डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र
कामायनी के श्रद्धा सर्ग में जयशंकर प्रसाद ने नारी की चेतना को इंगित करते हुए लिखा है “नारी, तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-नग-पग तल में,पीयूष-स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।” अर्थात् नारी केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक है, जो अपने स्नेह, करुणा और संवेदनशीलता से जीवन को सुन्दर और सन्तुलित बनाती है। भारतीय समाज में नारी सदैव आदरणीय रही है किन्तु यह भी एक कटु सत्य है कि इन आदर्शों के बावजूद वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक जीवन में उसकी भागीदारी लम्बे समय तक सीमित रही है। यही विरोधाभास भारतीय लोकतन्त्र में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहाँ एक ओर संविधान ने समानता का अधिकार प्रदान किया, वहीं दूसरी ओर संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत बहुत कम बना रहा जबकि दुनिया के कई देशों जैसे बांग्लादेश (14%), पाकिस्तान (17%) औरनेपाल (33%) में महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण है। इसी तरहरवांडा (30%), तंज़ानियाऔरयुगांडामें भी विशेष आरक्षण अथवा कोटा व्यवस्था लागू है। ऐसे परिप्रेक्ष्य में महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 (नारी शक्ति वन्दन अधिनियम)इस ऐतिहासिक असन्तुलन को दूर करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण और बहुप्रतीक्षित पहल के रूप में सामने आया। 28 सितम्बर 2023 को कानून बनने के बाद मध्य प्रदेश,राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम विधानसभाओं के चुनाव हो चुके हैं फिर भी यह अपनी मूर्तता की बाट जोह रहा है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए सरकार 16–18 अप्रैल के मध्य संसद का विशेष सत्र बुला रही है, लेकिन सवाल यह है कि अब तक सरकार ने इस सन्दर्भ में प्रयास क्यों नही किया, सरकार की अग्रिम योजना क्या है और इस कानून के लागू हो जाने के बाद क्या बदलाव होगा, ये ऐसे गूढ़ प्रश्न हैं जिन्हे संवैधानिक और व्यावहारिक पहलुओं के आलोक में समझा जा सकता है।
यदि हम इस प्रश्न की जड़ों में जाएँ, तो असमान प्रतिनिधित्व की समस्या नई नहीं है।संविधान सभा, जिसने स्वतन्त्र भारत के लोकतान्त्रिक ढाँचे की रचना की, उसमें भी महिलाओं की भागीदारी अत्यन्त सीमित थी,कुल सदस्यों में मात्र4–5 प्रतिशत (लगभग 15 महिलाएँ)। यह आँकड़ा दर्शाता है कि प्रारम्भिक स्तर पर ही महिलाओं की राजनीतिक उपस्थिति कम थी। इसके बावजूद, संविधान निर्माताओं ने समानता के आदर्शों को अत्यन्त महत्त्व दिया।अनुच्छेद 14विधि के समक्ष समानता औरअनुच्छेद 15लिंग के आधार पर भेदभाव के निषेध की बात करता है बावजूद इसके अनुच्छेद 15(3) में राज्य को महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति प्रदान की गई। स्पष्ट है कि संवैधानिक स्तर पर महिलाओं के सशक्तिकरण की नींव मजबूत रखी गई थी लेकिन व्यवहारिक राजनीति में यह समानता परिलक्षित नहीं हो सकी।
इस दिशा में पहला वास्तविक और प्रभावी हस्तक्षेप 1992–93 के 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से हुआ। इन संशोधनों ने पंचायतों और नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा देते हुए महिलाओं के लिए कम से कम 33% आरक्षण सुनिश्चित किया। कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया(बिहार सबसे पहला राज्य है जिसने पंचायतों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को बढ़ाकर50% किया, इसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों ने भी स्थानीय निकायों में 50% महिला आरक्षण लागू किया)। इस प्रयोग ने न केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाया बल्कि यह भी सिद्ध किया कि महिला नेतृत्व शासन को अधिक संवेदनशील, समावेशी और जनकल्याणकारी बना सकता है। यह अनुभव इस बात का ठोस प्रमाण था कि यदि अवसर मिले, तो महिलाएँ प्रभावी राजनीतिक भूमिका निभा सकती हैं।
