डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
भारत में सोशल मीडिया पर एक सन्देश तेजी से फैल रहा है। इसमें दावा किया जा रहा है कि अमेरिकी ‘डीप स्टेट’, सीआईए और विपक्ष मिलकर ‘ऑपरेशन 37’ चला रहे हैं। इसका उद्देश्य बताया जाता है कि 12 महीने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार गिरायी जाए लेकिन अब तक इस दावे के पक्ष में कोई स्वतंत्र, प्रामाणिक या न्यायिक साक्ष्य सामने नहीं आया है।
दावा क्या है? :
वायरल सन्देश में कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने सीआईए और ‘डीप स्टेट’ को मोदी सरकार हटाने के लिए 12 महीने का समय दिया है। इस योजना के तीन हथियार बताये गये हैं—डिवीजन, डायवर्सन और डिसेप्शन।
दावा यह भी है कि इसका लक्ष्य भाजपा के कम से कम 37 सांसदों को तोड़ना है। इसके लिए टैरिफ, आरक्षण, किसान आन्दोलन, भाषा विवाद और धार्मिक मुद्दों का इस्तेमाल होने का आरोप लगाया गया है।
सन्देश में आगे कहा गया है कि यदि सरकार गिराने में सफलता नहीं मिलती तो प्रधानमंत्री पर जानलेवा हमले की कोशिश भी की जा सकती है। यह अत्यन्त गम्भीर आरोप है परन्तु इतने बड़े आरोप के लिए उतना ही बड़ा और प्रामाणिक सबूत चाहिए।
दावा कहाँ से आया?
‘ऑपरेशन 37’ का मुख्य स्रोत गोवा के भाजपा नेता और ‘गोवा क्रॉनिकल’ के संस्थापक सेवियो रॉड्रिग्स का बयान है। उन्होंने दावा किया था कि सीआईए को 12 महीने का समय दिया गया है और योजना का लक्ष्य भाजपा के 37 सांसदों को तोड़ना है।
यह दावा बाद में व्हाट्सएप, यूट्यूब और सोशल मीडिया पर विस्तार से फैलाया गया। ‘डिवर्जन, डिसेप्शन और डिवीजन’ जैसे शब्दों को एक भव्य षड्यंत्र-कथा का रूप दे दिया गया।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके पक्ष में कोई आधिकारिक दस्तावेज, गुप्तचर एजेंसी की पुष्टि, न्यायालय का निर्णय या स्वतंत्र पत्रकारीय सबूत उपलब्ध नहीं है। तथ्य-जाँच रिपोर्टों का निष्कर्ष भी यही है कि इस नाम से कोई समन्वित साजिश स्थापित नहीं हो पायी है।
‘37’ का गणित कितना सही?
दावा है कि भाजपा के 37 सांसदों यानी लोकसभा सदस्यों को तोड़कर सरकार गिरायी जा सकती है। यह संख्या लोकसभा के बहुमत के गणित पर आधारित लगती है, परन्तु सांसदों को ‘तोड़ने’ का आरोप लगाना और उसका प्रमाण देना दो अलग बातें हैं।
भारत में सरकार गिराने का संवैधानिक मार्ग स्पष्ट है—लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव। इसके लिए संसद के भीतर संख्या, मतदान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया चाहिए। बिना सबूत के हर राजनीतिक विरोध को विदेशी षड्यंत्र कह देना लोकतंत्र की बहस को कमजोर करता है।
हरीश साल्वे का स्पष्ट रुख :
पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध चल रहे विरोध और उन्हें हटाने की माँग पर सवाल उठाये हैं। उन्होंने इसे ‘शुद्ध मूर्खता’ कहा और कहा कि आरोपों की जाँच संवैधानिक तथा न्यायिक प्रक्रिया से होनी चाहिए।
साल्वे के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब माँगा है। अदालत अभिलेख देखेगी और तय करेगी कि कोई अनियमितता हुई या नहीं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट सीधे सीईसी को पदच्युत नहीं कर सकता।
इसका अर्थ यह है कि सीईसी पर उठे सवाल गम्भीर हो सकते हैं पर उन्हें ‘ऑपरेशन 37’ सिद्ध करने का सबूत नहीं बनाया जा सकता। आरोप और सिद्ध षड्यंत्र में बड़ा अन्तर होता है।
सीईसी विवाद का असली मुद्दा :
सीईसी ज्ञानेश कुमार पर विवाद मुख्य रूप से विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), मतदाता सूची, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कुछ निर्णय अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिये गये।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और केन्द्र से जवाब माँगा है। कोर्ट ने इस स्तर पर सीईसी को निलम्बित करने से इनकार किया है और किसी अनियमितता का निष्कर्ष भी नहीं दिया है।
यह मामला लोकतांत्रिक जवाबदेही का है। इसे जनता के सामने रखा जा सकता है, अदालत में चुनौती दी जा सकती है, पर इसे बिना प्रमाण ‘विदेशी तख्तापलट’ से जोड़ना गलत है।
‘डीप स्टेट’ कथा की समस्या :
‘डीप स्टेट’ एक ऐसा शब्द है जिसे अक्सर बिना परिभाषा और बिना सबूत इस्तेमाल किया जाता है। इसके जरिये हर विरोध, हर आलोचना और हर असहमति को ‘देशद्रोह’ या ‘विदेशी हस्तक्षेप’ बता दिया जाता है।
यह तरीका राजनीतिक रूप से फायदेमन्द हो सकता है, पर बौद्धिक रूप से कमजोर है। इसमें सबूत की जगह भय, सन्देह और साम्प्रदायिक भावना को हथियार बनाया जाता है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि वायरल सन्देश में ‘मुसलमान’, ‘वामपन्थी’, ‘मिशनरी’ और ‘राष्ट्र-विरोधी’ जैसे व्यापक वर्गों को एक ही षड्यंत्र में जोड़ दिया गया है। यह तथ्य नहीं, सामाजिक विभाजन की राजनीति है।
मीडिया की जिम्मेदारी :
डीडी न्यूज़ जैसे सार्वजनिक प्रसारण माध्यम की जिम्मेदारी सन्तुलित, तथ्यपरक और सटीक समाचार देने की है। ‘डिकोड’ जैसे कार्यक्रमों में यह जरूरी है कि दावे और सबूत में अन्तर स्पष्ट रखा जाए।
किसी व्यक्ति का दावा खबर बन सकता है, पर वह खुद सबूत नहीं बन जाता। जब तक स्वतंत्र पुष्टि न हो, ‘ऑपरेशन 37’ को ‘दावा’ कहना उचित है, ‘तथ्य’ नहीं।
भारत को क्या चाहिए?
भारत को विदेशी हस्तक्षेप के वास्तविक खतरों से सतर्क रहना चाहिए। परन्तु उसका उत्तर भ्रम फैलाना नहीं, संस्थाओं को मजबूत करना, चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना और नागरिकों को सूचना की सटीक परख करना है।
लोकतंत्र में सरकारें वोट से बनती हैं और वोट से बदलती हैं। किसी सरकार की आलोचना करना राष्ट्र-विरोध नहीं है और बिना प्रमाण षड्यंत्र फैलाना राष्ट्रभक्ति भी नहीं है।
भारत की असली ताकत उसका संविधान, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, स्वतंत्र मीडिया और जागरूक नागरिक हैं। इन्हीं को कमजोर करने की कोशिश वास्तव में देश के हित में नहीं है।
डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर