-सुनील कुमार महला
हाल ही में, बुधवार को 15 अप्रैल 2026 को सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) ने कक्षा 10वीं का परीक्षा परिणाम घोषित किया, जिसमें इस वर्ष कुल 93.70% छात्र सफल हुए हैं। यह आंकड़ा पिछले वर्ष के 93.66% की तुलना में 0.04% अधिक है, जो परिणाम में हल्का किंतु सकारात्मक सुधार दर्शाता है। इस बार भी छात्राओं ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए 94.99% पास प्रतिशत हासिल किया, जबकि लड़कों का पास प्रतिशत 92.69% रहा। वहीं ट्रांसजेंडर छात्रों का पास प्रतिशत 87.50% दर्ज किया गया, जो शिक्षा के क्षेत्र में सभी वर्गों की भागीदारी और प्रगति का संकेत देता है। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों में 55,368 छात्रों ने 95% से अधिक अंक प्राप्त किए, जबकि 2,21,574 छात्रों ने 90% से अधिक अंक हासिल किए, जो प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण और विद्यार्थियों की मेहनत को दर्शाता है। इसके साथ ही लगभग 14.7 लाख से अधिक छात्रों को ‘कम्पार्टमेंट’ श्रेणी में रखा गया है, जो यह दर्शाता है कि एक बड़ा वर्ग अभी भी सुधार की दिशा में प्रयासरत है। इस वर्ष परीक्षार्थियों की कुल संख्या पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ी कम रही। उल्लेखनीय है कि सीबीएसई ने इस बार भी टॉपर सूची जारी नहीं की और न ही फर्स्ट, सेकेंड या थर्ड डिवीजन की व्यवस्था अपनाई, ताकि छात्रों के बीच अनावश्यक तुलना और प्रतिस्पर्धा को रोका जा सके।हालांकि, परीक्षा परिणाम बेहतर रहा है, लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रवृत्ति भी सामने आती है, जहां अभिभावक अपने बच्चों के अंकों की तुलना दूसरों से करने लगते हैं, जिससे बच्चों पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है। वास्तव में, हर बच्चा अलग होता है-किसी की गणित और विज्ञान में पकड़ मजबूत होती है तो कोई कला, खेल या भाषा में उत्कृष्ट होता है। यदि बच्चों का मूल्यांकन केवल अंकों के आधार पर किया जाए, तो इससे उनके आत्मविश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और वे हीन भावना, तनाव तथा असफलता के भय से ग्रस्त हो सकते हैं। प्रतिस्पर्धा जीवन का हिस्सा अवश्य है, लेकिन वह तभी तक सकारात्मक है जब तक वह प्रेरणा देती है; जब यह दबाव और चिंता का कारण बनने लगे, तब यह मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए हानिकारक हो जाती है। इसलिए बच्चों को दूसरों से बेहतर बनने के बजाय स्वयं से बेहतर बनने की प्रेरणा देना अधिक उचित है।इस संदर्भ में माता-पिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें बच्चों के प्रयासों की सराहना करनी चाहिए, न कि केवल परिणामों पर ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चा अपेक्षा के अनुरूप अंक प्राप्त नहीं कर पाता, तो उसे डांटने या तुलना करने के बजाय यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि सुधार की आवश्यकता कहां है। बच्चों के साथ संवाद बनाए रखना, उनकी रुचियों और क्षमताओं को समझना तथा उसी दिशा में प्रोत्साहित करना ही सही मार्गदर्शन है। आज के प्रतिस्पर्धी दौर में अपेक्षाएं स्वाभाविक हैं, लेकिन जब अभिभावक अपनी अधूरी इच्छाएं बच्चों पर थोपते हैं, तो यह उनके व्यक्तित्व विकास में बाधा बनती हैं। हर बच्चा अपनी अलग पहचान और क्षमता लेकर आता है, इसलिए उस पर अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ डालना उचित नहीं है।हाल फिलहाल, यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि अंकों की अंधी दौड़ बच्चों के समग्र विकास और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सफलता का वास्तविक पैमाना केवल अंक नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल और प्रतिभा का विकास है। अत्यधिक दबाव के कारण बचपन प्रभावित हो रहा है और रचनात्मकता में कमी आ रही है, जबकि जीवन में आगे बढ़ने के लिए व्यावहारिक ज्ञान और कौशल अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि प्रसिद्ध व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक जॉन बी. वॉटसन ने बच्चों के विकास को लेकर एक चर्चित और विवादास्पद कथन दिया था-‘मुझे एक दर्जन स्वस्थ, अच्छी तरह विकसित शिशु दे दीजिए और उन्हें अपने वातावरण में पालने का अवसर दीजिए, तो मैं उनमें से किसी को भी डॉक्टर, वकील, कलाकार, व्यापारी, यहां तक कि भिखारी या चोर बना सकता हूं, चाहे उसकी जन्मजात प्रतिभा कुछ भी क्यों न हो।’ वास्तव में, इस कथन का मूल भाव यह है कि वे बच्चों के विकास में वातावरण को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे। हालांकि आधुनिक मनोविज्ञान यह मानता है कि बच्चे के व्यक्तित्व और विकास में वंशानुगत गुण (हेरिडिटेरी ट्रेट्स) और वातावरण-दोनों का संतुलित योगदान होता है। यह विचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि सही माहौल और सकारात्मक प्रोत्साहन से बच्चों को बेहतर दिशा दी जा सकती है, न कि केवल दबाव डालकर।वास्तव में, हम सभी को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि बच्चे वास्तव में कच्चे घड़े की तरह होते हैं, जिन्हें जिस दिशा में मार्गदर्शन मिलता है, वे उसी रूप में ढलते चले जाते हैं। उनका मन कोमल, जिज्ञासु और सीखने के लिए सदैव तैयार रहता है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उन्हें बचपन से ही सही संस्कार, संयम और सकारात्मक सोच दी जाए। यदि बच्चों में संयम विकसित किया जाए, तो वे कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखते हैं और जल्दबाज़ी में गलत निर्णय लेने से बचते हैं। इसके साथ ही आत्मविश्वास का विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आत्मविश्वासी बच्चे जीवन की चुनौतियों का सामना साहस और दृढ़ता के साथ करते हैं। जब माता-पिता और शिक्षक बच्चों को प्रोत्साहित करते हैं, उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की सराहना करते हैं और असफलताओं में उनका साथ देते हैं, तब उनके भीतर एक मजबूत आत्मबल विकसित होता है। यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी और कर्तव्य है कि हम बच्चों को केवल पढ़ाई तक सीमित न रखें, बल्कि उनके व्यक्तित्व के समग्र विकास पर ध्यान दें। सही दिशा, स्नेह और अनुशासन का संतुलन ही उन्हें एक सफल और जिम्मेदार इंसान बना सकता है। वर्तमान समय में परीक्षा का दबाव असामान्य रूप से बढ़ गया है, जहां अच्छे अंक लाने और दूसरों से आगे निकलने की होड़ बच्चों को मानसिक तनाव और चिंता की ओर धकेल रही है। कई बच्चे पढ़ाई को सीखने की प्रक्रिया के बजाय केवल अंक प्राप्त करने का साधन मानने लगते हैं, जिससे उनकी जिज्ञासा, रचनात्मकता और आत्मविश्वास प्रभावित होता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करना होना चाहिए। यदि बच्चा मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है, तो वह किसी भी सफलता का वास्तविक आनंद नहीं ले सकता।कहना ग़लत नहीं होगा कि आज सफलता की परिभाषा भी बदल रही है। अब केवल अच्छे अंक ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि रचनात्मकता, संचार कौशल, आत्मविश्वास और भावनात्मक संतुलन जैसे गुण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अंततः यह कहा जा सकता है कि बच्चों से अपेक्षाएं रखना गलत नहीं है, लेकिन उनका संतुलित और यथार्थवादी होना जरूरी है। बच्चों को अपने सपने देखने और उन्हें पूरा करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, क्योंकि वे संवेदनशील और असीम संभावनाओं से भरे इंसान हैं। यदि उन्हें सही वातावरण, समझ और प्रोत्साहन मिले, तो वे न केवल अच्छे अंक प्राप्त करेंगे, बल्कि एक संतुलित और जिम्मेदार नागरिक के रूप में भी विकसित होंगे। इसलिए समय की मांग है कि अंकों की अंधी दौड़ से बाहर निकलकर बच्चों के समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
सुनील कुमार महला