लेखक परिचय

किशोर बड़थ्वाल

किशोर बड़थ्वाल

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under राजनीति, विधानसभा चुनाव.


अंततः जैसा अपेक्षित था, आगामी माह में होने चुनावों के प्रपंच अपनी चरम सीमा पर पहुंचने लगे हैं, और इन सभी प्रपंचो का एक मात्र लक्ष्य सत्ता पर पहुंचना है. जो भारतीय समाज के लिये अनावश्यक और अवांछनीय है, क्योंकि सत्ता पर कोई भी पहुंचे उसका आचरण बदलने की संभावना असंभव लगती है.
राजनीतिक दलों के कार्यकलापों और उनके घोषणा पत्रों मे आज तक कोई भी साम्यता नही दिखाई दी, और यह बीमारी अब सभी दलों की जडों तक को सडा चुकी है. स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि विधान सभाओं मे संख्या बल प्राप्त करने के लिये धनबल, बाहुबल के साथ साथ समाज का विघटन करने वाली नीतियों की घोषणा चुनाव से पहले ही की जाने लगी हैं. राजनैतिक दलों मे वैचारिक शून्यता स्पष्ट दिखाई देती है. जिस विचार की घोषणा राजनैतिक दल करते हैं वह उनकी कार्यशैली मे कहीं भी नही दिखाई देता है, और जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है वह संख्या बल को प्राप्त करने की लिप्सा है जिसके लिये वह स्वयं के चारित्रिक गुणो और राष्ट्र, दोनो को रसातल मे पहुंचाने के लिये प्रतिबद्ध हैं. एक बार सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद यह दल फिर से राष्ट्रजीवन के सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक विकास के स्थान पर स्वयं के भी मात्र आर्थिक विकास मे जुट जायेंगे.
चुनाव की पद्धति यदि ठीक ना भी मानी जाये, और शासक वर्ग को भ्रष्ट बताया जाये, तो भी दोष मात्र शासक वर्ग का नही है, भारतीय जनमानस सत्ताओं मे अपना भय व्याप्त करने मे पूरी तरह विफल रहा है. सत्ता मे बैठा अधिकांश वर्ग जानता है कि उसे चुनौति देने और उखाड फैंकने वाला कोई कारक फिलहाल अस्तित्व मे आने वाला नही हैं. जो वोट देने की शक्ति सामान्य व्यक्ति के पास है उस से वह सत्ता मे विद्यमान व्यक्ति को बदल तो सकता है किंतु उस के आचरण पर प्रभावी दबाव नही डाल पाता, और इस प्रकार के दबावों के अभाव ही सत्ताधारियों को निरंकुश बनाते हैं. परिणाम यह है कि व्यक्ति यदि सत्ता मे है तो बिना किसी भय के वह आर्थिक घोटाले करता है (राष्ट्रमंडल खेल घोटाला), सामाजिक व्यभिचार करता है (भंवरी देवी प्रकरण), अपव्यय करता है (मूर्ति व पार्कों के निर्माण), राष्ट्र सुरक्षा से समझौता करता है (बोफोर्से कांड), गलत नीतियां बनाता है (बढती महंगाई) और वोटर निःसहाय देखता रहता है. उच्च वर्ग पर इन चीजो से प्रभाव नही पडता बल्कि उसे इसका लाभ मिलता है. मध्यम और निम्न वर्ग का दोहन किया जाता है, और स्थिति यह हो गयी है कि यह वर्ग अब वोट देने से कतराने लगा है. वह या तो वोट देने नही जाता और यदि उसे कहा जाये तो वो प्रश्न करता है कि “किसे दूँ?” मध्य वर्ग का यह प्रश्न राजनैतिक दलों के लिये एक गंभीर चुनौति है, यदि वोटर सबको एक समान समझता है तो यह राजनैतिक दलों की विफलता है कि वह अपने आप को अन्य दलों से अलग प्रदर्शित नही कर पाये और जनता के सामने एक विकल्प के रूप मे नही उभर सके.
