राष्ट्र-ऋषि नानाजी

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

नानाजी देशमुख का नाम याद आते ही मेरे अंदर उस दिव्य पुरूष का चित्र उपस्थित हो जाता है जब काशी विद्यापीठ में अध्ययन के दौरान ही देश और समाज के प्रति पीड़ा ने मुझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक बनने हेतु प्रेरित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति झुकाव को देखकर मेरे गुरुदेव प्रो. राजेन्द्र प्रसाद जायसवाल ने कहा – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं वरिष्ठ राजनीतिज्ञ नानाजी देशमुख ने चित्रकूट के 500 गांवों का कायाकल्प कर दिया है। राष्ट्रभक्तों का बहुत बड़ा वर्ग उनके साथ जुड़ा हुआ है। मैं माननीय शंकर प्रसाद जायसवाल(संसद सदस्य) से एक पत्र लिखवा देता हूं और तुम चित्रकुट में जाकर अध्ययन करो। उन्होंने एक ग्रामोदय विश्वविद्यालय भी खोला है जो एक अनोखा विश्वविद्यालय है। श्री नानाजी देशमुख ने राजनीति से संन्यास ले लिया है। पर वे संघ-भाजपा के चाणक्य हैं। ग्रामीण पुनर्रचना को समर्पित यह विश्वविद्यालय शून्य बेरोजगारी, शून्य प्रदूषण तथा विवाद रहित ग्रामों के स्वप्न को साकार कर रहा है। अनेक युवा दंपति राष्ट्र निर्माण के इस पुनीत कार्य में लगे हुए हैं।

राष्ट्र-ऋषि नानाजी पर प्रकाशित इस पुस्तक का पुरोकथन भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे अब्दुल कलाम ने लिखा है। पुरोकथन में माननीय कलाम ने लिखा है कि नानाजी देशमुख ने दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवदर्शन’ को लागू करने का प्रयास किया है। यह संस्थान भारतीय परिप्रेक्ष्य में समग्र विकास का सफल मॉडल बनाने वाली अनूठी संस्था है। इन विकासकारी गतिविधियों के अलावा नानाजी और उनकी टीम ने इस क्षेत्र में ग्रामों को आत्मनिर्भर बनाने में भी सफलता पायी है। ग्रामीण अंचलों को पूर्णत: स्वावलंबी बनाने की उन्होंने एक अनुपम कार्यप्रणाली विकसित की है। इसके द्वारा उन्होंने न केवल 100 ग्रामों के आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित किया अपितु सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का सफल निदान ढूंढने में सफलता पायी है। ग्रामीण जीवन की एक जटिल समस्या मुकदमेंबाजी से ग्रामीणों की पूर्णत: मुक्ति के साथ, विशेषकर महिलाओं के सशक्तीकरण के साथ-साथ जन-जन के जीवन में मूल्य-आधारित बदलाव आया है।

कुल आठ अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक के प्रथम अध्याय-प्राक्थन को दीनदयाल शोध संस्थान के प्रख्यात इतिहासकार तथा पत्रकार माननीय देवेन्द्र स्वरूप, डॉ. महेशचंद्र शर्मा तथा श्री अतुल जैन ने लिखी है। दूसरे अध्याय, में नानाजी के जीवन-स्तर के संबंध में देवेन्द्र जी कलम चलाई है। वे नानाजी देशमुख के अनन्य सहयोगी, दीनदयाल शोध संस्थान के उपाध्यक्ष तथा ‘मंथन’ हिंदी के संपादक भी रह चुके हैं। भला देवेन्द्र स्वरूप जी से ज्यादा नानाजी के बारे में कौन लिख सकता है, द्वितीय अध्याय में नानाजी के अंतिम यात्रा का सजीव लेखन किया गया है। दधीचि देहदान समिति के द्वारा भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को किस प्रकार नानाजी ने देहदान का संकल्प पत्र दिया। चौथे अध्याय में नानाजी को दिए श्रध्दांजलि का सजीव चित्रण किया गया है। सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने लिखा है कि स्वर्गीय नानाजी देशमुख के जाने से भारत के सार्वजनिक जीवन के तपस्वी कर्मयोगी, राजनीति में रहकर भी जल में कमलपत्रवत पवित्र रहने वाले एक निष्ठावान स्वयंसेवक के प्रेरणादायी जीवन का अंत हुआ है। परंतु यह जीवन समूचे देश की नयी पीढ़ी को सतत देशभक्ति, समर्पण व सेवा की प्रेरणा देता रहेगा।

