राजनीति

राष्ट्रीय एकता का अर्थ एकरूपता नहीं, विविधता में विश्वास है

31 अक्टूबर: राष्ट्रीय एकता दिवस विशेष

राजेश जैन

भारत की कल्पना कीजिए। कहीं हिमालय की बर्फीली चोटियां हैं, कहीं राजस्थान का रेगिस्तान; कहीं बंगाल की सांस्कृतिक परंपराएं हैं, कहीं दक्षिण भारत की भाषाई और साहित्यिक विरासत। खानपान, पहनावे, बोलियों, धर्मों और रीति-रिवाजों में इतना अंतर है कि पहली नजर में यह देश अनेक अलग-अलग संसारों का समूह दिखाई दे सकता है। लेकिन इन्हीं विविधताओं के बीच एक साझा संवैधानिक पहचान, स्वतंत्रता का इतिहास और साथ रहने की आकांक्षा भारत को एक राष्ट्र बनाती है।

इस एकता को बनाए रखना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। यह केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनती, बल्कि लोगों के बीच विश्वास, समान अधिकारों और इस भावना से मजबूत होती है कि देश की प्रगति में हर नागरिक की हिस्सेदारी है। जब किसी व्यक्ति को उसकी भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति के कारण कमतर समझा जाता है, तब राष्ट्रीय एकता की बुनियाद पर सवाल खड़े होते हैं। इसलिए एकता की चर्चा करते समय यह पूछना भी जरूरी है कि क्या देश का हर नागरिक स्वयं को इस राष्ट्र का समान और सम्मानित हिस्सा महसूस करता है।

हर वर्ष 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है। स्वतंत्रता के बाद देशी रियासतों के एकीकरण में उनकी निर्णायक भूमिका के कारण उन्हें आधुनिक भारत के राजनीतिक एकीकरण के प्रमुख शिल्पियों में गिना जाता है। राष्ट्रीय एकता दिवस उनके योगदान को याद करने के साथ यह विचार करने का अवसर भी है कि राजनीतिक एकीकरण से आगे बढ़कर सामाजिक और भावनात्मक एकता को कैसे मजबूत किया जाए।

रियासतों का एकीकरण और आधुनिक भारत की नींव

1947 में स्वतंत्रता के समय भारत के सामने केवल विभाजन और विस्थापन की चुनौती ही नहीं थी। देश में अनेक देशी रियासतें थीं, जिनका भविष्य भी तय करना था। इन रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करना एक जटिल राजनीतिक और प्रशासनिक कार्य था। सरदार पटेल ने वी. पी. मेनन सहित अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कूटनीति, बातचीत और परिस्थितियों के अनुरूप निर्णयों के माध्यम से भारतीय संघ का स्वरूप मजबूत हुआ।

यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि राजनीतिक विखंडन की स्थिति में नवस्वतंत्र भारत के सामने प्रशासन, सुरक्षा और आर्थिक विकास से जुड़ी गंभीर कठिनाइयां खड़ी हो सकती थीं। रियासतों का एकीकरण आधुनिक भारतीय राष्ट्र-निर्माण की बुनियादी प्रक्रियाओं में से एक था। लेकिन इतिहास से मिलने वाली सीख केवल किसी एक नेता की दृढ़ इच्छाशक्ति तक सीमित नहीं है। राष्ट्र-निर्माण में नेतृत्व के साथ संस्थाओं, संवाद, प्रशासनिक क्षमता और विभिन्न पक्षों के सहयोग की भी भूमिका होती है। भारत की एकता अनेक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं, सामाजिक आंदोलनों और लोकतांत्रिक प्रयासों से विकसित हुई है।

आज सरदार पटेल को याद करने का अर्थ उनके योगदान को स्वीकार करने के साथ उस व्यापक जिम्मेदारी को समझना भी है, जो एक विविधतापूर्ण देश को एकजुट रखने के लिए आवश्यक होती है। राजनीतिक एकीकरण ने भारत को साझा प्रशासनिक ढांचा दिया; उस एकता को जीवंत बनाए रखने का काम प्रत्येक पीढ़ी को करना पड़ता है।


एकता और एकरूपता के बीच का अंतर

राष्ट्रीय एकता पर विचार करते समय एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है। एकता का अर्थ यह नहीं कि देश के सभी लोग एक ही भाषा बोलें, एक जैसा पहनावा अपनाएं या उनकी सांस्कृतिक पहचान समान हो। एकता का अर्थ है कि अलग-अलग पहचान रखने वाले लोग समान अधिकारों और साझा जिम्मेदारियों के आधार पर साथ रह सकें।

भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता उसकी ऐतिहासिक विशेषता है। अलग-अलग भाषाएं, लोक परंपराएं, खानपान और जीवनशैलियां देश की सांस्कृतिक संपदा का हिस्सा हैं। किसी एक पहचान को दूसरी से श्रेष्ठ मानने या किसी समुदाय की विशिष्टता को संदेह की नजर से देखने से आपसी विश्वास कमजोर हो सकता है।

भारतीय संविधान इसी विविधता के बीच समान नागरिकता की नींव रखता है। संविधान के अनुच्छेद 51ए में नागरिकों का कर्तव्य बताया गया है कि वे धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं से ऊपर उठकर सद्भाव और भाईचारे की भावना को बढ़ावा दें तथा देश की मिली-जुली सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखें।

