राजेश कुमार पासी
पूरा विपक्ष एक अंजान डर से भयभीत है, उसे समझ नहीं आ रहा है कि अगर उसका डर सच साबित हो गया तो उसकी राजनीति का क्या होगा। इस डर को देश ने तब देखा, जब संसद परिसर का एक वीडियो सामने आया। सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे संसद परिसर में अपने साथियों से बात करते नजर आ रहे हैं। वो कहते हैं कि उसको यूपी में न आने दो, वो अगर आया तो वो खत्म हो जाएगा क्योंकि वो नेशनल पार्टी नहीं है लेकिन वो हमें भी खत्म कर देगा। वो असदुद्दीन ओवैसी ओवैसी के बारे में बोल रहे थे। ये बात वो अपने साथियों के साथ कर रहे थे लेकिन कैमरे पर पकड़े गए। सवाल यह है कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी का नेता एआईएमएएम जैसी छोटी सी पार्टी से क्यों डरा हुआ है। सच तो यह है कि यूपी में कांग्रेस के पास भी कुछ बचा नहीं है जिसे ओवैसी खत्म कर देंगे। वास्तव में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के रहमो करम पर जिंदा है। समाजवादी पार्टी भी एक अंजान डर से जूझ रही है। उसे पता है कि कांग्रेस के पास ऐसा कुछ नहीं है कि उससे गठबंधन करने से कुछ फायदा हो। वास्तव में समाजवादी पार्टी को डर है कि अगर कांग्रेस अलग चुनाव लड़ती है तो मुस्लिम वोट बैंक में बिखराव हो सकता है। समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन उसके मुस्लिम-यादव वोट बैंक पर टिका हुआ है. इसमें थोड़ा सा भी परिवर्तन उसके लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने से मुस्लिम वोट बैंक का कुछ हिस्सा उसके खाते में जा सकता है। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी अपने डर से बाहर नहीं निकल पा रही है। इसका बड़ा फायदा कांग्रेस को मिल रहा है। असदुद्दीन ओवैसी ने देश के हर हिस्से में जाकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। जहां भी मुस्लिम समाज चुनाव परिणाम बदलने की हैसियत रखता है, वहां ओवैसी जरूर चुनाव लड़ते हैं। उत्तरप्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर मुस्लिम समाज जीत और हार तय करता है, इसलिए ओवैसी का वहां जाना तय है। इसी बात का डर कांग्रेस अध्यक्ष को सता रहा है।
वास्तव में मुस्लिम समाज धीरे-धीरे सेक्युलर राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों से दूर होता जा रहा है। मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक सोच यह है कि जो भी दल और उम्मीदवार भाजपा को हरा सकता है, उसको वोट दिया जाए। पिछले कुछ समय से जहां भी भाजपा और विपक्ष का मुकाबला होता है, वहां मुस्लिम वोटों में जबरदस्त ध्रुवीकरण देखने को मिलता है। पहले इस ध्रुवीकरण का फायदा विपक्ष को जबरदस्त तरीके से मिलता था और भाजपा को नुकसान होता था। 2014 के बाद भारतीय राजनीति पूरी तरह से बदल गई है। अब मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की प्रतिक्रिया में हिन्दू वोटों का भी ध्रुवीकरण होने लगा है। धीरे-धीरे देश में हिन्दू वोट बैंक तैयार हो गया है और अब इतना ताकतवर हो गया है कि मुस्लिम वोट बैंक बेअसर होता जा रहा है। मुस्लिम समाज देख रहा है कि उसके एकमुश्त वोट देने के बावजूद विपक्षी दल भाजपा को रोक नहीं पा रहे हैं। विपक्षी दलों की बढ़ती चुनावी असफलता से मुस्लिम समाज में निराशा छाती जा रही है।
ऐसा लगता है कि मुस्लिम समाज ने तय कर लिया है कि जब तथाकथित सेक्युलर दल भाजपा को हराने की क्षमता खो चुके हैं तो उन्हें नया नेतृत्व ढूंढना चाहिए। अब ऐसा लगता है कि उन्होंने नए नेतृत्व के लिए मुस्लिम समाज में ही खोज शुरू कर दी है। वर्तमान राजनीति में मुस्लिम समाज के लिए मुस्लिम नेतृत्व की तलाश असदुद्दीन ओवैसी पर जाकर खत्म हो रही है। विपक्षी दल औवेसी की पार्टी को भाजपा की ‘बी टीम’ का तमगा देकर मजाक उड़ाते रहे हैं लेकिन अब उनका विमर्श खत्म होता दिखाई दे रहा है। बिहार और महाराष्ट्र ने दिखा दिया है कि धीरे-धीरे ओवैसी मुस्लिम समाज में अपनी जगह बना रहे हैं। उनकी पार्टी को हैदराबाद तक सीमित बताया जाता था, लेकिन अब वो पूरे देश की पार्टी बनने की ओर चल पड़ी है। बेशक राजनीतिक रूप से यह पार्टी मजबूत दिखाई न दे रही हो लेकिन मुस्लिम वोटों को देखते हुए इसकी ताकत में लगातार इजाफा हो रहा है। इसकी बढ़ती ताकत ने ही विपक्षी दलों में हड़कंप पैदा किया हुआ है।
