राजनीति

अविश्वास प्रस्ताव और विपक्ष का आचरण

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध विपक्ष की ओर से प्रस्तुत किया गया अविश्वास प्रस्ताव ध्वनिमत से निरस्त हो गया है। वास्तव में यह अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध ही नहीं था बल्कि यह केंद्र की मोदी सरकार और एनडीए की स्थिरता को भी प्रभावित करने वाला अविश्वास प्रस्ताव था। यदि यह अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार हो जाता तो निश्चित रूप से सरकार की स्थिरता पर भी गंभीर संवैधानिक संकट खड़ा हो गया होता। इसलिए सरकार के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। वर्तमान में प्रधानमंत्री मोदी की के द्वारा किए जा रहे कार्यों के दृष्टिगत उनके किसी भी साथी दल ने उनसे दूर जाना उचित नहीं माना। यही कारण रहा कि सारा राजग मजबूती के साथ अपने नेता के साथ खड़ा रहा।
वैसे लोकसभाध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्तुत किया गया यह अविश्वास प्रस्ताव पहला अविश्वास प्रस्ताव नहीं है। इससे पूर्व सबसे पहले अविश्वास प्रस्ताव गणेश वासुदेव मावलंकर के विरुद्ध आया था। जो कि लोकसभा के पहले स्पीकर हुआ करते थे। 18 दिसंबर 1954 को लोकसभा ने अपने अध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्तुत किए गए उस प्रस्ताव पर जमकर चर्चा की थी। जिसे कम्युनिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा के द्वारा प्रस्तुत किया गया था। उस समय विपक्षी दलों का आरोप था कि स्थगन प्रस्ताव और प्रश्नों की अनुमति देने में लोकसभा अध्यक्ष की ओर से निष्पक्षता नहीं बरती जाती है। इसलिए लोकसभाध्यक्ष सभी सदस्यों का विश्वास प्रस्ताव प्राप्त करने में सफल नहीं रहे हैं।जिन्हें पद से हटाना ही एकमात्र विकल्प है। परंतु उस समय सत्तापक्ष का लोकसभा में पूर्ण बहुमत होने के कारण विपक्ष का वह प्रस्ताव गिर गया था।
उसके बाद दूसरा अविश्वास प्रस्ताव 1966 की नवंबर में तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष हुकमसिंह के विरुद्ध विपक्षी दलों के सांसदों द्वारा प्रस्तुत किया गया था। उसमें संसदीय कार्यवाही में विपक्ष को आनुपातिक दृष्टिकोण से पर्याप्त अवसर न देने का आरोप लगाकर विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत किया था।
तीसरा अविश्वास प्रस्ताव अप्रैल 1987 में तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष बलराम जाखड़ के विरुद्ध विपक्षी दलों की ओर से प्रस्तुत किया गया था। उस समय केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। विपक्ष के सांसदों ने लोकसभाध्यक्ष पर आरोप लगाया था कि वह विपक्ष के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त हैं और राजीव गांधी सरकार के प्रति अधिक झुकाव रखते हैं। जबकि लोकसभाध्यक्ष को इस प्रकार का आचरण नहीं करना चाहिए। एक बार लोकसभाध्यक्ष बनने के पश्चात उसे प्रत्येक सांसद की निजता और सम्मान का ध्यान रखना चाहिए। राजीव गांधी के पास उस समय प्रचंड बहुमत था, जिसके कारण यह प्रस्ताव भी पारित नहीं हो पाया था।
अब कुल मिलाकर इसी प्रकार के आरोप वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जी पर लगाए गए हैं। कांग्रेस के सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की ओर से आरोप लगाया गया है कि उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जाता है।
राहुल गांधी के इस आरोप पर सत्ता पक्ष की ओर से जवाब देते हुए केंद्रीय गृहमंत्री श्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि 17वीं लोकसभा में कांग्रेस को 157 घंटे 55 मिनट का समय दिया गया था। जबकि उनके 52 सदस्य थे। 17वीं लोकसभा में कांग्रेस को भाजपा की अपेक्षा 6 गुणा अधिक समय दिया गया। जबकि भाजपा के पास 6 गुणा अधिक सदस्य थे।
लोकसभा में भी कांग्रेस को भाजपा से दो गुणा समय मिला।
वास्तव में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की समस्या यह है कि वह लोकसभा में भी अपनी गंभीरता नहीं दिखाते हैं। उनके रहते नेता प्रतिपक्ष का आचरण कुछ इस प्रकार का लग रहा जैसे केवल और केवल सरकारी नीतियों और कार्यों का विरोध करना ही नेता प्रतिपक्ष का एकमात्र कार्य है। इसके लिए वे हर प्रकार का हथकंडा अपनाने के लिए तैयार हैं।उसके बाद वह जनता के सामने अपने आपको एक विक्टिम के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जिससे जनता को गुमराह किया जा सके। सत्ता में आने का यदि यही एकमात्र रास्ता है तो इसे देश की जनता सबसे घटिया रास्ता मानकर बार-बार नकार रही है, परन्तु राहुल गांधी हैं कि मनाने को तैयार नहीं हैं। वह सभी तथ्यों को नकारकर केवल एक ही रट लगाए जाते हैं कि उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जाता। सत्ता पक्ष के सांसदों की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि राहुल गांधी को जब संसद में ढूंढा जाता है और लोगों की उन्हें बोलते देखने की इच्छा होती है तो वह संसद में न होकर इंग्लैंड या जर्मनी में होते हैं। अच्छा हो कि राहुल गांधी समय पर बोलें , तर्क संगत बोलें, बोलने में झूठ का सहारा न लें। परंतु दुर्भाग्य से वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। राहुल गांधी के मुताबिक यदि ईरान के समर्थन में बोलना और संसद में उस पर बहस करवाना ही उनके बोलने का सबसे अच्छा आधार हो सकता है तो इसे देश की जनता स्वीकार नहीं करेगी। आप वर्तमान सरकार की विदेश नीति के विरोधी हो सकते हैं, परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि जो देश भारत का अहित चाहते रहे हैं, उनके लिए ही हम अपनी संसद का कीमती समय नष्ट करें। देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात इंदिरा गांधी के अच्छे दोस्त थे, उसके बाद वे राजीव गांधी के भी अच्छे दोस्त रहे। परंतु जब कश्मीर का प्रश्न आया तो संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने भारत का विरोध करते हुए कश्मीर को पाकिस्तान का अभिन्न अंग बताया था। इसके अतिरिक्त इस बिंदु पर एक अच्छे मित्र की भांति इजरायल पहले दिन से भारत के साथ खड़ा रहा है। कांग्रेस के लिए अराफात की सोच अच्छी हो सकती है, परन्तु यह सोच राष्ट्र के लिए अच्छी नहीं हो सकती। इसे भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। मित्र को वही बोलना चाहिए जो मित्र के हित में हो।
आतंकी देशों या संगठनों को दूध पिलाना किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। यदि सरकार आतंकी देशों या संगठनों के सामने झुकती हुई दिखाई देती है या वोट प्राप्ति के लालच में उन्हें अधिक से अधिक सुविधाएं देती हुई दिखाई देती है तो यह सोच राष्ट्र का विखंडन तो करा सकती है, उसका उद्धार कभी नहीं करा सकती।
वर्तमान में जब प्रकार ओम बिरला जी के लिए स्पष्ट हो गया है कि वह लोकसभा अध्यक्ष बने रहेंगे, उसके दृष्टिगत राहुल गांधी को भी आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। उन्होंने कई बार ऐसा किया है जब वह राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव तक से अनुपस्थित रहे हैं। इसी प्रकार सरकारी विधेयक पर चर्चा से भी वह भागते रहे हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में भी अनेक बार भाग नहीं लिया। अंततः ऐसा कब तक चलेगा ?

डॉ राकेश कुमार आर्य