वो लीगल लैंग्वेज के पेपर वाले दिन की झपकी

विवेक कुमार पाठक

चाहत होने पर भी मैं न्यायालयीन सिस्टम में नहीं हूं इसका जबाव मुझे मिल गया है। मेरी नींद की झपकी ने दिया है जबाब। साल 2001 था। महीना जुलाई अगस्त का। जो किशोर मन 16 में आईएएस का सपना देखता था वो अब जवान हो गया था। जवानी विकास की अवस्था है मगर दिखी नहीं। 21 साल तक पहुंचते पहुंचते अपन भी डबल माइंड हो गए।

आईएएस या पीएससी। पहले कलेक्टर या डिप्टी कलेक्टर। आत्मा ने कहा कलेक्टर बस कुछ नहीं। पैदायशी आरामतलब मन आ गया बैरिस्टर बनकर। तपाक से शुरु कर दी अपनी कलाकारी। पहले पीएससी की तैयारी कर। डिप्टी कलेक्टर बनकर फिर बन कलेक्टर। पहले छोटी को पकड़ फिर आगे बढ़। मदमस्त मन ने आत्मा को दबा दिया। अपन लग गए” सरल वाली एमपीपीएससी” की तैयारी में। दो साल तक आधी सीधी तैयारी। बिना अनुशासन वाली तैयारी। समय गुजरा मगर रिजल्ट सामने आया नहीं। बीच में घर परिवार में भी फिल्मों की तरह परेशानियां आती रहीं।

फिल्मों में हीरो सबका बट्टा लगा देता है अपनी लाइफ में अपना बट्टा लगता रहा।

किसने बट्टा लगाया। सबसे पहले खुद ने। अंग्रेजों का डिसीप्लीन नहीं सीख सके लाइफ में। अब सीखने की तमन्ना भी नहीं है। आगे के साल अनुभव से निकाल लेंगे। खैर बात अपनी अधूरी डिप्टी कलेक्टरी की। डिप्टी कलेक्टरी की परीक्षा भी बिना योजना अनुशासन और टाइम बाउंड तैयारी के नहीं निकलेगी। बात बहुत सीधी है मगर मुझ गधे को बेअसर शंखपुष्पी की कृपा से सालों तक समझ नहीं आई।

अपन ने भी 2005 में नेताओं जैसा पलटा मार दिया। नहीं करनी कलेक्टरी। नहीं बनना छोटा डीएम। सिलेक्शन का क्या भरोसा है लाखों की भीड़ में। जिंदगी में सैटल भी तो होना है। साथ में पढ़ी मोड़ियों की उमर भी तो ध्यान में थी। अपने सदा वत्सल पिता तो सिधार गए उनके बाप तो जिंदगी का टाइम टेबिल लेकर बैठे हैं। वे तो 50 की उमर में चार मंजिला मकान तान गए थे मोड़ी को तो 25 से पहले विदा कर ही देंगे।

अपन ने भी अब परीक्षा से पहले बनने वाला टाइम टेबल बनाया। 2005 में एलएलबी शुरु करेंगे। 2008 आते ही मजिस्ट्रेट बनकर निकलेंगे। मोड़ी के बाप के सामने उसका भी काॅन्फीडेंस फैल कर देंगे। आखिर मजिस्ट्रेट भी कोई चीज होती है पीली बत्ती जब जलेगी तो सारा ” बापपन” नीचे आ जाएगा अपने ‘संभावित ससुरों’ का। लग गए अपन फिर जोश में एलएलबी करने।

साल 2005 में पहला सेमिस्टर यूं निकाल दिया था चलते फिरते। काॅन्फीडेंस ऐसा हो गया था जैसे हाइवे की सड़क देखकर गांव के मोड़न का हो जाता है। बिना हेलमेट के ऐसी गाड़ी तानते हैं कि हवाई जहाज पीछे छूट जाएं। आगे भले ही बाइक उचटकर खोपड़ा फूट जाएं। 2005 में एलएलबी चली दम से। घर में हुए विस्तार ने रोजगार की ललक जगाई।

ठान लिया एकदम। किसी ने नहीं दबंेगे। पढ़ाई भी चलेगी और रोजगार भी चलेगा। करके दिखा देंगे सब कुछ। नौकरी के लिए कुछ रास्ते लोगों ने दिखाए कुछ अपन को दिखने लगे। बीच बीच में टीवी पर एड आते हैं फिल्म के बीच। जिंदगी में ऐसे मध्यान्तर तीज त्यौहार लाते हैं। रक्षाबंधन आते ही मजिस्ट्रेट वाली मन की फिल्म स्लो होती गई।

नई दुनिया में काम मिल गया था। फीचर डेस्क पर संपादकीय जीवन के प्रथम संपादक प्रवीण शर्मा जी ने मौका दिया। जयेन्द्रगंज में टेम्परेरी रोजगार चलने लगा उधर एलएलबी की पढ़ाई का फयूल रिजर्व में लगने लगा। गाड़ी नई थी मगर दूसरे सेमिस्टर में इंजन आॅइल खत्म सा हो रहा था। रक्षाबंधन निबटा उधर झपाक से एलएलबी के एमएलबी में पेपर शुरु हो गए। पहला पेपर भागदौड़ में दे डाला। गजब गया। दूसरा लीगल लैंग्वेज का था।