९० के दशक तक राजनीति का इतना अधिक विकृत चेहरा शायद संचार माध्यमों की सीमितता के कारण उजागर नही हो सका था. बाद मे विकसित हुए संचार माध्यमो पर चलने वाले समाचार चैनलों को पहले राजनीतिज्ञों ने अपने प्रचार प्रसार का साधन बनाया (जो कि अभी तक निरंतर है), किंतु क्योंकि यह संचार माध्यम किसी ना किसी एजेंसी द्वारा संचालित होते थे तो इन पर सत्तायें दबाव बनाये रख सकती थी, चाहे वो विभिन्न मंत्रालयों के विज्ञापनों के मोटे भुगतान द्वारा अनुग्रहित कर, या किसी अन्य प्रक्रिया के द्वारा, (जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण व्यवसायिक घरानो, राजनीतिज्ञों और पत्रकारों की बातचीत मे भी मिला कि किस प्रकार एक संपूर्ण प्रणाली राष्ट्र के स्थान पर स्वयं के विकास मे लिप्त है.) किंतु धीरे धीरे यह संचार माध्यम लोगो मे उन घोटालों को भी पहुंचाने लगे, जिसकी अपेक्षा राजनीतिज्ञों को कभी नही थी. और इसमे तीव्रता तब आई जब इंटरनेट और मोबाइल जैसे साधन भी लोगो को उपलब्ध हो गये. यह दो माध्यम ऐसे थे जिस पर किसी का भी नियंत्रण नही था, मध्यम वर्ग इसका उपयोग बहुतायत से करने लगा था. सत्ताओं ने इन्हे उपलब्ध कराया (उसमे भी करोडों का गोलमाल किया गया), और लोगो को आपस मे संवाद करने का एक विकल्प मिला, धीरे धीरे यह माध्यम भस्मासुर होने लगे. जो मध्यम वर्ग पिछले कई वर्षों से पीडित था और जिस पीडा को वह ना तो दूसरों को बता पाता था और ना ही पुराने संचार माध्यम उसकी आवाज को कभी सत्ता के कानो तक पहुंचाते थे,वह अपनी समस्याओं को एक दूसरे के साथ बांटने लगा और उसे पता चला कि वह अकेला नही है बल्कि सत्तायें पूरे समाज को मूर्ख बना रही हैं.
इन माध्यमों ने घटनाओं को तेजी से फैलाना शुरु किया, डा० सुब्रमण्यम स्वामी ने जब घोटालों को प्रकट किया तो सभी राजनैतिक दल इस अवसर का भरपूर लाभ उठा सकते थे, किंतु उसके लिये जो शुचिता और पवित्रता विचारों और कार्यों मे होनी चाहिये थी वह कोई दल नही दिखा सका और ना ही कोई दल स्वयं को विकल्प के रूप मे प्रस्तुत कर सका. भ्रष्टाचार के प्रकटीकरण के बाद उसके विरोध करने के लिये किसी के भी उपलब्ध ना होने का सबसे अधिक लाभ इंडिया अगेन्स्ट करप्शन ने उठाया और स्वयं को भ्रष्टाचार के विरोध करने वालों मे अग्रणी स्थान पर ला खडा किया. आरंभिक सफलता के अति-उत्साह और उससे उत्पन्न अहंकार, अदूरदर्शी निर्णय, गलत विचारधारा के लोगो का साथ और आवश्यकता से अधिक अस्पृश्यता ने उनके आंदोलन को धीरे धीरे कमजोर करना शुरु किया. पेज के एडमिन शिवेंद्र सिंह चौहान जी ने एक साक्षात्कार मे कहा कि अन्ना टीम का पेज यूजर कंटेंट के द्वारा चलता है और यूजर उस पर अपने विचारों को रखता है, किंतु बाद मे स्थिति यह हो गयी कि जिस अन्ना टीम के फेसबुक पेज पर भ्रष्टाचार के समाचार लगातार अपडेट होते रहते थे और जहां लोग अपने विचारों और पीड़ाओं को रखते थे उस पेज पर अन्ना टीम ने क्या कहा, क्या किया, समर्थन मे कहां जुलूस निकला, कहां हस्ताक्षर हुए, कहां पोस्टर लगे जैसे समाचारों का आधिपत्य हो गया. वह यह तक नही समझ सके कि दिल्ली का व्यक्ति चेन्नई मे निकले जुलूस की सूचना पा कर क्या करेगा या उस पर अपने विचार और पीडा को क्यों प्रकट करेगा? जो पेज परस्पर संवाद का था वह एक सूचना पट्ट मे परिवर्तित हो गया (वैसे यह स्थिति अब पिछले कुछ दिनों से फिर बदलने लगी है) और राजनैतिक दलों पर दबाव बनाने का जो एक प्रयास था वह अदूरदर्शिता के कारण धीरे धीरे कमजोर होता चला गया.
