमारे लोकतंत्र की आत्मा को कुचल न सकीं।

अगर इस लोकतंत्र की वास्तविक झलक आप देखना चाहते हैं तो भारत के गांवों में चले जाइए। बिहार, उत्तर प्रदेश और दक्षिण में केरल, कर्नाटक के गांवों में बुद्धिजीवियों को निरुत्तर करने वाले अकाट्य तर्क और गरमागरम चर्चाएं देखने को मिल जाएंगी। इन राज्यों का नाम तो मैंने सिर्फ़ उदाहरण के तौर पर लिया है। कमोबेश सारे मुल्क़ में ऐसे ही कहीं खेत की मेड़ पर,चाय की गुमटी पर, पान की दुकानों पर और काम नहीं करने वाले सरकारी दफ्तरों के बाबुओं की लंच चर्चा के दौरान धड़कता हुआ लोकतंत्र आपको मिल जाएगा।

ग्राम पंचायत के प्रधान या सरपंच के चुनाव में हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के जो बीज वर्षों से पड़ रहे हैं, वे इतनी जल्दी मुरझाने वाले नहीं हैं। ज़िंदा लोगों के कब्रिस्तान से सड़ांध मारता मछली बाज़ार कहीं बेहतर है। मजबूरी का महात्मा होने से कहीं बेहतर आज़ादी की गुंडई है। यह सच भारत के लोग समझ चुके हैं। इतनी आसानी से लोकतंत्र का समर्पण करके किसी तानाशाह की झोली में इस देश को नहीं डालेंगे। टेलिविजन चैनल देखना बंद करने की सलाह देने वाले यह भरोसा भारत के मतदाता पर रख सकते हैं। इस मतदाता के त्रिनेत्र पर भरोसा करिए। वह इतना सक्षम है कि राजनेता की आंख में ईमानदारी और दर्प से दमकते चेहरे का अंतर कर सकता है। ज़रूरत पड़ने पर वह अपने एक वोट से तीसरा नेत्र खोलने से हिचकेगा नहीं। जैसे ही कोई लक्ष्मण रेखा लांघेगा, लोकतंत्र के प्रेशर कुकर की सीटी फट जाएगी। इस सोच में किसी को दुबला होने की ज़रूरत नहीं है। अलबत्ता यह देख लीजिए कि टीवी देखना बंद करने जैसे फ़रमानों से भी कहीं तानाशाही की गंध तो नहीं आ रही मिस्टर मीडिया! 

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल

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