लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


– डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

बिहार विधानसभा चुनावों ने देश की राजनीति को एक नई दिशा दी है, ऐसा बहुत से विश्लेषक मानते हैं। शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी दल अथवा गठबंधन को तीन चौथाई बहुमत प्राप्त हुआ हो। जदयू और भाजपा के गठबंधन ने 243 सीटों में से 206 सीटें प्राप्त कीं। साम्यवादी टोले का नामोनिशान समाप्त हो गया। कभी बिहार में साम्यवादी दलों का खासा प्रभाव रहता था लेकिन धीरे-धीरे हाशिये पर जाते-जाते वह इन चुनावों में अंतत: मृत्यु के कगार पर पहुंच गया। बिहार के कुछ हिस्सों में नक्सलवादी, माओवादियों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है लेकिन उनके तमाम विरोधों के बावजूद जितनी बड़ी संख्या में उन क्षेत्र के लोगों ने मतदान किया, उससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि माओवादियों का प्रभाव नहीं भय ही है। लालू यादव, नीतिश कुमार, सुशील मोदी और रामविलास पासवान इत्यादि सभी नेता 1975 में जय प्रकाश नारायण के समग्र क्रांति आंदोलन की भट्ठी से तपकर निकले थे परन्तु धीरे-धीरे एक वर्ग में सत्ता का परम्परागत प्रदूषण व्याप्त हो गया और बिहार की जनता ने उनको नकारकर एक प्रकार से जय प्रकाश नारायण को सच्ची श्रद्धांजलि ही अर्पित की है। लालू यादव के टोले की पराजय को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। एक लम्बे अरसे से यह धारणा बनी हुई थी कि बिहार की राजनीति जातिगत समीकरणों पर चलती है। पहले कांग्रेस ने और बाद में लालू यादव ने इन समीकरणों का सफलतापूर्वक प्रयोग करके इस धारणा को पुष्ट ही किया था परन्तु इन चुनावों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि जातिगत समीकरणों की उपयोगिता एक सीमा तक ही होती है उसके आगे उसका नकार प्रारम्भ हो जाता है।

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार पिछले पांच वर्षों से बिहार में चल रही थी। इस सरकार ने अन्य सभी कारकों से ऊपर उठकर बिहार में विकास के कार्य प्रारंभ किए। ध्यान रखना चाहिए विकास की गंगा जाति का भेद नहीं करती। इसी प्रकार इस सरकार ने प्रदेश में कानून व्यवस्था को पुन: स्थापित करने का सफल प्रयास किया, यही प्रयास थे कि प्रदेश में बाहुबलियों के आतंक में कमी आयी और उनमें से अनेक बाहुबली जेल की सींखचों में बंद किए गए। जो राजनीतिज्ञ बिहार में जातिगत समीकरणों को ही वहां की राजनीति का प्राणबिन्दु स्वीकार करते हैं, वे बार-बार दावा कर रहे थे कि विकास और कानून व्यवस्था के क्षेत्र में चाहे जितनी मर्जी प्रगति हुई हो, जब बिहार का मतदाता मतदान केन्द्र पर जायेगा तो अंतत: उसके मत का निर्णय उसकी जाति ही करेगी लेकिन बिहार के मतदाता ने विकास और सुरक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता दी। यही कारण था कि जदयू और भाजपा के गठबंधन को प्रदेश के सभी क्षेत्रों में एक समान समर्थन मिला। इसको राजनीति में लेवलिंग इफेक्ट कहा जाता है। यह प्रभाव बाकी सभी कारकों को डूबो देता है। ऐसा प्रभाव या तो आपात स्थिति के बाद हुए चुनावों में देखने को मिला था या फिर 2010 में हुए इन विधानसभा चुनावों में।

