ज्ञान चंद पाटनी
दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश की तीन युवतियों के साथ हुई नस्लीय दुर्व्यवहार की घटना ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया है। एसी लगवाने के दौरान ड्रिलिंग से निकला मलबा पड़ोसियों के एसी कंप्रेसर पर गिरा और इसी छोटी सी बात ने नस्लीय घृणा का रूप ले लिया। “मोमो”, “मसाज पार्लर वाली”, “चाइनीज” जैसे अपमानजनक शब्दों ने न केवल इन लड़कियों को ठेस पहुंचाई बल्कि पूर्वोत्तर भारत के लाखों लोगों की पीड़ा को फिर से उजागर कर दिया। एक लड़की दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा है, दूसरी ओटीटी टेकनीशियन, तीसरी सिविल सेवा की तैयारी कर रही है. ये सभी सात महीने से किराए के फ्लैट में रह रही थीं। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। यह घटना महानगरों में पूर्वोत्तर के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव की कड़वी सच्चाई को सामने लाती है।
पूर्वोत्तर के निवासी शिक्षा, नौकरी और बेहतर अवसरों के लिए दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों में आते हैं लेकिन यहां उन्हें अक्सर “पराया” महसूस होता है। उनकी आंखों की बनावट, छोटे कद, अलग खान-पान या बोली को आधार बनाकर उनको अपमानित किया जाता है। कोविड के दौरान भी उनके साथ भेदभाव नजर आया था। घर खोजने में दिक्कत, ऊंचा किराया —ये रोजमर्रा की कहानियां हैं। मेट्रो में “चाइनीज” कहकर बुलाना, सड़कों पर जानबूझकर अपशब्द बोलने जैसी शिकायतें आम हैं। यह इक्का-दुक्का नहीं, समाज में गहरी जड़ें जमा चुका नस्लवाद है।
यह पहली घटना नहीं है। नस्लीय दुर्व्यवहार ही नहीं, हिंसा के मामले भी सामने आते रहते हैं। 2014 में अरुणाचल के निडो तानिया को नस्लीय टिप्पणी का विरोध करने पर पीट-पीटकर मार दिया गया। 2012 में रिचर्ड लोइताम और 2014 में शालोनी जैसे युवाओं की संदिग्ध मौतें हुईं। बेंगलुरु में 2023 में पूर्वोत्तर के छात्रों पर हमले, पुणे में हिंसा के मामले भी सभी को याद हैं। उत्तराखंड के देहरादून शहर में त्रिपुरा के दो भाइयों पर हमले की घटना भी ज्यादा पुरानी नहीं है जिसमें घायल होने के बाद एक ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था।
सुप्रीम कोर्ट तक सांस्कृतिक भिन्नताओं के नाम पर भेदभाव की निंदा कर चुका है। बेजबरुआ समिति का गठन हुआ लेकिन जमीनी बदलाव कम ही दिखा। पढ़े-लिखे लोग भी अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं जो सबसे दुखद है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव और हिंसा से जुड़े मामलों पर गंभीरता दिखाते हुए गृह मंत्रालय द्वारा गठित निगरानी समिति को निर्देश दिया कि वह कम से कम हर तीन महीने में एक बार बैठक करे। अदालत ने यह भी कहा कि समिति किसी भी समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान ले और आवश्यकता होने पर तुरंत बैठक बुलाकर सुधारात्मक कदम उठाए।
इस नस्लवाद की जड़ें सांस्कृतिक अज्ञानता में हैं। मुख्यधारा का मीडिया पूर्वोत्तर को कम कवर करता है। उनके त्योहार, परंपराएं, इतिहास के बारे में देश के दूसरे क्षेत्रों के लोगों को ज्यादा जानकारी नही है। नक्शे में पूर्वोत्तर भले ही छोटा सा नजर आए, लेकिन यह जैव विविधता, संस्कृतियों का खजाना है। “एकता में अनेकता भारत की विशेषता” का नारा दिया जाता है लेकिन नस्लीय भेदभाव की घटनाओं से साफ है कि जमीनी स्तर पर पूर्वाग्रह बरकरार है। ताजा घटनाक्रम से दिल्ली में रह रही तीनों युवतियां डर गईं, परिवार वाले उनको वापस बुला रहे हैं। यह पूरा घटनाक्रम व्यक्तिगत आघात तो है ही राष्ट्र की एकता पर भी चोट है।
नस्लवाद पर अंकुश के लिए बहुआयामी प्रयास जरूरी हैं। सबसे पहले कानूनी सख्ती जरूरी है। ऐसे मामले में एफआईआर तुरंत दर्ज हो, गिरफ्तारी हो, फास्ट ट्रैक ट्रायल हो। इस तरह के मामलों में तेजी से सजा होगी, तो समाज में सही संदेश जाएगा। स्कूल पाठ्यक्रम में पूर्वोत्तर के इतिहास, संस्कृति को शामिल किया जाना चाहिए। बड़े शहरों में पूर्वोत्तर फूड फेस्टिवल, सांस्कृतिक मेले आयोजित किए जाएं। विश्वविद्यालयों में पूर्वोत्तर स्टडीज सेंटर बनाएं। सामुदायिक जागरूकता के कैंपेन चलाए जाएं। कॉरपोरेट्स, हाउसिंग सोसायटीज में संवेदनशीलता वर्कशॉप अनिवार्य करें। पुलिस नस्लीय भेदभाव की शिकायतों को गंभीरता से ले।
मीडिया भी अपनी जिम्मेदारी समझे। पूर्वोत्तर को मुख्यधारा में लाए। इन राज्यों की संस्कृति को हाइलाइट करे। सिनेमा, ओटीटी पर भी ऐसी फिल्में बनें। बेजबरुआ समिति की सिफारिशों को ठीक तरीके से लागू किया जाए। पूर्वोत्तर के लोगों के लिए हेल्पलाइन शुरू हो और काउंसलर नियुक्त करें। दिल्ली जैसे शहरों में पूर्वोत्तर एसोसिएशन को मजबूत किया जाए। पूर्वोत्तर के लोगों की भी जिम्मेदारी है कि सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग हो तो तुरंत रिपोर्ट करें, पड़ोसियों से बातचीत शुरू करें। अलग—थलग नहीं रहें। पूर्वोत्तर के लोग खुद सोशल मीडिया पर अपनी कहानियां शेयर करें।
दिल्ली में नस्लीय भेदभाव का मामला सामने आने के बाद केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिल्ली पुलिस से बात की और भेदभाव के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता की नीति दोहराई। सिक्किम सीएम प्रेम सिंह तमांग, अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू, मणिपुर के पूर्व सीएम एन. बीरेन सिंह ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की और सख्त कार्रवाई की मांग की लेकिन यह पर्याप्त नहीं। पूर्वोत्तर पर चीन अपनी आंख लगाए हुए है। ऐसे समय में एकजुटता की जरूरत है। निश्चय ही समूचा पूर्वोत्तर भारत का अंग है। अगर कोई अरुणाचली युवती दिल्ली में असुरक्षित महसूस करे, तो राष्ट्र की एकता मजबूत कैसे हो सकती है। नस्लवाद अपराध है। शिक्षा, कानून और सांस्कृतिक मेलमिलाप के माध्यम से इस मानसिकता को खत्म किया जा सकता है।
ज्ञान चंद पाटनी