यह सिद्धांत केवल संवैधानिक दस्तावेज में दर्ज रहने के लिए नहीं है। इसका महत्व रोजमर्रा के जीवन में सामने आता है—जब कोई व्यक्ति दूसरे की भाषा का सम्मान करता है, जब किसी के साथ धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होता और जब अलग विचार रखने वाले लोग बिना डर के अपनी बात कह पाते हैं।

इसलिए राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए मतभेद मिटाना जरूरी नहीं, बल्कि मतभेदों के बावजूद संवाद बनाए रखना जरूरी है। लोकतंत्र में असहमति अपने आप में विभाजन का प्रमाण नहीं है। असहमति को हिंसा, घृणा या भेदभाव में बदलने से रोकना सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है।

सामाजिक न्याय से मजबूत होगी एकता  

राष्ट्रीय एकता की चर्चा में आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को भी जगह मिलनी चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं कमजोर हैं, किसी समुदाय को अवसरों तक पहुंचने में लगातार बाधाओं का सामना करना पड़ता है या किसी व्यक्ति को उसकी पहचान के कारण अपमान झेलना पड़ता है, तो केवल राष्ट्रीय गौरव के संदेश उसके अनुभव को नहीं बदल सकते।

एकता की वास्तविक परीक्षा यह है कि विकास के अवसर कितने व्यापक हैं और नागरिकों को न्याय पाने के लिए कितनी प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध है। रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, सुरक्षा और समान अवसर राष्ट्रीय एकता से सीधे जुड़े हुए हैं। जब लोगों को लगता है कि व्यवस्था उनके साथ न्याय करती है, तो संस्थाओं के प्रति भरोसा और साझा भविष्य की भावना मजबूत हो सकती है।

इसी तरह, क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना भी जरूरी है। देश के किसी हिस्से में विकास की गति तेज हो और दूसरे हिस्से में बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना रहे, तो लोगों के बीच दूरी बढ़ने की आशंका रहती है। इसलिए राष्ट्रीय एकता को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों या प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसे नीतियों, सार्वजनिक सेवाओं और न्यायपूर्ण अवसरों में भी दिखाई देना चाहिए।

सोशल मीडिया के दौर में एकता की नई चुनौती

आज राष्ट्रीय एकता के सामने एक नई चुनौती डिजिटल माध्यमों से भी जुड़ी है। सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ने, जानकारी साझा करने और आपदाओं के समय सहायता जुटाने के अवसर दिए हैं। लेकिन इसी माध्यम से अफवाहें, भ्रामक वीडियो और किसी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाली सामग्री भी तेजी से प्रसारित हो सकती है।

किसी घटना की अधूरी जानकारी को पूरे समुदाय से जोड़ देना या बिना पुष्टि के संदेश आगे बढ़ाना सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है। ऐसे में नागरिकों की जिम्मेदारी केवल सामग्री साझा करने तक सीमित नहीं है। उन्हें उसकी विश्वसनीयता जांचनी चाहिए, भड़काऊ दावों से सावधान रहना चाहिए और असहमति को व्यक्तिगत शत्रुता में बदलने से बचना चाहिए।

शिक्षा संस्थानों, मीडिया और डिजिटल मंचों की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। तथ्यपरक जानकारी, संवैधानिक मूल्यों की समझ और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देना जरूरी है। राष्ट्रीय एकता तभी मजबूत होगी, जब नागरिक भावनाओं के साथ विवेक का इस्तेमाल भी करेंगे।

एकता दिवस से आगे की जिम्मेदारी

राष्ट्रीय एकता दिवस पर पदयात्राएं, शपथ कार्यक्रम और सामूहिक आयोजन लोगों को जोड़ने का अवसर प्रदान करते हैं। लेकिन इन आयोजनों की सार्थकता तभी है, जब उनका संदेश दैनिक जीवन में भी दिखाई दे। किसी दूसरे राज्य से आए व्यक्ति के प्रति सम्मान, जरूरतमंद की मदद, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा, महिलाओं की गरिमा का सम्मान और भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाना भी राष्ट्रीय एकता के व्यावहारिक रूप हैं।

सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक एकीकरण की कठिन चुनौती में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। आज की पीढ़ी के सामने एक अलग, लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है-इस राजनीतिक एकता को सामाजिक विश्वास, संवैधानिक प्रतिबद्धता और समान अवसरों से लगातार मजबूत करना।

राष्ट्रीय एकता का अर्थ यह नहीं कि सभी नागरिक हर मुद्दे पर सहमत हों। इसका अर्थ है कि असहमति के बावजूद वे एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करें, विवादों का समाधान लोकतांत्रिक तरीकों से तलाशें और देश के साझा भविष्य के प्रति जिम्मेदार रहें।

31 अक्टूबर का संदेश इसलिए केवल यह नहीं होना चाहिए कि भारत एक राष्ट्र है। अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम उसे ऐसा राष्ट्र कैसे बनाए रखें, जिसमें विविधता के लिए जगह हो, न्याय तक पहुंच हो और हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिले। राष्ट्रीय एकता की असली ताकत लोगों से एक जैसा होने की अपेक्षा करने में नहीं, बल्कि अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे के साथ न्याय, सम्मान और विश्वास से खड़े रहने में है।

राजेश जैन