लेख

नौतपा की तपिश में तपता व्यक्तित्व निर्माण

गजेंद्र सिंह

इन दिनों देशभर में नौतपा चल रहा है। सूर्य की प्रखर किरणें धरती को तपाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। उत्तर भारत से लेकर राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक तापमान 45-48 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच चुका है। आम जनजीवन प्रभावित है, लोग दोपहर के समय घरों में रहने को विवश हैं और विद्यालयों में ग्रीष्मावकाश चल रहा है लेकिन इसी तपती ऋतु में एक ऐसा संगठन है जो अपने सबसे महत्वपूर्ण कार्य कार्यकर्ता निर्माण में पूरी ऊर्जा के साथ जुटा हुआ है। यह संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो प्रतिवर्ष ग्रीष्मकाल में अपने प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन करता है।

नागपुर मुख्यालय सहित देश के विभिन्न राज्यों में  इन दिनों संघ शिक्षा वर्ग और कार्यकर्ता प्रशिक्षण वर्ग आयोजित किए जा रहे हैं । राजस्थान क्षेत्र में कुल 14 प्रशिक्षण वर्गों में लगभग दो हजार स्वयंसेवक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इनमें विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और व्यवसायी स्तर के विद्यार्थियों के लिए संघ शिक्षा वर्गों के साथ-साथ घोष प्रशिक्षण वर्ग भी संचालित हो रहे हैं । इसके अतिरिक्त क्षेत्र स्तर पर कार्यकर्ता प्रशिक्षण वर्ग प्रथम का आयोजन किया जा रहा है। वहीं देशभर के चयनित कार्यकर्ताओं के लिए नागपुर में कार्यकर्ता प्रशिक्षण वर्ग द्वितीय आयोजित हो रहा है जिसमें लगभग एक हजार प्रशिक्षार्थी और प्रशिक्षण दल के सदस्य सहभागी हैं ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति, अनुशासन और संगठन क्षमता लंबे समय से समाज में जिज्ञासा का विषय रही है। अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि सामान्य परिवारों से आने वाले स्वयंसेवक किस प्रकार समाज और राष्ट्र जीवन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले कार्यकर्ता बन जाते हैं। प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक अभियानों, सेवा कार्यों अथवा राष्ट्रीय महत्व के विभिन्न विषयों पर संघ के स्वयंसेवकों की सक्रियता अक्सर दिखाई देती है। इसके पीछे वर्षों से विकसित होती एक सुव्यवस्थित प्रशिक्षण प्रणाली कार्य करती है जिसका केंद्र बिंदु व्यक्ति निर्माण है । संघ के प्रशिक्षण वर्गों में केवल कौशल या संगठनात्मक तकनीकों का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता बल्कि व्यक्ति के सर्वांगीण विकास को लक्ष्य बनाया जाता है। यहां व्यक्ति को शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टि से विकसित करने का प्रयास किया जाता है। यही कारण है कि संघ इन वर्गों को केवल प्रशिक्षण शिविर नहीं बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला मानता है।

प्रशिक्षण वर्ग की दैनिक दिनचर्या प्रातः 4:30 बजे से आरंभ होकर रात्रि 10:30 बजे तक चलती है। पूरे दिन का संचालन समयबद्ध संकेतों के माध्यम से होता है जिससे स्वयंसेवकों में अनुशासन और समय के प्रति सम्मान का भाव विकसित होता है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहां समय प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गया है, वहीं इन वर्गों में समय का प्रत्येक क्षण नियोजित होता है। शारीरिक प्रशिक्षण वर्ग का प्रमुख अंग होता है। प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल मिलाकर लगभग पांच घंटे शारीरिक गतिविधियां संचालित होती हैं। इनमें ध्वज प्रणाम, योग, व्यायाम, दंड संचालन, समता, खेल, संचलन तथा समूह आधारित विभिन्न गतिविधियां शामिल रहती हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ और सक्षम बनाना नहीं है बल्कि आत्मविश्वास, साहस, नेतृत्व, त्वरित निर्णय क्षमता और सामूहिक कार्यशैली का विकास करना भी है। जब कोई स्वयंसेवक सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में समूह के साथ मिलकर कार्य करता है, तब उसमें नेतृत्व के वे गुण विकसित होते हैं जो जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी उपयोगी सिद्ध होते हैं।

शारीरिक प्रशिक्षण के समान ही बौद्धिक प्रशिक्षण को भी विशेष महत्व दिया जाता है। प्रतिदिन लगभग छह घंटे अध्ययन, चिंतन और संवाद के लिए निर्धारित रहते हैं। प्रार्थना, एकात्मता मंत्र और गीतों के अभ्यास से दिन का वातावरण राष्ट्रभाव और सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत होता है। इसके पश्चात विभिन्न सत्रों में भारतीय संस्कृति, राष्ट्र जीवन, इतिहास, सामाजिक समरसता, सेवा कार्य, संगठन पद्धति तथा समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर चर्चा की जाती है । इन चर्चाओं की विशेषता यह होती है कि वे केवल भाषण आधारित नहीं होतीं बल्कि संवाद और सहभागिता पर आधारित होती हैं। वरिष्ठ प्रचारक, अनुभवी कार्यकर्ता और विषय विशेषज्ञ अपने विचार रखते हैं तथा स्वयंसेवकों को प्रश्न पूछने और चर्चा में भाग लेने का अवसर मिलता है। इससे उनमें वैचारिक स्पष्टता, तार्किक चिंतन और व्यापक दृष्टिकोण विकसित होता है।

संघ के प्रशिक्षण वर्गों की एक और महत्वपूर्ण विशेषता सामूहिक जीवन है। वर्तमान समय में व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद के बढ़ते प्रभाव के बीच ये वर्ग सामूहिकता का व्यवहारिक प्रशिक्षण देते हैं। यहां रहने, खाने, कार्य करने और सीखने की पूरी प्रक्रिया सामूहिक होती है। सभी स्वयंसेवक समान व्यवस्था में रहते हैं और किसी प्रकार के विशेषाधिकार का स्थान नहीं होता। इससे सहयोग, समन्वय और सामाजिक संवेदनशीलता का विकास होता है । सेवा और श्रम को भी संघ के प्रशिक्षण वर्गों में विशेष महत्व दिया जाता है। प्रतिदिन एक घंटे का समय श्रमदान के लिए निर्धारित रहता है। स्वयंसेवक सफाई, भोजन व्यवस्था, परिसर प्रबंधन तथा अन्य आवश्यक कार्य स्वयं करते हैं। यह व्यवस्था केवल श्रम की आवश्यकता पूरी करने के लिए नहीं होती बल्कि श्रम के सम्मान का संस्कार विकसित करने के लिए होती है। भारतीय परंपरा में श्रम को पूजा माना गया है और संघ के प्रशिक्षण वर्ग इस विचार को व्यवहार में उतारने का प्रयास करते हैं।

इन प्रशिक्षण वर्गों की सादगी भी उल्लेखनीय है। पूरा वर्ग स्वयंसेवकों के न्यूनतम शुल्क और आपस के सहयोग से संचालित होता है जहाँ  भोजन का प्रबंध  आसपास के गांवों, बस्तियों और मोहल्लों से एकत्रित  किया जाता है । वर्ग में सभी को केवल नाम और “भाईसाहब” के संबोधन से पुकारा जाता है। जाति, उपनाम, आर्थिक स्थिति अथवा सामाजिक पृष्ठभूमि का कोई महत्व नहीं होता। सभी स्वयंसेवक, वरिष्ठ कार्यकर्ता और प्रचारक एक साथ पंक्ति में बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं। यह व्यवस्था सामाजिक समरसता का एक व्यवहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है । पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता भी इन वर्गों में दिखाई देती है। प्लास्टिक और डिस्पोजेबल सामग्री का उपयोग नहीं किया जाता। प्रशिक्षणार्थी अपने साथ थाली, कटोरी और चम्मच लेकर आते हैं और उसी का उपयोग करते हैं। यह व्यवस्था भारतीय जीवन शैली की सादगी तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता दोनों का संदेश देती है।

नौतपा की भीषण गर्मी में, जब अधिकांश लोग सुविधाओं और आराम की तलाश में रहते हैं, तब हजारों स्वयंसेवक सामूहिक जीवन, अनुशासन और आत्मसंयम का अभ्यास करते हैं। संघ के ये प्रशिक्षण वर्ग केवल संगठनात्मक कौशल नहीं बल्कि सेवा, समर्पण और राष्ट्रभाव के संस्कार विकसित करते हैं। यही कारण है कि यहां से निकले स्वयंसेवक शिक्षा, ग्राम विकास, समाज सेवा, आपदा प्रबंधन और सांस्कृतिक जागरण जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। नौतपा की यह तपिश केवल शरीर नहीं, बल्कि व्यक्तित्व को भी तपाती है और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं का निर्माण करती है ।