समाज

न दवा, न दुआ, न बंद कमरा: अवसाद और तनाव से जंग जीतने के लिए अब ‘प्रकृति’ ही सहारा

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस विशेष (10 अक्टूबर)

मिट्टी की छुअन और पेड़ों के सन्नाटे से घट रहा कॉर्टिसोल; देश में तेज़ी से बढ़ा डिजिटल डिटॉक्स और मड-थेरेपी कैंप्स का चलन

मणिमाला शर्मा

कंक्रीट के जंगलों, अंतहीन काम के घंटों और स्क्रीन की नीली रोशनी से झुलस चुके शहरी युवाओं को अवसाद से बचाने के लिए अब एक अनोखी थेरेपी काम आ रही है। दवाओं और बंद कमरों के पारंपरिक इलाज से अलग, अब भयंकर डिप्रेशन और एंग्जायटी का तोड़ मिट्टी की सोंधी महक और घने जंगलों के मौन सन्नाटे में खोजा जा रहा है। विदेशों की तर्ज पर भारत में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा ‘ग्रीन प्रिस्क्रिप्शन’ का यह नया लाइफस्टाइल ट्रेंड यह साबित करता है कि जब इंसानी दिमाग तकनीक के दबाव से पूरी तरह थक जाता है, तो उसे सुकून और हीलिंग केवल कुदरत की गोद में ही मिल सकती है।

सुबह की भीगी हुई मिट्टी की वह सोंधी महक, पेड़ों के पत्तों से छनकर आती गुनगुनी धूप, और चिड़ियों की चहचहाहट के बीच नंगे पैर घास पर चलना।गौशालाओं में गायों के साथ समय बिताना या दूर किसी छोटे से गाँव-कस्बे में जाकर चुपचाप कुछ दिन एकांत में रहना टाइप जीवन शैली अपनाने के पीछे केवल किसी गांव या अपनी शानदार छुट्टी की सुखद याद नहीं रह गया है, बल्कि मानसिक रोगों से जूझ रहे शहरी समाज के लिए एक अचूक और वैज्ञानिक औषधि बन चुका है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के मौके पर जहाँ एक ओर दवाओं और काउंसिलिंग के पारंपरिक तरीकों पर चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर एक बेहद अनूठा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। इसे चिकित्सा जगत में ‘इको-थेरेपी’ (Eco-therapy) या ‘ग्रीन प्रिस्क्रिप्शन’ (Green Prescription) कहा जा रहा है।

महानगरों के कंक्रीट के जंगलों, अंतहीन काम के घंटों और स्क्रीन की चकाचौंध से थक चुके युवा अब अपने अवसाद (Depression), अनिद्रा (Insomnia) और क्रोनिक एंग्जायटी का इलाज किसी बंद कमरे या क्लिनिक में खोजने के बजाय, जंगलों, मिट्टी और पेड़-पौधों के बीच खोज रहे हैं।

शिनरिन-योकु: जब पेड़ बनते हैं थेरेपिस्ट

इस थेरेपी की जड़ें जापान की प्राचीन पद्धति ‘शिनरिन-योकु’ (Shinrin-yoku) यानी ‘फॉरेस्ट बाथिंग’ (जंगल के वातावरण को इंद्रियों से ग्रहण करना) में छिपी हैं। इसका मतलब जंगल में नहाना नहीं, बल्कि प्रकृति के सन्नाटे को खुद के भीतर उतारना है। चिकित्सा विज्ञान ने भी यह माना है कि जब हम पेड़ों के संपर्क में आते हैं, तो वे ‘फाइटनसाइड्स’ (Phytoncides) नामक जैविक यौगिक छोड़ते हैं। यह यौगिक जब सांस के जरिए हमारे शरीर में जाता है, तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है और मस्तिष्क की तंत्रिकाएं शांत होती हैं।

जापान और अमेरिका के चिकित्सा शोधों के अनुसार, प्रकृति के बीच सिर्फ आधा घंटा बिताने से उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) में कमी आती है और मानसिक थकान (Mental Fatigue) पूरी तरह दूर हो जाती है। यही वजह है कि अब देश के प्रमुख मनोचिकित्सक अपने पर्चे पर दवाओं के साथ ‘हर दिन ३० मिनट प्रकृति के साथ बिताने’ की हिदायत अनिवार्य रूप से लिख रहे हैं।

मिट्टी का जादू: रासायनिक रूप से सिद्ध है थेरेपी

हमारे देश में मिट्टी से जुड़ाव का सबसे बड़ा उदाहरण भगवान राम और श्री कृष्ण का है । जिसमें दोनों ही ने मिट्टी में खेल कर और मिट्टी खाकर यह बताने का प्रयास किया कि धरती और उससे जुड़ाव हमारी स्वस्थ जीवन शैली के लिए कितना महत्वपूर्ण है ? आज माताएं अपने बच्चों को मिट्टी खाना तो छोड़िये उन के तन पर मिट्टी का एक कण नहीं लगने देती हैं। लेकिन अब फिर वही सत्य सनातन की परम्पराएं पूरी दुनिया में गूंज रही हैं । सुनने में भले ही यह पारंपरिक या घरेलू नुस्खा लगे, लेकिन इसके पीछे का विज्ञान बेहद ठोस है। न्यूरो-साइंटिस्ट्स की एक रिसर्च के मुताबिक, मिट्टी में पाया जाने वाला एक हानिरहित बैक्टीरिया ‘माइकोबैक्टीरियम वैके’ इंसानी मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को उत्तेजित करता है। यह न्यूरॉन्स वही ‘सेरोटोनिन’ (Serotonin) हार्मोन छोड़ते हैं, जिसे हम आम बोलचाल में ‘खुशी का हार्मोन’ कहते हैं।

यही वजह है कि जो लोग गार्डनिंग (बागवानी) करते हैं या खेतों और पार्कों में मिट्टी से जुड़कर काम करते हैं, उनमें अवसाद का स्तर उन लोगों की तुलना में ३५% कम पाया गया है जो हमेशा एसी कमरों और बंद दफ्तरों में कीबोर्ड पर उंगलियां चलाते रहते हैं। पिछले दो वर्षों में देश के बड़े शहरों (दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, मुंबई) के पास लगभग ४५% नए ‘इको-थेरेपी’ और डिजिटल डिटॉक्स सेंटर्स खुले हैं।

केस स्टडी: “दवाएं जो काम नहीं कर सकीं, वह मिट्टी ने कर दिखाया”

सॉफ्टवेयर इंजीनियर ३२ वर्षीय रोहन मेहता (नाम परिवर्तित) बताते हैं, “तीन साल की लगातार नाइट शिफ्ट और कॉरपोरेट प्रेशर ने मुझे एंग्जायटी का मरीज बना दिया था। मैं पैनिक अटैक की दवाएं ले रहा था, जिससे बस नींद आती थी, समस्या का हल नहीं होता था। फिर मेरे डॉक्टर की सलाह पर मैंने शहर के बाहरी इलाके में एक ‘कम्युनिटी फार्मिंग’ ग्रुप जॉइन किया। हर रविवार को ४ घंटे मिट्टी में काम करना, पौधे लगाना और फोन को बंद रखना,इस रूटीन ने चमत्कार कर दिया। छह महीने में मेरी दवाएं छूट गईं। अब मेरा दिमाग बिल्कुल शांत रहता है।”

गैजेट्स से आज़ादी और टूटते रिश्तों को संजीवनी

इस लाइफस्टाइल बदलाव का एक और पहलू ‘डिजिटल डिटॉक्स’ (Digital Detox) है। शहरी जोड़े जो एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अपनी-अपनी मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं, वे अब आपसी चिड़चिड़ापन और वैवाहिक तनाव को कम करने के लिए इन नेचर कैंप्स का सहारा ले रहे हैं। बिना वाई-फाई और बिना नेटवर्क वाले इन ग्रामीण परिवेशों में दो दिन का सन्नाटा ही उनके अशांत मन को वापस पटरी पर ला रहा है। यही वजह है कि बड़ी कॉरपोरेट कंपनियाँ भी अब अपने कर्मचारियों के मानसिक बर्नआउट को रोकने के लिए ‘नेचर विज़िट’ स्पॉन्सर कर रही हैं।

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इको-थेरेपी (Eco-Therapy) के मुख्य प्रकार

१. फॉरेस्ट बाथिंग: जंगलों या घने पार्कों में मौन रहकर समय बिताना।

२. हॉर्टिकल्चर थेरेपी: पेड़-पौधों को उगाना और मिट्टी के साथ काम करना।

३. मड थेरेपी: मिट्टी के लेप या नंगे पैर गीली मिट्टी पर चलना।

४. डिजिटल डिटॉक्स कैंप: गैजेट्स को जमा कर २-३ दिन प्रकृति के बीच रहना।

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भारत में कहाँ सक्रिय हैं ये सेंटर्स?

  • महाराष्ट्र: नासिक का विवेदा वेलनेस और पुणे का आत्मंतन सेंटर।
  • बेंगलुरु: क्षेमावन जैसी संस्थाएं (स्पेशल 3-डे सेल्युलर रीसेट कैंप)।
  • उत्तराखंड: ऋषिकेश और मसूरी के जंगलों में अरण्य मौन रिट्रीट्स।

कंक्रीट से कुदरत की ओर लौटने का समय

आज सही मायनो में देखा जाए तो मानसिक स्वास्थ्य का समाधान केवल मेडिकल स्टोर की गोलियों में नहीं छिपा है। तकनीकी प्रगति की अंधी दौड़ में हमने जो खोया है, उसे पाने का रास्ता कुदरत की ओर ही जाता है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को वीडियो गेम्स और मोबाइल स्क्रीन से बाहर निकालें, पार्कों में ले जाएं, उनके हाथों में मिट्टी लगने दें। कंक्रीट के इस दौर में कुदरत से नाता जोड़ना अब कोई शौक नहीं, बल्कि हमारी मानसिक सेहत को जिंदा रखने की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।

मणिमाला शर्मा