कविता/ हाथी का दांत

एक दिन वो मिली रास्ते में

अपनी भतीजी के साथ

जिसे मैंने पढाई छोड़ते वक्त

 

‘कृष्णकली’ भेंट की थी.

 

मेरा परिचय उससे उसने दिया

 

”बेटा ये मेरे साथ पढ़ें हैं”.

 

भतीजी तीन-चार साल की

समझ ना पाई कि

साथ पढ़े होना कौन सा रिश्ता है.

 

वो पूछ बैठी उससे

 

”मैं इन्हें क्या कहूँ मौसी?”

 

वो पहले अचकचाई, फिर

 

अपने आस-पास बहुतों को देखकर बोली

 

”मामा”

 

किन्तु मैंने उसकी आँखों में

 

देख लिया था

 

हाथी का दिखाने का दांत

 

जो ‘मामा’ में दिख रहा था.

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अखिल कुमार ‘भ्रमर’

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