पति-पत्नी परस्पर विश्वास बनाएं

                *केवल कृष्ण पनगोत्रा

बात वर्ष 2002 की है। न्यायालय में अपील के रूप में एक मामला आया था। (संदर्भ: जी.वी.एन कामेश्वर राव प्रति जी.जाबिली-2002) इस मामले में पति-पत्नी ने एक दूसरे पर निर्दयतापूर्ण व्यवहार के आरोप लगाए थे। पति गणित में डॉक्टरेट प्राप्त थे व पत्नी होम सांईस में एम.ए थी।
इस मामले में निश्चित रूप से एक सवाल पैदा होता है कि आखिर पति-पत्नी के बीच निर्दयतापूर्ण क्या है? इस सवाल पर स्पष्ट रूप से कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती क्योंकि परिवारिक जीवन की विभिन्न परिस्थितियां निर्दयतापूर्ण व्यवहार को किन्हीं निर्धारित शब्दों में बांधने से दूर रखती हैं। भाव यह हुआ कि सामाजिक, आर्थिक और परिवारिक परिस्थितियां ही निर्दयता के व्यवहार का पैमाना मानी जा सकती हैं।
दाम्पत्य जीवन के छोटे-मोटे झगड़े जिनका आधार और नीयत सकारात्मक हो, निर्दयता के दायरे में नहीं आते। जबकि वह झगड़े जिनका आधार नकारात्मक हो और परस्पर दंभ, अहंकार और एहसान की पुष्टि करते हों, निर्दयता के दायरे में शामिल किए जा सकते हैं।
दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। वर्तमान दौर में पति-पत्नी के बीच झगड़े और तनाव को मुख्यतः उन परिवारों में ज्यादा है जहां पत्नी कामकाजी और नौकरीपेशा है या पत्नी के मायके वाले आर्थिक तौर पर सशक्त और प्रभाशाली होते हैं। कई बार लड़की वाले लड़के की परिवारिक, आर्थिक और सामाजिक जटिलताओं को समझे बगैर ही बेटी के घर में बेटी के ही माध्यम से सलाहकार का काम करना शुरू कर देते हैं। लड़के की घरेलू,सामाजिक एवं आर्थिक दशा उसे ससुराल के मशवरों पर चलने से रोकती है। ऐसी सूरत में पति को मायके के मशवरों पर चलाने की जिद्द पत्नी की ओर से पति के प्रति निर्दयता का व्यवहार होगा। चूंकि पति अपने समाज, परिवार और रिश्तों के प्रति उत्तरदायी होता है और ससुराल के मशवरे किन्हीं अपरिहार्य कारणों से प्रासंगिक नहीं रहते। ऐसी हालत में पत्नी के असहयोग से झगड़े गंभीर रूप ले लेते हैं।
इसी प्रकार कई बार लड़के वाले लड़की वालों से आर्थिक या किसी भी रूप में प्रभावशाली होते हैं। ऐसे में पति अपनी पत्नी की भावनाओं की उपेक्षा करता है। पति यह समझने लगता है कि पत्नी का कहना मानने से उसे दब्बू कहा जाएगा। अत: वह अपने दंभ को क्षत-विक्षत होते नहीं देखना चाहता। कई बार पत्नी की सकारात्मक भावनाओं को दबाना पति की ओर से पत्नी के प्रति निर्दयता होगी। इस प्रकार की परिस्थितियों में दोनों के बीच पूरक होने की भावनाएं आहत होती हैं।
तो फिर क्या किया जाए?
*पति-पत्नी परस्पर विश्वास बनाएं। परिवारिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थतियों के अनुसार व्यावहारिक जीवन जीना सीखें। बाह्य और फालतू बातों से बचें। सफल दाम्पत्य जीवन बसर कर रहे लोगों से नजदीकी बनाएं और उनके विचारों को आत्मसात करें।
*एक-दूसरे की भावनाओं के प्रति संवेदना प्रकट करें। अपना-अपना पक्ष दंभ के बजाए आदर और प्रेम से रखें। अहं को पुष्ट न होने दें व यथासम्भव समझौता करने की आदत बनाए।
*पति को चाहिए कि दूसरों की बातों में न आए और पत्नी को चाहिए कि भावनात्मक तौर पर मायके के बजाए पति को अधिकाधिक स्थान दे। मायके की समस्याओं में न उलझें। यदि परिस्थितियां बन जाएं तो पति को भी विश्वास में लेना जरूरी समझें।
*यदि मायके की आर्थिक स्थिति अच्छी है तो पति से बार-बार चर्चा न करें। पति को भी चाहिए कि यदि ससुराल वाले आर्थिक तौर पर कमजोर हैं तो बेवजह उसका उल्लेख नहीं करना चाहिए।
*मायके में यदि पति साथ हैं तो पत्नी ध्यान रखे कि पति वहां पर अकेला और बोर महसूस न करें। ध्यान रहे कि मजाक के नाम पर ताने-उलाहने न दिए जाएं।
*मायके में बहनों आदि को सावधान करें कि हास्य-विनोद में सास-ससुर, ननद-देवर एवं जेठ-जेठानी जैसे रिश्तों के प्रति आपत्ति जनक शब्दों का प्रयोग न करें। ऐसा करने से पति का मन ससुराल जाने से बिदक सकता है।
*यदि छोटी-मोटी खींचतान हो भी जाती है तो जल्दी से ही निपटाने की कोशिश करें। लम्बी जिद्द से तनाव बढ़ सकता है। मायके के लिए अधिक बहस न करें।
*मायके के मामले में पति को न उलझाएं। जरूरत पड़े तो विश्वास करें। पत्नी यह उम्मीद न करे कि पति मायके के वकील हैं।
ऐसी कई परिस्थितियां होती हैं जहां विवेक की जरूरत होती है। पति-पत्नी के रिश्ते में संवाद और हालात को सीमा में नहीं बांधा जा सकता, अत: विवेक ही हालात को साजगार बनाने में महत्ती भूमिका निभाता है।•

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