इसके बावजूद, संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण की राह आसान नहीं रही। 1990 के दशक से लेकर 2010 तक यह विधेयक बार-बार संसद में पेश किया गया1996, 1998, 1999, 2003 और 2008लेकिन हर बार यह राजनीतिक असहमति के कारण अटक गया। 2010 में राज्यसभा से पारित होने के बावजूद यह लोकसभा में पारित नहीं हो सका। इस विफलता के पीछे कई कारण थेसबसे प्रमुखOBC महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा की मांग, पुरुष सांसदों का विरोध, और राजनीतिक दलों के बीच सहमति का अभाव। यह स्पष्ट करता है कि महिला प्रतिनिधित्व का प्रश्न केवल सामाजिक न्याय का नहीं, बल्कि सत्ता-साझेदारी का भी प्रश्न है।
संवैधानिक व्यवस्था में पहले से ही प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के कुछ प्रावधान मौजूद हैं।अनुच्छेद 330 और 332 क्रमशः लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण सुनिश्चित करते हैं, जबकिअनुच्छेद 334इन आरक्षणों की समय-सीमा निर्धारित करता है। महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 (106 वां संशोधन) ने इसी ढाँचे को आगे बढ़ाते हुए संविधान मेंअनुच्छेद 330A, 332A और 334A जोड़कर महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया है, हालाँकि, इस अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता और साथ ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसका क्रियान्वयन तन्त्र है। अधिनियम के अनुसार, यह आरक्षणजनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लागू होगा। इस प्रकार एक ओर जहाँ यह ऐतिहासिक कदम है, वहीं दूसरी ओर इसे लागू करने में अनावश्यक विलम्ब किया जा रहा है जिससे इसका प्रभाव कमजोर होने की सम्भावना है।
अब सवाल यह है कि अब तक सरकार इसे लागू क्यों नहीं कर पायी है? इसके पीछे कारण है कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया लम्बित रही, जिससे क्रियान्वयन टलता गया; अब संशोधन के माध्यम से इसे 2029 से पहले लागू करने की तैयारी है। इसी कारण विशेष सत्र आहूत हो रहा है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के शीघ्र क्रियान्वयन के लिए इसमें संशोधन करने की योजना बनाई जा रही है ताकि इसे लम्बित जनगणना से अलग कर समय से लागू किया जा सके। प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ा कर 816करने और उनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षितकरने का विचार है। यह आरक्षण वर्टिकल मॉडल पर आधारित होगा, जिसमें SC और ST श्रेणियों के भीतर भी महिलाओं को उप-आरक्षण मिलेगा। परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर करने का प्रस्ताव है। इसके लिए सरकार एक व्यापक विधायी पैकेज तैयार कर रही है, जिसमें संविधान संशोधन, परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्रशासित प्रदेशों में आरक्षण लागू करने से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इन संशोधनों का उद्देश्य सीटों में वृद्धि कर महिलाओं के लिए स्थान सुनिश्चित करना है। वर्तमान व्यवस्था में देरी के कारण यह 2034 तक टल सकता था, जिसे सरकार अब 2029 तक लागू करना चाहती है।
सरकार के अपने जो भी तर्क हों लेकिन उन पर राजनीति करने का आरोप लग सकता है, क्योंकि यदि परिसीमन 2011 के आंकड़ों पर आधारित होता है, तो वर्तमान जनसंख्या संरचना को पर्याप्त रूप से प्रतिबिम्बित नहीं किया जा सकेगा जिससे प्रतिनिधित्व में असन्तुलन उत्पन्न हो सकता है। विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के सापेक्ष प्रतिनिधित्व में कमी की आशंका है जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों का प्रभाव बढ़ सकता है।
सारतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 के शीघ्र क्रियान्वयन के लिए संशोधन, सीट वृद्धि और 2011 आधारित परिसीमन जैसे कदम उठाकर प्रक्रिया को तेज करने का जो प्रयास है, वह राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत है, किन्तु इसके साथ प्रतिनिधित्व के सन्तुलन और व्यापक सहमति की चुनौती भी जुड़ी हुई है। इस पहल को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है कि प्रस्तावित संशोधनों को पारदर्शी तरीके से लागू किया जाए, परिसीमन में क्षेत्रीय सन्तुलन का ध्यान रखा जाए, सभी दलों को साथ लेकर सहमति बनाई जाए तथा क्रियान्वयन की स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की जाए ताकि 2029 तक महिला आरक्षण वास्तविक रूप में लागू हो सके।
डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र