पांचवे अध्याय में ‘नए अवतार में नानाजी’ नामक अध्याय में यह बताया गया है कि किस प्रकार नानाजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ तथा आपातकाल में अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए ग’ामीण विकास को समर्पित दीनदयाल शोध संस्थान को खड़ा करने का संकल्प लिया। उन्हें भारतीय राजनीति से घोर निराशा हुई।

छठवें अध्याय में नानाजी के उस भाग का जिक्र’ हुआ है जब चारों ओर निराशा, भ्रष्टाचार, छल-छद्म तथा हिंसा का वातावरण बन चुका हो तो एक राष्ट्र-ऋषि अपने अनुभव के आधार पर युवाओं से आह्वान करता है कि युवाओं! तुम्हारे भीतर अनंत ऊर्जा का अक्षय भंडार है। तुम जागो! भारत माता पुकार रही है। महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज्य, लोहिया की सप्तक्रांतियां तथा जेपी के संपूर्णक्रांति का क्या हस्र हुआ। अब हमें एक नए संकल्प के साथ भारतीय गांवों के पुनर्निर्माण के स्वप्न को साकार करना होगा। इस कार्य में युवा पीढ़ी की प्रमुख भूमिका होगी।

सातवें अध्याय में नानाजी पर लिखे गए लेखों को स्थान दिया गया है। इसमें प्रख्यात पत्रकार एवं जनसत्ता के संपादक स्वर्गीय प्रभाष जोशी का लेख ‘ऐसे जीवट पर तिलक करो’ तथा वरिष्ठ पत्रकार एवं हिन्दी पाक्षिक ‘प्रथम प्रवक्ता’ के पूर्व संपादक राम बहादुर राय का लेख ‘संघ विचारधारा के विनोबा थे नानाजी’ पढ़ने योग्य है।

आठवें अध्याय में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नानाजी पर संपादकीय टिप्पणी का संकलन हैं क्योंकि नानाजी मात्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक तथा भारतीय जनसंघ के महामंत्री ही नहीं थे वे भारतीय राजनीति के भविष्यद्रष्टा भी थे। उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भाजपा-कांग्रेस को मिलकर एक साथ कार्य करने को कहा था। क्योंकि उनके लिए दल सर्वोपरि न होकर राष्ट्र सर्वोपरि था।

यह पुस्तक पठनीय के साथ संग्रहणीय भी है। यह इसलिए नहीं कि नानाजी देशमुख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक तथा भारतीय जनसंघ के वरिष्ठ नेता थे। यह इसलिए जरूरी है कि नानाजी ने गरीबी तथा इंटर तक की पढ़ाई करके जो कार्य एवं उदाहरण देश के समक्ष रखा। वह देश के युवा पीढ़ी के लिए मॉडल हो सकता है। कबीर के शब्दों में ‘ज्यों का त्यों धर दीन्हीं चदरिया’ के वे प्रतीक थे। प्राय: यह देखा जाता है कि किसी भी पुस्तक का प्राक्कथन एक व्यक्ति लिखता है। लेकिन इस पुस्तक में प्राक्कथन लिखने वालों में देवन्द्र स्वरूप, यादवराव देशमुख तथा अतुल जैन है। मेरा मानना है कि इसमें आधा दर्जन लोगों का नाम जोड़ा जा सकता था।

पुस्तक की भाषा शैली, सरल, सुबोध तथा प्रवाहमयी है एवं मूल्य भी कम रखा गया है। कुल मिलाकर 170 पृष्ठों की पुस्तक का मूल्य 75 रूपये ही रखा गया है जो पाठकों द्वारा सरलता से खरीदा जा सकता है।

पुस्तक : राष्ट्र-ऋषि नानाजी

प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स, 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली – 02

मूल्य : 75 रुपये

संस्करण : प्रथम, 2011

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