लेखक परिचय

संजय स्‍वदेश

संजय स्‍वदेश

बिहार के गोपालगंज में हथुआ के मूल निवासी। किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातकोत्तर। केंद्रीय हिंदी संस्थान के दिल्ली केंद्र से पत्रकारिता एवं अनुवाद में डिप्लोमा। अध्ययन काल से ही स्वतंत्र लेखन के साथ कैरियर की शुरूआत। आकाशवाणी के रिसर्च केंद्र में स्वतंत्र कार्य। अमर उजाला में प्रशिक्षु पत्रकार। दिल्ली से प्रकाशित दैनिक महामेधा से नौकरी। सहारा समय, हिन्दुस्तान, नवभारत टाईम्स के साथ कार्यअनुभव। 2006 में दैनिक भास्कर नागपुर से जुड़े। इन दिनों नागपुर से सच भी और साहस के साथ एक आंदोलन, बौद्धिक आजादी का दावा करने वाले सामाचार पत्र दैनिक १८५७ के मुख्य संवाददाता की भूमिका निभाने के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़ाव। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ लेखन कार्य।

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 संजय स्वदेश

किसी न किसी बहाने देश में हुए दंगों को लेकर आए दिन राजनीति गर्म होती है। गत एक सप्ताह में गुजरात दंगों को लेकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस ने सबसे तीखा हमला बोलते हुए देश के बाकी हिस्सों में 2002 के दंगे दोहराने की मंशा रखने का आरोप लगाया। इस बयान की राजनीति अभी शांत ही नहीं हुई थी कि दिल्ली में 1884 के सिक्ख विरोधी दंगों पर अभी सियासत चल रही है। पानी के बुलबुले की तरह दंगे की सियायत उठती है और एक दो दिन में खत्म हो जाती है। इस सियासत में कभी कही दंगों के दंश झेले लोगों की दशा और दिशा सुध नहीं ली गई। दंगा चाहे किसी भी मजबह या समाज से जुड़ा हुआ हो, इसके पीड़ितों की टीस ताउम्र बनी रहती है। जब वर्षों बाद सामाजिक सरोकारों में व्यस्त होकर इसके पीड़ित अपना दर्द भूल जाते हैं, तब ऐसी राजनीतिक बयानबाजी उनके दर्द का खरोच देती हैं। इस टीस को खत्म करने के लिए न कोई सामाजिक पहल है और न ही कोई राजनीतिक दृढ़ता। देश की सियासत में दंगों के दंश को आरोप-प्रत्यारोप की ऐसी राजनीति हमेशा चलती रहेगी। लेकिन इस राजनीति से अलग देश की में दंगे की एक दूसरी ही हकीकत है। गत कुछ वर्षों के आंकड़े देखे तो देश के किसी न किसी हिस्से में हर दिन औसतन दो दंगे होते हैं। इसमें हर महीने औसतन 11 लोग मारे जाते हैं। हालांकि ऐसे ज्यादातर दंगे लंबे समय तक नहीं चलते हैं, जिससे यह राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में भी नहीं आ पाते हैं। देश भर में पिछले तीन साल में सांप्रदायिक हिंसा के 2,420 मामले सामने आए जिसमें कम से कम 427 लोगों की मौत हो गई। इन आंकड़ों औसत के आधार पर देश में किसी न किसी हिस्से में हर दिन दो सांप्रदायिक हिंसा हो रहे हैं। इस हिंसा में हर माह करीब 11 लोग मौत के घाट उतर रहे हैं। घायलों की संख्या अलग है। गृह मंत्रालय के आंकड़ोंं के मुताबिक वर्ष 2012 के अगस्त तक सांप्रदायिक हिंसा के 338 मामले सामने आए थे, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई, जबकि 1,059 लोग घायल हुए। उसके बाद भी देश में और दंगे हुए। लोग मारे गए। बच्चे यतीम हुए। महिलाएं बेवा हुर्इं। वे अभी किस तरह जिंदगी गुजर बसर कर रहे होंगे, यह सोचने की किसे फुर्सत है।