लेकिन यदि किसी दल की पूरी प्रतिष्ठा और उसका अस्तित्व इन चुनावों में दांव पर लगा था तो वह कांग्रेस थी। कांग्रेस के लिए बिहार का चुनाव दो दृष्टियों से महत्तवपूर्ण था। प्रथम तो उसे इन चुनावों के माध्यम से राहुल गांधी को देश के नेता के तौर पर स्थापित करना था। बिहार में कांग्रेस प्राय: काफी लम्बे अरसे से मुर्च्छित अवस्था में चल रही है। पिछली विधानसभा में उसे कुल मिलाकर 9 सीटें प्राप्त हुई थीं। सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द के गिरोह ने उन्हें विश्वास दिला दिया था कि देश ने राहुल गांधी को अपना नेता स्वीकार कर लिया है। खासकर युवा वर्ग तो राहुल गांधी को अपना मार्गदर्शक और प्रेरित ही मानता है। यदि बिहार में मेहनत कर ली जाय तो इस धारणा पर आधिकारिक मुहर लग जायेगी और राहुल गांधी को अगले चुनावों तक प्रधानमंत्री के पद पर बिठाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। कांग्रेस के रणनीतिकारों के हिसाब से राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद का रास्ता बिहार के इन चुनावों में से होकर ही निकलता था। इसलिए बिहार चुनाव की पूरी कमान राहुल गांधी को दे दी गयी थी। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने बिहार में दिन-रात चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए प्रदेश में कांग्रेस को संजीवनी प्रदान करने का स्वप्न भी देखा था। अपनी इस योजना को पूरा करने के लिए कांग्रेस ने उस हर तरीके का इस्तेमाल किया जिससे उसके राजनीतिक हितों की पूर्ति तो हो सकती थी परन्तु राष्ट्रीय हितों का नुकसान हो रहा था। इसके लिए कांग्रेस ने प्रदेश में साम्प्रदायिकता को उभारने का यथासंभव प्रयास किया। चुनावों में कांग्रेस मुसलमानों को यह समझाने की भरसक कोशिश करती रही कि भारतीय जनता पार्टी उनकी सबसे बड़ी शत्रु है और मुसलमानों को इस पार्टी पर बिलकुल विश्वास नहीं करना चाहिए। हिन्दु और मुसलमान को बांटने की यह वही पुरानी रणनीति थी जिसका प्रयोग करके अंग्रेजी शासक फुट डालो और राज करो का आचरण करते हुए सत्ता संभाले रहे। कांग्रेस मुसलमानों को हिन्दुओं का भय दिखाकर बिहार में गोलबंद कर रही थी और स्वयं को उनका रक्षक घोषित कर रही थी। कांग्रेस की यह नीति मुसलमानों को मुख्य राष्ट्रीय धारा से तोड़कर आइसोलेशन में ले जाने की थी, जिससे उसकी सीटें तो बढ़ सकती थी लेकिन राष्ट्रीय एकता खण्डित होने का खतरा ज्यादा था। यह वही नीति थी जिसका प्रयोग करके मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के निर्माण की मांग की थी। कांग्रेस 2010 में भी चंद सीटों की खातिर और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की हड़बड़ी में उसी साम्प्रदायिक राष्ट्र विरोधी पथ का अनुसरण कर रही थी।

इसी हड़बड़ी में राहुल गांधी ने बिहार के लोगों को हड़काना और घौंस में लाना प्रारम्भ कर दिया। वे बार-बार अपनी चुनावी सभाओं में यह घोषणा करते घुम रहे थे कि बिहार को पैसा केन्द्र की सरकार दे रही है। भाव कुछ इस प्रकार का था कि यदि आप बिहार में कांग्रेस की सरकार नहीं चुनोगे तो केन्द्र सरकार बिहार के विकास के लिए पैसा देना बंद कर देगी। इस प्रकार की बातें वे ही नौसिखिया कर सकता है जिसको भारत के संविधान की मूल भावना का ज्ञान न हो। यह एक प्रकार से संविधान के संघात्मक ढांचे पर प्रहार था। बिहार की जनता को श्रेय देना होगा कि उसने कांग्रेस की धौंस का सही उत्तर दिया और राहुल गांधी, सोनिया गांधी की साम्प्रदायिक रणनीति को करारा जवाब दिया। मुसलमान कांग्रेस की घेराबंदी में नहीं फंसे। यह प्रश्न नहीं है कि मुसलमानों ने किसको वोट दिया। सबसे महत्तवपूर्ण निष्कर्ष यह है कि उन्होंने वोट बैंक की शक्ल में कांग्रेस को समर्थन देने से इंकार करके कांग्रेस की साम्प्रदायिकता को पराजित किया। बिहार में मुसलमानों ने मुसलमानों की हैसियत में नहीं बल्कि एक आम नागरिक की हैसियत में जदयू को वोट दिया, भाजपा को वोट दिया, आरजेडी को वोट दिया, सीपीआई को वोट दिया और कांग्रेस को वोट दिया। कांग्रेस के लिए मुसलमान मतदाता का यह व्यवहार आश्चर्यजनक और चौंकाने वाला भी था। इस चुनाव में कांग्रेस नकारात्मक नीति को लेकर चल रही थी और सत्तााधारी गठबंधन सकारात्मक अपील कर रहा था। बिहार की जनता ने सकारात्मक को पहल दी और नकारात्मक को नकार दिया। बिहार चुनावों का परिणाम कांग्रेस की भावी रणनीति और राहुल गांधी को देश पर थोपने के तानाशाही प्रयासों के कफन में कील सिद्ध होगा।

भाजपा ने इन चुनावों में 102 सीटें लड़कर 91 सीटों पर विजय प्राप्त की है। निश्चय ही इससे भाजपा के समर्थकों को भी थोड़ा बहुत आश्चर्य हुआ है। लेकिन इसने सिद्ध कर दिया है कि भाजपा किसी वर्ग विशेष का दल न होकर सभी वर्गों का सांझा दल होकर उभर आया है। बिहार में 1975 में कांग्रेस के पराभव की गाथा लिखी थी और 2010 में उस गाथा पर एक बार फिर मुहर लगा दी है। जय प्रकाश नारायण के समग्र क्रांति आंदोलन ने, जो बिहार से प्रारंभ हुआ था, जनसंघ/भाजपा को जन-जन से जोड़ने का काम किया था। 2010 के चुनावों ने उस प्रक्रिया को बहुत आगे बढ़ा दिया है। भाजपा को इस प्रक्रिया को जीवन्त रखना होगा और यह प्रयोग देश के अन्य भागों में भी करना होगा।

One Response to “बिहार के चुनावों से उभरे संकेत”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *