परशुराम की सेना

—विनय कुमार विनायक
तेरी महिमा अपरंपार
कौन पाएतुमसे पार
चाटुकार से करते प्यार
स्वाभिमानी को देते मार
बिना उठाए ही हथियार
सेना रखते तुम तैयार!

कभी वाहिनी थी तेरी
वीर क्षत्रियों की शान
उनके बल पर उनके
ही हरते थे तुमप्राण
पकड़ी गई जब मंशातेरी
उलट गई उनकी कृपाण!

किंतु संयुक्त पुरोहित थे
तुमइनके और उनके
दोस्त के और दुश्मन के
सबके संयुक्त सलाहकार!

ले कमंडलु इधर मुड़े
ले कमंडलु उधर उड़े
मन से तुम इनके थे
तन से तुम उनके थे!

लेकिन प्यासे तुम थे
दोनों ही के, खून के
इनके कान में उनको
उनके कान में इनको
दिए थे मुहूर्त विचार!

दोनों आमने-सामने
योद्धा लड़ने कोतैयार
पक्ष-विपक्ष हो गए थे
आमने-सामने होकर
मरने को तैयार!

ऐसे पछाड़ा था तुमने
वाह! वाह! पछाड़ा तुमने
बेहथियार पछाड़ा तुमने!

इनको औ’ उनको
दोनों ही, दोनों को
हर बार, बार-बार,
लगातारइक्कीसबार
क्षत्रिय किया संहार!

वीर क्षत्रियों का संहार
छोड़ दी उसने तलवार
छोड़ा उसने राज दरबार
अपनाया वाणिज्य-व्यापार
वर्णांतरणकिया स्वीकार
तन के थके मन के हारे
क्षत्रियत्व ने तहेदिल से
तुमसे मानी थीहार!

किन्तुतुम्हें चाहिए था
फिर से एकनव सहारा
किन्तु तुम्हें चाहिए था
आज्ञाकारीएकशिष्य
आंखों का तारा!

किन्तु तुम्हें चाहिए था
नव यजमान प्यारा
किन्तु तुम्हें चाहिए था
एक नया ध्रुव तारा
किन्तु तुम्हें चाहिए था
नव सैनिक करारा!

तेरी तलाश मिटी
मन का मुराद पाया
संघर्ष चला था देसी राजे
औरविदेशी शक-हूण में
क्या बुरा या भला था
संघर्ष के धूनमें!

पर क्रूर विदेशी ढला था
स्वदेशी-स्वत्व-स्वगुण में
उनका रक्त पला थाविजित
राजबालाओंके भ्रूण में
एक नव लाल मिला सना
भारत को अपने ही खून में!

जन्म संस्कार किया तुमने
नाम राजपूत दिया तुमने
उपनयन संस्कार किया तुमने
द्विजत्व उपहार दिया तुमने
बहुत दुलार किया तुमने!
—विनय कुमार विनायक

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

17,157 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress