सब भाषाओँ की श्रोमणि है ,
मेरी प्यारी ब्रज भाषा ।
इस की कोई नहीं बानी है ,
आज तक भी परिभाषा ।।
सब भाषाओँ की श्रोमणि है
प्रेम से लट पटी अटपटी है,
जन जन को लगती है प्यारी।।
ऐसा इसका आकर्षण है,
कितनी सरल कितनी मधुर।
कितनी सीधी और साधा,
सब भाषाओँ की श्रोमणि है
पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर के ,
मन को इसने ललचाया था।
इसी लिए वह ले अवतार,
ब्रज धरा पर आया था।।
ब्रज भाषा से मोहित हो कर ,
मोहन संग नाची राधा।।
सब भाषाओँ की श्रोमणि है
इसी भाषा में कन्हैया ने भी,
तोतली भाषा में बोला ।
ग्वाल ग्वालों संग मिल कर के ,
माखन चोरी खेल खेला।
लगा आरोप चोरी का तो,
मैया से ऐसे बोलै,
इन सब प्यारी लीलाओं को ,
दर्शाती है ब्रज भाषा।।
सब भाषाओँ की श्रोमणि है
मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो,
ग्वाल बाल सब बैर पड़े हैं।
वर्वश मुख लिपटायो,
सूरदास ने ब्रजभाषा लिख ,
भक्ति शिरोमणि कवि पद पायो।।
समस्त ब्रह्माण्ड में प्रेमरस धारा,
बरसाती है ब्रज भाषा ||
सब भाषाओँ की श्रोमणि है
ब्रज भाषा ने श्री कृष्णा से,
अध्भुत प्रेम का पाठ पढ़ाया।
आत्म प्रेम और देह प्रेम,
दोनों में ही है भेद बताया।
महा रास के माध्यम से।
ऐसा वह करके दिखलाया।।
हार गया था काम देव भी,
नहीं पूर्ण हुई उसकी अभिलाषा
नन्दो भैया के दिल को भी।,
हर्षाति है ब्रज भाषा
सब भाषाओँ की श्रोमणि है
मेरी प्यारी ब्रज भाषा