बूढ़ी दीवाली

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मार्गषीर्ष अमावस्या (5.12.2010) पर विशेष रोचक जानकारी

पूरे विश्व में कार्तिक अमावस्या को दीवाली मनायी जाती है। कहते हैं कि भगवान राम, लक्ष्मण और सीता जी 14 साल के वनवास के बाद इसी दिन अयोध्या लौटे थे। इस खुशी में प्रजा ने दीपमालिका सजाकर उनका स्वागत किया। न जाने कब से यह परम्परा चल रही है; पर भारत में कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जहां इसके एक महीने बाद, मार्गशीर्ष अमावस्या को दीवाली मनायी जाती है। उत्तारांचल के अनेक स्थानों, देहरादून के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर तथा हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, कुल्लू, शिमला, किन्नौर आदि में इस समय उत्साह देखते ही बनता है। इसे पहाड़ी, जौनसारी या बूढ़ी दीवाली कहते हैं। पटाखों और दीपकों से रहित यह दीवाली एक विशिष्ट स्वरूप लिये है।

कहते हैं कि भगवान राम द्वारा रावण वध के बाद अयोध्या पहुंचने की सूचना पर्वतीय क्षेत्र में देर से पहुंची। अत: यहां के लोगों ने हर्ष व्यक्त करने के लिए अगली अमावस्या को चुना। दूसरा व्यावहारिक कारण यह है कि पांच से सात हजार फुट की ऊंचाई वाला होने से यहां भयंकर सर्दी तथा बर्फ पड़ती है। सामान्य दीवाली के समय लोग मक्का की कटाई; अदरक व अरबी की खुदाई तथा बिक्री में व्यस्त रहते हैं। उन्हें सर्दी के लिए राशन व पशुओं का चारा भी एकत्र करना होता है। अत: त्योहार मनाने का समय नहीं मिलता। इस कमी को वे अब पूरा करते हैं। इस प्रकार यह भीषण शीत के स्वागत का पर्व भी बन जाता है। लोग नौकरी या शिक्षा के लिए बाहर होने पर भी तीन दिन के लिए अपने गांव अवश्य आते हैं।

पहली रात में खाना खाकर गांव के सब लोग पंचांगन (सार्वजनिक स्थान) में आ जाते हैं। रात भर गीत, कथा, कहानी कहने के बाद सब ‘भेमल’ के पौधों से बने ब्यांठे (मशाल) को जलाकर उसके प्रकाश में गांव के बाहर कुल देवता के मंदिर में जाते हैं। यहां लकड़ियों के ढेर (डिमसा) के बीच देवदार का लम्बा तना गड़ा होता है। डिमसा में आग लगते ही युवक तने पर चढ़ जाते हैं तथा हिला-हिलाकर उसे गिरा देते हैं। तने के गिरते ही लोग हर्ष से चिल्ला उठते हैं और ढोल की धुन पर एक दूसरे की कमर में हाथ डालकर थिरकने लगते हैं। नृत्य के साथ लोकगीत गाये जाते हैं।

सेवणी लाई तो पाशो दियाणी, सेवणी लाय तो पाशो ले

हमारे सेरुलिया दियाणी, ऐव खतु रो आशो ले॥

(भाभी ननद से पूछती है कि दूर मेरे गांव में यह कैसा प्रकाश दिख रहा है ? ननद कहती है कि वहां दीवाली मनायी जा रही है।)

लगभग एक घंटे तक सब नृत्य में डूबे रहते हैं। फिर बीड़ी, सिगरेट आदि पीकर तथा आग में हाथ, पांव सेककर थकान उतारते हैं। ढोल बजाने वाला बाजगी भी ढोल को आग में थोड़ा गर्म कर लेता है। उसकी थाप के साथ ही नृत्य का अगला दौर चल पड़ता है।

पुरवा दिशा दी रात ब्याणी, ऐ कौला रानिये भैरिले पानी

दिशारै लुमैरु रात न ब्याणी, ऐ कौला रानिये भैरिले पानी॥

(पूर्व दिशा में रात खुल रही है। प्रिये, पानी भर लाओ; पर अलसाई प्रिया कहती है कि अभी रात नहीं बीती, मैं नहीं जाऊंगी)

नाच-गान का यह क्रम कई किश्तों में चलता है। भेमल की मशाल तथा डिमसा में अग्नि का अर्थ अंधकार पर प्रकाश की विजय से है। तना गिराने के पीछे संभवत: कोई प्राचीन शौर्य गाथा है, जो समय के गर्भ में विस्मृत हो गयी है। अगला दिन एक-दूसरे के घर आने-जाने में बीतता है। हर घर में लोग अखरोट की गिरी, भुनी मक्का (मूड़ा) तथा धान से बने चिउड़े से स्वागत करते हैं। घर में ही बनी जौ की हल्की शराब या चाय भी उपलब्ध रहती है। बाहर से आये लोगों को सब आग्रह कर अपने घर ले जाते हैं।