कम लिखना था सो अपन ने भी पढ़ाई को ये मामला आराम का है बना रखा था। 3 बजे से पेपर होते थे और अपन 1 बजे तक ट्वैन्टी के निशान लगे प्रश्न निबटा डालते थे। ग्रोवर से “आईएमपी क्वैश्न” की सुविधा का तब तक पता नहीं चला था और परम दुर्भाग्य के चलते आदरणीय राधेश्याम शर्मा सर की “ज्यूडीशरी एकेडमी” तक नहीं पहुंचे थे। पहुंच जाते मां कसम कहीं न कहीं के ‘श्रीमान’ तो हम भी उनके “ज्ञान के ढकेले” से बन ही जाते।

खैर बात उस दिन पेपर की। अंतिम टाइम की रामबाण पढ़ाई के बाद पेपर के लिए बचते थे 1 घंटा 55 मिनिट। मैंने तब 5 मिनिट का वक्त ही तय कर रखा था एमएलबी तक पहुंचने में। इधर उधर से कूंदने फांदने की कला इस दौरान खूब सीखी है। ललितपुर काॅलोनी कीे तरफ से एमएलबी के टूटे टाटे दीवार दरवाजे अपने लिए सुविधाजनक थे।

आज जैसे पीएम, सीएम, मंत्रियों को महाकाल, पीताम्बरा में नाॅन स्टाॅप प्रवेश करते हुए लगता होगा ठीक वैसा ही वीआईपीनुमा अनुभव मोहल्ले से सीधे धड़ाक काॅलेज में पहंुचने पर मुझे होता था। फिर भटक गए। याद आया पेपर का टाइम आ रहा था। खाना खाकर सबको झकास नींद आती है अपन भी सवा बजे तक भोजन पानी करके बिस्तर पर खिसक लिए। दिन के पेपर में नींद का अहसास काॅलेज के हर युवा को खूब होता है। अपन भी चले गए ख्यालों में।

पहले दिमाग में लीगल लैंग्वेज चली फिर दिमाग का वीसीआर सो गया। झपकी में साढे़ तीन कब बज गए यह इस नश्वर शरीर की इंद्रियों ने अहसास ही नहीं कराया। घड़ी देखी, माथा ठनका अपनी उड़नचाल की बदौलत अपन 5 मिनिट में एमएलबी में थे। एहसास एकदम डीडीएलजे में लास्ट में ट्रेन के पीछे भागती सिमरन सा हो रहा था।

चमकादड़ों की बदबुओं वाली पुरानी बिल्डिंग के एक अंधेरे कक्ष में भागते हुए पहुंचे। वहां रामसे ब्रदर्स की हवेली टाइम बिल्डिंग जैसे हाॅल में लड़के लड़कियां फुर्सत से पेपर दे रहे थे। पेपर में भी कम लिखना था और बच्चों को भी शायद लिखना कम ही आ रहा था। मैंने इंचार्ज एचओडी आदरणीय एन के चैहान साहब से निवेदन किया। सर आई एम सौरी, लेट हो गया प्लीज एंट्री करा दीजिए।

उस वक्त आदरणीय चैहान सर को अपनी जिंदगी भर में जमा की गई ईमानदार सोच को दिखाने का जैसा खुला आॅफर मिल गया था। चैहान सर का भन्नाया चेहरा मुझे आज तक याद है। ये पेपर में आने का टाइम है। क्या परीक्षा को मजाक समझ रखा है। आप जाइए , कल पेपर देना। मैंने उन्हें समझाने के तमाम उपाय किए मगर वे तो जैसे अंगद बन गए थे। परीक्षा कक्ष में प्रवेश न करने देने की बात पर उन्होंने वज्र सा पैर जमा दिया था।

कुछ मिनिट के निरंतर विनम्र निवेदन के बाद अपना माथा अंदर तक उखड़ गया। मन में एक दफा आया कि मलबा का पूरा चिट्ठा तो भरी क्लाॅस में खोलकर रख ही दें कि कैसे कैसे “टेसू- झैंझी” मलबा से एलएलबी की डिग्री लेकर कुंदन बने फिर रहे हैं। गाइडें, वेयर एक्ट से लेकर घर से लिखा भेजने की सुविधा भी मिली है परम प्रिय बुलेटछाप छात्रों और उनके पूरे कुनबे खानदान को।

अपन लाॅ काॅलेज में नैतिक लाॅ का जबर्दस्त लेक्चर पिलाने ही वाले थे मगर कुछ सोचकर रह गए। चूंकि अपन भी सफलता से पहले सम्मान के उपासक रहे हैं सो तुरंत तय कर लिया कि अब आगे नहीं देना अपन को पेपर। ज्यादा क्या होगा बैक आएगा देख लेंगे। आगे भरे कक्ष में तमाम डाॅयलाॅग सुने मगर दिमाग को जाम कर दिया औरं एलएलबी दूसरे सेमिस्टर का लीगल लैैंग्वेज पेपर वहीं छोड़ दिया।

मेरा फुलटाइम पत्रकारिता जीवन इसी घटना के बाद शुरु हुआ था। तब उस समय आई वो झपकी वो मजिस्ट्रेट का अधूरा सपना आंखों में तैरते ही याद आने लगती है। उस झपकी में जिंदगी की बहुत सी असफलताओं का कारण अपने आप समझाने की शक्ति है।

अद्भुत रही 2005 में वो लीगल लैंग्वेज के पेपर वाली झपकी।

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