कविता

व्यर्थ नहीं बहती कविता

“कविताएँ
अब भी फूटती हैं भीतर से—
जैसे चट्टानों के बीच
अदृश्य जलस्रोत।

पर जीवन,
ओह जीवन!
तुम क्यों सूखी नदी की तरह
मेरे सामने पसरे पड़े हो?

शब्दों में हरियाली है,
दिनों में बंजरपन।
स्वप्नों में उजाला है,
जागती आँखों में धूल।

मैंने चाहा था
एक साधारण प्रसन्नता—
रोटी की गर्म भाप,
कंधे पर रखा भरोसे का हाथ,
और सांझ में लौटती थकान की शांति।

पर मिला—
अधूरे पतों का शहर,
टूटे वादों की गलियाँ,
और भीड़ में खोती हुई पहचान।

फिर भी
कविता आती है।

जब रात
अपना काला आँचल फैलाती है,
मेरी खिड़की पर
एक पंक्ति चुपचाप बैठ जाती है।

जब दर्द
हड्डियों के भीतर
धीरे-धीरे नमक बनता है,
एक रूपक जन्म लेता है।

क्या यह विफलता है—
कि जीवन हार गया
पर शब्द बच गए?

या यह मुक्ति है—
कि भीतर का मनुष्य
अब भी बोल सकता है?

मैंने अपनी पराजयों को
स्याही में घोला,
और वे
नीले आकाश की तरह फैल गईं।

मेरी चुप्पियाँ
पंक्तियों में बदल गईं,
मेरे आँसू
लयों में।

जीवन शायद
मेरे पक्ष में नहीं था,
पर भाषा ने
मुझे त्यागा नहीं।

इसलिए मैं लिखता हूँ—
न जीत के लिए,
न स्मारक के लिए,
न अमरता के लिए।

मैं लिखता हूँ
ताकि यह प्रमाण रहे—
कि मैं जीवित था,
मैंने महसूस किया,
और विफलताओं के बीच भी
सौंदर्य को जन्म लेते देखा।

कविताएँ बहती रहें—
यदि जीवन रुक भी जाए।”