गृह मंत्रालय मानता है कि केंद्र सरकार के लिए सांप्रदायिक हिंसा प्रमुख चिंता का विषय बन गया है। संबंधित राज्य सरकारों को इस तरह की घटनाओंं से सख्ती से निपटने की सलाह भी दी गई है, क्योंकि सांप्रदायिक हिंसा का समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। लेकिन सरकार के नेतृत्व थामने वाले किसी न किसी रूप में सांप्रदाय के दामन में राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करते हैं। लिहाजा, उनकी कथनी और करनी में फर्क होना सहज है। यदि यह फर्क नहीं होता तो 2010 में सांप्रदायिक हिंसा की 651 घटनाओं में 114 लोगों की मौत नहीं होती। 2010 में देश भर में हुए 114 दंगों में 2,115 व्यक्ति घायल हो गए। 2009 में दंगे की 773 घटनाओं में 123 लोगों की मौत हो गई जबकि 2,417 लोग घायल हुए। 2008 में ऐसे 656 केस दर्ज हुए, जिसमें 123 लोगों की मौत हो गई जबकि 2,270 लोग घायल हुए।
आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि देश भर में होने वाले दंगे केवल राजनीति से ही प्रेरित नहीं होते हैं। इसकी प्रवृत्ति समाज में नश में रच बस गई है। निश्चय ही समाज के रंगों में बहता यह जहर राष्ट्र के लिए घातक है। राष्ट्रीय स्तर के अनेक ऐसी हिंसक घटनाओं के कारण देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा है। उसका दंश आज भी समाज के सैकड़ों लोग भोग रहे हैं।
काल मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा दी थी। मतलब यह है कि धर्म के प्रति लोगों की अस्था ही हद नसेड़ी की अफीक की नशा की तरह है, जो हर कीमत पर नशा नहीं त्यागना चाहता है, भले ही वह उसे भीतर ही भीतर खोखला क्यों नहीं करती हो। समाज की इसी कमजोरी को हर समुदाय के कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ को साधने का हथियार बनाया। भले ही इसकी बेदी पर सैकड़ों मासूमों के खून बह गए, पर क्रिया के विरुद्ध प्रतिक्रिया आदि तर्कों के नाम पर उन्नमाद के इस जहर को रोकने के लिए समाज की ओर से कोई ठोस पहल की अभी भी दरकार है। केवल धर्मनिरपेक्षता के ढोंग और कठोर कानून से काम नहीं चलेगा। विषय पर गंभीर चिंतन की जरूरत है। हर कारणों की पड़ताल भी जरूरी है। देखें और परखे, कहां चूक हो रही है। नियम-कानून और शिक्षा से समाज के नशे से स्रांप्रदायिक हिंसा के जहर को तुरंत नहीं निकाला जा सकता है। ऐसी घृणित मानसिकता हर समाज के हर पीढ़ी को विरासत में चलती रहती है। दिलो दिमाग में एक संप्रदाय विशेष के प्रति जड़ जमा चुकी नफरत की आग धीरे-धीरे बूझेगी। नहीं तो समय-समय पर दंगों पर होने वाली सियायत पीड़ितों के भूले दर्द को फिर से खरोच रहेगी। ाब तक समाजिक और राजनीतिक स्तर पर दंगे के वर्षों बाद तक पीड़ितों के दिल में उठने वाली टीस को समझने और उसे दूर करने की पहल नहीं होगी। बदले और घृणा की आग एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तो चलती रहेगी।

One Response to “दर्द खरोचती दंगे की सियासत”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    Jb तक कुछ लोग अपने धर्म को सबसे अच्छा और सच्चा बताकर दुसरे लोगो से नफरत करते रहेंगे तब तक सरकार अकी उनको नही रोक पाएगी. Abhi तो खुद सरकार ही ऐसे में पार्ट बन जाती hai.

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