मुस्लिम वोटों में बिखराव पूरे विपक्ष के लिए चिंता का विषय है। आज़ादी के बाद से ही मुस्लिम वोट बैंक पर कांग्रेस का एकाधिकार रहा है लेकिन 1990 के बाद इस वोट बैंक के कई दावेदार पैदा हो गए। यूपीए के शासन में कांग्रेस का अन्य विपक्षी दलों के साथ गठबंधन था, इसलिए इस वोट बैंक में बिखराव नजर नहीं आ रहा था लेकिन भाजपा की बढ़ती ताकत ने इसे सामने ला दिया है। जहां कांग्रेस के विकल्प के रूप में क्षेत्रीय दल ताकतवर हो गए, वहां मुस्लिमों ने कांग्रेस को छोड़कर उनका साथ देना शुरू कर दिया। अब कांग्रेस को वहीं मुस्लिम वोट मिलते हैं, जहां वो भाजपा के सामने एकमात्र विकल्प होती है। कांग्रेस से मुस्लिम वोट बैंक का छिटकना ही उसको राज्यों की राजनीति से बाहर कर रहा है। बंगाल में टीएमसी, तमिलनाडु में डीएमके, बिहार में राजद, यूपी में सपा के साथ मुस्लिम वोट बैंक चला गया है। बंगाल के अलावा अन्य राज्यों में विपक्षी दलों ने कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाया हुआ है क्योंकि वो समझते हैं कि कांग्रेस का अलग लड़ना उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसका फायदा कांग्रेस को हुआ है क्योंकि उसने इन राज्यों में अपना अस्तित्व बचाया हुआ है।
सच तो यह है कि मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा आज भी कांग्रेस का समर्थक है। समस्या यह है कि सभी विपक्षी दल मिलकर भी भाजपा को सत्ता से बेदखल नहीं कर पा रहे हैं। इससे मुस्लिम समुदाय ने नए नेतृत्व की तलाश शुरू कर दी है। दिक्कत यह है कि कोई भी मुस्लिम आधारित राजनीतिक दल राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद नहीं है। ओवैसी का दल कई राज्यों में मुस्लिम बहुल सीटों पर जोर आजमाइश करता है लेकिन उसे मुस्लिम वोट नहीं मिलता है। अब धीरे-धीरे इसमें बदलाव आ रहा है। बिहार और महाराष्ट्र का यही संदेश है। खड़गे का डर गलत नहीं है लेकिन उनका यह कहना कि वो खत्म हो जाएगा, ये सही नहीं है। ओवैसी लगातार ताकतवर हो रहे हैं क्योंकि मुस्लिमों में उनका समर्थन बढ़ता जा रहा है। मुस्लिम समाज के किसी भी मुद्दे पर उनका बयान सबसे पहले आता है। बेशक उनकी पार्टी बहुत छोटी हो लेकिन मुस्लिम मुद्दों पर मीडिया उनके बयानों को बहुत महत्व देता है। मुस्लिम मुद्दों पर जितनी मुखरता से ओवैसी अपनी बात रखते हैं, उतनी मुखरता अन्य विपक्षी दलों में दिखाई नहीं देती ।
सवाल यह है कि मुस्लिम समाज की नेतृत्व की तलाश क्या ओवैसी जैसे नेताओं पर जाकर समाप्त होगी । अगर ऐसा होगा, तो ये देश के लिए अच्छा नहीं होगा। ओवैसी भीम-मीम की राजनीति करके ताकतवर बनना चाहते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि केवल मुस्लिम वोटों के सहारे वो ज्यादा आगे नहीं जा सकते। वर्तमान राजनीति में कहीं से नहीं लगता कि ओवैसी की भीम-मीम वाली राजनीति सफल हो सकती है। विपक्षी दलों को मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति से आगे बढ़कर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व देने पर विचार करना होगा। दशकों से मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करते आ रहे विपक्षी दल बड़ा मुस्लिम नेता नहीं पैदा कर पाए हैं। समाजवादी पार्टी के रवैये को लेकर अफजाल अंसारी का बयान महत्वपूर्ण है कि यादवों को कुर्बानी देनी होगी। उनके कहने का तात्पर्य यह है कि समाजवादी पार्टी को मुस्लिमों को सत्ता में उचित भागीदारी देनी होगी।
समस्या यही है कि जिन दलों को मुस्लिम वोट मिलता है, वो सत्ता पाने के बाद उनका ध्यान नहीं रखते हैं। वास्तव में ये राजनीतिक दल उन्हें सत्ता में समुचित भागीदारी नहीं देते हैं। इसके कारण मुस्लिम समुदाय में असंतोष बढ़ता जा रहा है। न तो विपक्षी दल भाजपा को रोक पा रहे हैं और न ही मुस्लिमों की राजनीतिक भागीदारी तय कर पा रहे हैं। विपक्षी दलों की यही असफलता मुस्लिमों को नए नेतृत्व की तलाश के लिए मजबूर कर रही है। डर यही है कि कहीं ये तलाश कट्टरपंथियों पर जाकर न रुक जाए। विपक्षी दलों को विचार करना होगा कि मुस्लिम समाज को कैसे संतुष्ट किया जा सकता है। भाजपा का डर दिखाकर की जाने वाली राजनीति के दिन खत्म होने वाले हैं। भाजपा की बढ़ती ताकत ने दिखा दिया है कि विपक्षी दल उसको रोकने में सक्षम नहीं हैं। जब देश की जनता ही विपक्ष से निराश हो रही है तो मुस्लिम समुदाय की निराशा कुछ अलग नहीं है।
राजेश कुमार पासी