रात होते ही मुन्दा, ढाक, ढोल, नगाड़े तथा डमरू के स्वर पर पंचांगन में फिर से नाच-गाने का दौर शुरू हो जाता है।

देव के डांडे जातुरु जाणों रे, धूप धुनियारो बिसरी आयो रे

देवा बापुरिया छिता न मानिया रे, देव बापुरिया छिता न मानिया॥

(हम देवता के मंदिर में जा रहे हैं; पर भूलवश धूप, दीप आदि लाना भूल गये हैं। हे देवता, आप कृपया नाराज न हों।)

नृत्य दो समानान्तर वृत्तों में होता है। भीतर की ओर महिलाएं तथा लड़कियां हैं, जबकि बाहर पुरुष वर्ग। सब लोग स्वाभाविक रूप से अपने कद के अनुसार लगे हैं। सबके पैर आश्चर्यजनक रूप से एक साथ चलते हैं। ढोल का स्वर बदलते ही सब विपरीत दिशा में चल देते हैं। कभी अचानक सब एक कदम पीछे कूद जाते हैं; पर पदविन्यास में गड़बड़ नहीं होती। नृत्य के बीच खाली समय में कुछ लोग प्रहसन करते हैं।

तीसरे दिन शाम को ‘भिरूड़ी’ नामक कार्यक्रम होता है। इसमें गांव के कुछ बडे लोग पंचांगन में मचान पर बैठकर अखरोट लुटाते हैं। ये अखरोट गांव से ही एकत्र किये गये हैं। जिस घर में इस साल पुत्र का जन्म हुआ है, वहां से दुगने अखरोट लिये जाते हैं। अखरोट इस क्षेत्र में इतने अधिक होते हैं कि मैदानी क्षेत्र में कांच की गोलियों की तरह यहां बच्चे अखरोट से खेलते हैं।

तीसरी और अंतिम रात में ‘विदाकरी’ (विदाई) होती है। हर घर में जेठांगिये (बड़े भाई) और शेष भाई अलग दल बनाकर परम्परागत अस्त्र-शस्त्र तथा डंडे आदि लेकर दो विपरीत दिशाओं से आते हैं। दोनों दल मौंण (शिकार) पर निकले हैं। जहां दोनों मिलते हैं, वहां उनमें आगे निकलने के लिए प्रतीकात्मक संघर्ष होता है। फिर दोनों में सुलह हो जाती है। तभी दस-पन्द्रह लोग देवदार के लट्ठों से बने आठ-दस फुट ऊंचे सुसज्जित हाथी को कंधों पर उठाकर लाते हैं। हाथी पर बैठा ग्राम-प्रधान (स्याणा) तलवार चलाता रहता है। पूजन के बाद हाथी को उठाकर सब नाचते हैं। इसके पीछे भी कोई पुरानी शौर्य-कथा कही जाती है।

विदाकरी में गांव के बड़े लोग अपनी परम्परागत पोशाक पहनकर नाचते हैं। पुरुष कुर्ता, चूड़ीदार पाजामा, विशेष प्रकार का लम्बा कोट तथा गोल टोपी पहनते है। विवाहित महिलाएं गाढ़े रंग की कमीज तथा घाघरा, जबकि कन्याएं सलवार, कमीज ही पहनती हैं। यद्यपि आधुनिकता का प्रभाव युवाओं के वस्त्रों पर स्पष्ट दिखाई देने लगा है। अत: वे पैंट और जीन्स पहन कर भी नृत्य करते हैं। एक बुजुर्ग के अनुसार अब त्योहारों पर पहले सा उत्साह नहीं दिखता, इस कारण डिमसा पर बहुत कम लकड़ी एकत्र होती है तथा हाथी बनाने की प्रथा तो लगभग बंद ही हो गयी है।

यहां अनेक जातियों के लोग रहते हैं। नृत्य के समय यद्यपि भेदभाव नहीं होता; पर ऊंचनीच तथा खानपान में छुआछूत का विचार काफी लोग करते हैं। शिक्षा के प्रसार से युवाओं में यह भावना कम हो रही है। इस क्षेत्र में सर्वत्र महासू (महाशिव) देवता और उनके चार भाइयों (बाशिक, बोठा, पबासी और चालदा महासू) की पूजा होती है।

तीन दिन के इस हर्षोल्लास के बाद लोग अपने दैनिक काम में लग जाते हैं। लड़कियां अपनी ससुराल लौट जाती हैं। मेहमान तथा बाहर कार्यरत लोग भी अगली दीवाली पर मिलने के आश्वासन के साथ चल पड़ते हैं।

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