मुख्य समस्या यह है कि हमें एक ऐसी प्रणाली चाहिये जिसके द्वारा सत्ताओं मे आम जनमानस का भय उत्पन्न किया जा सके. इसके विकल्प मे राइट टू रिजैक्ट, राइट टू रिकॉल जैसी व्यवस्था की बात की जाती है, किंतु यह संवैधानिक व्यवस्थाये हैं, और कोई सत्ता ऐसे भस्मासुर को जन्म लेने देगी यह फिलहाल अकल्पनीय है, और यदि सत्ता परिवर्तन किया जाता है तो वो मात्र व्यक्ति परिवर्तन ही होगा, आचरण और क्रिया कलापों मे कोई परिवर्तन आने की संभावना बहुत क्षीण है. नई पार्टी का गठन करने का प्रयास शायद ही कोई करे.
मुझे लगता है यदि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र मे १५-२० ऐसे व्यक्ति, जो किसी भी प्रकार की राजनैतिक गतिविधियों से अलिप्त हो, को मिलाकर एक प्रभावी समूह (pressure group) बनाया जाये जो अपने क्षेत्र के विधायक को उसके अधिकारों और दायित्वो के प्रति बोध दिलाता रहे और प्रत्येक दो मास के अंतराल पर क्षेत्र के विकास के लिये किये गये नेता के प्रयासों के बारे मे पूछताछ और उसके द्वारा दी गयी जानकारी पर उसकी जांच कर सके (जांच का अर्थ मात्र उसके द्वारा किये गये विकास कार्यों को देख सके) और असत्य होने की स्थिति मे उस पर दबाव डाल सके (चाहे वह दबाव उसके द्वारा बताये गये झूठ को इंटरनेट पर डालना हो या फिर स्थानीय समाचार पत्रों मे छपवाना हो) तो इस प्रकार की नियमित पूछताछ द्वारा जनप्रतिनिधियों पर आवश्यक दबाव और नियंत्रण बनाया जा सकेगा, जिस से कम से कम वह क्षेत्र के विकास पर ध्यान दे सके. इसके अतिरिक्त जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है, कई बार स्थिति यह होती है कि जन प्रतिनिधियों को पता ही नही होता कि क्षेत्र मे काम कराने के लिये उसे किस प्रकार से प्रोसेस करना है.
इस प्रकार के समूह बनाने के लिये कोई औपचारिकताओं की आवश्यकता भी नही है और ऐसे समूहों का निर्माण करना समय की आवश्यकता और सबसे सुलभ भी है. आखिर जब राजनैतिक दल और इंडिया अगेन्स्ट करप्शन जैसे समूह नगर स्तर तक अपने कैडर बना सकते हैं तो फिर इस देश के ईमानदार और निष्पक्ष व्यक्ति ऐसा क्यों नही कर सकते..

2 Responses to “राजनैतिक शून्य और विकल्पहीनता..”

  1. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    “आखिर जब राजनैतिक दल और इंडिया अगेन्स्ट करप्शन जैसे समूह नगर स्तर तक अपने कैडर बना सकते हैं तो फिर इस देश के ईमानदार और निष्पक्ष व्यक्ति ऐसा क्यों नही कर सकते..”

    एक विचारोत्तेजक आलेख!

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
    संपादक प्रेसपालिका (हिंदी पाक्षिक)

    Reply
  2. SANDEEP UPADHYAY

    राजनीती में अब कुर्शी हथियाने के सिवा कुछ भी नहीं बचा है , सिर्फ लालच देकर कुर्सी पाकर राज करना चाहते है , लगता है लैपटॉप राजनीती की सुरुवात हो गयी है…

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *