डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
भारतीय जनमानस में रावण सामान्यतः अहंकार, अधर्म, काम-क्रोध-लोभ-मोह जैसे दुर्गुणों और बुराई का प्रतीक माना जाता है। दशहरे पर उसके पुतले का दहन इसी भावना का प्रतीक है कि धर्म, सत्य और अच्छाई की अधर्म तथा बुराई पर विजय होती है। यही कारण है कि दशहरे की सन्ध्या में जब रावण का पुतला जलता है, तो उसे सामान्यतः “रावण दहन” कहा जाता है। ऐसा अभी दो तीन दिन पहले भी हुआ। परन्तु गहरी दृष्टि से देखें तो यह केवल दहन नहीं, बल्कि एक महान, विद्वान और शिव-भक्त राजा महाज्ञानी, तपस्वी, शिवभक्त, संगीतज्ञ और विराट साम्राज्य के शासक की प्रतीकात्मक अन्त्येष्टि है। रावण सम्भवतः एकमात्र पुरुष है, जिसके अन्तिम संस्कार को वर्ष-दर-वर्ष पर्व के रूप में स्मरण किया जाता है। यही उसकी विराटता का प्रमाण है।
रावण: केवल राक्षस नहीं :
रामायण और पुराणों में रावण को केवल अधर्मी शत्रु नहीं, अपितु असाधारण व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह महर्षि पुलस्त्य का पौत्र और ऋषि विश्रवा का पुत्र था। अर्थात् वह जन्म से ब्राह्मण-परम्परा में उत्पन्न, वेद-वेदांगों का ज्ञाता और शास्त्रों में पारंगत महापण्डित था।
धार्मिक परम्परा उसे चारों वेदों और छह वेदांगों का ज्ञाता मानती है। वह केवल शस्त्र-विद्या का धुरन्धर नहीं था; राजनीति, युद्ध-नीति, तप, ज्योतिष, संगीत और स्तोत्र-रचना में भी उसकी विद्वत्ता प्रसिद्ध थी। इसीलिए उसे “महापण्डित”, “शास्त्रज्ञ” और “महाज्ञानी” कहा गया।
ज्ञान और तप की शक्ति :
रावण की सबसे बड़ी योग्यता उसका ज्ञान और तप था। उसने कठोर साधना से देवताओं को भी चुनौती देने योग्य शक्ति अर्जित की। ब्रह्मा से उसे वरदान मिला और उसकी तपस्या के प्रभाव से वह अत्यन्त बलवान बना। उसकी शक्ति केवल शरीर की नहीं, बुद्धि, संकल्प और साधना की शक्ति भी थी।
परन्तु रामायण का सन्देश यह भी है कि ज्ञान और शक्ति, यदि अहंकार से ग्रसित हो जाएँ, तो विनाश का कारण बन सकते हैं। रावण का पतन इसलिए स्थायी शिक्षा है कि विद्या, वीरता और ऐश्वर्य के बावजूद विनम्रता, धर्म और संयम के बिना मनुष्य अपने ही ज्ञान का शत्रु बन जाता है।
शिवभक्ति: रावण की आत्मा :
रावण के व्यक्तित्व की सबसे स्पष्ट पहचान उसकी शिवभक्ति है। परम्परा के अनुसार उसने कैलाश पर्वत को उठाकर लंका ले जाने का प्रयास किया। शिव ने अपने पैर के अँगूठे से पर्वत दबाया, जिससे रावण की भुजाएँ दब गयीं। उस असह्य पीड़ा में उसने शिव की स्तुति की, जो “शिव ताण्डव स्तोत्र” के नाम से प्रसिद्ध हुई।
उस स्तोत्र का प्रारम्भ इस प्रकार है—
“जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले,
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं,
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥”
यह स्तोत्र शिव की महिमा, ताण्डव की प्रचण्ड लय और भक्त की आत्मार्पण की अद्भुत अभिव्यक्ति है। इसकी रचना परम्परागत रूप से रावण से जोड़ी जाती है। यह बात सिद्ध करती है कि रावण केवल युद्ध और शक्ति का पुरुष नहीं था; उसके भीतर भक्ति, काव्य और संगीत की अपार क्षमता भी थी।
राक्षस: नाम नहीं, सभ्यता :
“राक्षस” शब्द को केवल निर्दयी दानव के अर्थ में लेना अपूर्ण है। कई विद्वान इसे “रक्ष” धातु से जोड़ते हैं—अर्थात् रक्षा करने वाले, स्वकीय समुदाय और संस्कृति के पोषक। इस दृष्टि से राक्षस लोग कोई असभ्य जाति नहीं, बल्कि अपनी स्वतन्त्र पहचान, शक्ति और राजनीतिक हितों की रक्षा में सक्रिय समुदाय थे।
