प्रकृति की मौलिकता

poetry दो-दो फुट दिन में जुड़वा दें, दो फुट की बढ़वा दें रात|

किसी तरह से क्यों न बापू, बड़े-बड़े कर दें दिन रात|

छोटे-छोटे दिन होते हैं, छोटी-छोटी होती रात|

ना हम चंदा से मिल पाते, ना सूरज से होती बात|

नहीं जान पाते हैं अम्मा, क्या होती तारों की जात|

ना ही हमें पता लग पाता, अंबर की कितनी औकात|

मां बोली ईश्वर की रचना, सुंदरतम अदभुत सौगात|

कभी नहीं दे पायेंगे हम, उसकी मौलिकता को मात|

बापू बोले सदा प्रकृति ने, हमको दिया समय पर्याप्त|

हम ही ना सूरज चंदा को, तारों को कर पाते ग्यांत|

एक-एक पल है उपयोगी, एक-एक कण है सौगात|

यदि समय श्रम का नियमन हो, हम सब कुछ कर सकते प्राप्त|

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