लंका उनकी सभ्यता का केन्द्र था। वहाँ नगर, राजव्यवस्था, सेना, विद्या और धर्म-कर्म की परम्परा विकसित थी। देवताओं से उनका “युद्ध” केवल दुराशा का परिणाम नहीं था; वह शक्ति-सन्तुलन, क्षेत्रीय हितों और स्वाधीनता की रक्षा की राजनीति भी थी। रावण उसी संस्कृति का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि बना।
सीता-हरण: बदनीयत नहीं, उद्धार की योजना :
एक आध्यात्मिक दृष्टि में रावण का सीता-हरण कोई साधारण अपराध नहीं, बल्कि एक दिव्य नाट्य का अंग था। रावण जानता था कि उसका उद्धार केवल भगवान राम के हाथों सम्भव है। अतः उसने ऐसा कार्य किया, जिससे ब्रह्म रुई राम उसके सम्मुख आएँ और उसे अपने बाण से मोक्ष दें।
यह मान्यता इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि राम स्वयं ब्रह्म के मानव-रूप हैं। जिन्होंने रावण की रचना की, उन्हीं के द्वारा उसका अन्त और सद्गति निश्चित हुई। इस दृष्टि से रावण का वध दण्ड नहीं, मोक्षदान था; राम ने उसे शरीर से मुक्त कर अपने धाम का मार्ग दिया।
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता 4.7–8
इस दृष्टि से राम का अवतरण केवल एक राजकीय युद्ध नहीं था; वह धर्म की स्थापना, साधुओं की रक्षा और दुष्ट शक्तियों के निवारण हेतु था। रावण उस दिव्य कार्य का अभिन्न अंग बना।
राम: धर्म का मानव-रूप :
वाल्मीकि रामायण में राम के लिए कहा गया है—
“रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।”
अर्थात् राम स्वयं धर्म का साकार रूप हैं। जो स्वयं धर्म हैं, उनके द्वारा अधर्म का नाश और भक्त का उद्धार—दोनों एक ही दिव्य क्रिया के पक्ष हैं। रावण का अन्त इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
रावण को राम ने केवल युद्ध में पराजित नहीं किया; उन्होंने उसे शरीर से मुक्त कर उसकी आत्मा को अपने धाम का मार्ग दिया। इसीलिए रावण की मृत्यु साधारण मृत्यु नहीं, ब्रह्म के हस्ते प्राप्त सद्गति थी। यही कारण है कि उसके अन्त को श्राप नहीं, वरदान कहा जा सकता है।
दहन नहीं, अन्त्येष्टि :
रामायण-परम्परा में रावण का अन्तिम संस्कार उसके भाई विभीषण द्वारा किये जाने की बात कही जाती है। अतः दशहरे का रावण-दहन केवल बुराई के नष्ट होने का प्रतीक नहीं, बल्कि उस महापुरुष की स्मृति में किया जाने वाला प्रतीकात्मक अन्त्येष्टि-संस्कार भी है।
यह पर्व हमें दोहरा सन्देश देता है। एक ओर अहंकार, काम और अधर्म का नाश आवश्यक है; दूसरी ओर यह भी कि ज्ञान, तप, भक्ति और पराक्रम कभी निरर्थक नहीं होते। रावण के गुणों को नकारना इतिहास के साथ अन्याय होगा; उन्हें स्वीकार करते हुए उसकी भूल से सीख लेना ही वास्तविक चिन्तन है।
समापन: विराट पुरुष की विदाई :
रावण केवल एक पराजित राजा नहीं था। वह विद्वान था, शिवभक्त था, तपस्वी था, संगीतज्ञ था और अपनी सभ्यता का रक्षक था। उसका अन्त भी साधारण मृत्यु नहीं था—वह भगवान राम के हाथ से प्राप्त मोक्ष था। इसीलिए दशहरे पर जो जलता है, वह केवल पुतला नहीं; वह एक युग-पुरुष की स्मृति, उसकी अन्त्येष्टि और उसके उद्धार का प्रतीक है।
रावण की कथा हमें सिखाती है कि मनुष्य की महानता उसके ज्ञान, शक्ति और साधना में नहीं, उसकी विनम्रता और धर्मनिष्ठा में निहित है। जो अपनी शक्ति को ईश्वर की इच्छा के अधीन रखता है, वही सच्चा विजेता बनता है। रावण ने अपने अन्तिम क्षण में भी यह सिद्ध कर दिया कि भगवान की कृपा किसी से भी दूर नहीं होती—चाहे वह देव हो, दानव हो या राक्षस।
(नोट: यह आलेख रावण के गुणों और उसके मोक्ष सम्बन्धी आध्यात्मिक/लोक-पौराणिक दृष्टि को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। रामायण की प्रचलित धार्मिक व्याख्या में सीता-हरण अधर्म और रावण-वध धर्म की विजय माना जाता है; यहाँ प्रस्तुत “उद्धार की योजना” एक विशेष भक्ति-भावना और वैकल्पिक पाठ के रूप में प्रस्तुत है।)