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    पुलिस एनकाउंटर और उठते सवाल ?

                          प्रभुनाथ शुक्ल 

    मध्यप्रदेश के उज्जैन में गिरफ्तारी के चौबीस घंटे के भीतर  दुर्दांत अपराधी विकास दुबे एनकाउंटर में मार गिराया गया। इस घटना ने हैदराबाद की याद ताजा कर दिया है। जिसमें एक पशु डाक्टर के साथ बलात्कार करने वाले आरोपियों के पुलिस ने हिरासत में लेने के बाद भी मार गिराया था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर आदमी के अपने न्यायिक और मानवीय अधिकार हैं। लेकिन हैदराबाद और यूपी की घटना ने समाज में मानवीय अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दिया है। यूपी में कानपुर की घटाना के बाद तकरीब दर्जन भर से अधिक एनकाउंटर हुए हैं। सभी एनकाउंटर एक थीम पर हैं कि बदमाश पुलिस पर का हथियार छीनकर भाग रहे थे या फ़िर पुलिस पर फायरिंग कर रहे थे। जब पुलिस इतनी कमजोर है तो पुलिस होने का फ़िर मतलब क्या है ? 
      विकास दुबे मारा गया अच्छा हुआ। हम किसी अपराधी का समर्थन नहीँ करते हैं। कानपुर में 02 जुलाई की जघन्य हिंसा के बाद पुलिस विकास से जुड़े अब तक पांच करीबियों को ढेर कर चुकी है। जबकि पूरी यूपी में कई दूसरे बदमाशों को स्वर्ग का सैर करा चुकी है। उज्जैन में विकास की गिरफ्तारी के बाद यह तय मना जा रहा था कि विकास पुलिस की गोली का शिकार बन सकता है, लेकिन इतना  सबकुछ जल्द हो जाएगा, इसकी सम्भावना कम थीं। क्योंकि पुलिस ने विकास को जिंदा पकड़ा था। हप्ते भर के दुर्दांत गुंडे को जिसे पुलिस तीस साल तक पालती आ रहीं थीं उसे क्यों मार गिराया। उसी विकास दुबे ने 20 साल पूर्व राज्यमंत्री संतोष शुक्ल की थाने में गोली मारकर हत्या कर देता है, लेकिन 20 साल तक वहीं पुलिस उसे सुरक्षा कवच देती रहीं, लेकिन अचानक सात दिन के भीतर ऐसा क्या कुछ हो गया जिसकी वजह से वह एनकाउंटर पर उतर आई। यह सच है जब ख़ुद के पैर में बिवाई फटती है तो ऐसा ही होता है। विकास की वजह से उसके आठ साथी शहीद हो चुके हैं। लेकिन पुलिस को आम आदमी की भी पीड़ा समझनी होगी। अगर यहीं पीड़ा यूपी पुलिस पहले समझ लेती तो यह स्थिति न आती। 

    मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर से उसे गिरफ्तार किया गया तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने एमपी पुलिस की पीठ थपथपाई। लेकिन इस गिरफ्तारी में एमपी पुलिस की कोई भूमिका नहीँ दिखती। सच तो है उसे महाकाल मंदिर के निजी सुरक्षा गार्डों ने दबोचा था बाद में एमपी पुलिस को सुपुर्द किया। सवाल है कि किसी गैर राज्य के अपराधी को पकड़ने वाली एमपी पुलिस क्या उसे अदालत में पेश किया था। क्या अदालत में पेशी के बाद उसे यूपी पुलिस को सौंपा गया। अगर ऐसा नहीँ किया गया तो क्यों ?  इसका जबाब एमपी पुलिस के पास है। 

    यूपी पुलिस क्या उसे अदालती पेशी के बाद ले आ रहीं थीं जिसके बाद उसका एनकाउंटर किया गया। यह सच है कि विकास हप्ते भर का दुर्दांत अपराधी था। उसने यूपी पुलिस की तागत को बौना कर दिया था। आठ पुलिस वालों की हत्या के बाद योगी सरकार घिर गई थीं। विपक्ष हमलावर है। यूपी पुलिस कानपुर की हिंसा के बाद उसे सात दिन तक नहीँ पकड़ पाई, फ़िर उसे एनकाउंटर कर बहादुरी लूटनने का कोई अधिकार नहीँ बनता है। महाकाल मंदिर में जिस विकास ने चिल्ला- चिल्ला कहा हो कि ‘मैं विकास दुबे, कानपुर वाला हूँ’ वह वह एसटीएफ के चंगुल से किस तरह हथियार छिन कर भाग जाएगा। उस हालत में जब एक सड़क हादसे में उसका पैर फैक्चर होने से ठीक ढंग से काम नहीँ कर था। वह लंगड़ा कर चलता था। 

    उज्जैन और कानपुर के बीच जो हुआ उसमें एक अहम सवाल उभर रहा है कि एसटीएफ की जिस गाड़ी में विकास था क्यों वहीं गाड़ी पलटी। दूसरी गाड़ी क्यों नहीँ पलटी। गाड़ी पलटने से उसमें कई पुलिस वाले घायल हुए हैं। फ़िर क्या विकास दुबे घायल नहीँ हुआ। वह गाड़ीपलटने बाद भी इतना जांबाज़ कैसे निकल गया कि  एसटीएफ का हथियार लेकर भागने लगा। इस तरह के कई सवाल हैं जिनका उठना लाज़मी है। उत्तर प्रदेश पुलिस इस पूरे घटना क्रम में बेहद कमजोर साबित हुई है। एक दुर्दांत अपराधी एक जघन्य अपराध को अंजाम देकर आराम से निकल जाता है। 

    यूपी की एनकाउंटर स्पेस्लिट पुलिस उसे पकड़ नहीँ पाती है। वह हरियाणा से होता हुआ मध्यप्रदेश तक की 1200 किमी की यात्रा तय कर लेता है। विकास की गिरफ्तारी के लिए 100 से अधिक टीमें लगी थीं। अनगिनत सर्विलांस और खुफिया के लोग सक्रिय थे। पोस्टर अभियान चलाया था। जंगल- झाड़ी और उसके सम्बन्धित ठिकानों पर छापेमारी की गई। विकास के करीबियों और ईनामी बदमाशों को ढेर किया गया। उसकी पत्नी- बेटे और रिश्तेदारों तक को हिरासत में लिया गया। लेकिन यूपी पुलिस के अलावा हरियाणा और मध्यप्रदेश पुलिस तक की पुलिस उसे गिरफ्तार नहीँ कर पाई जबकि तीनों राज्यों में भाजपा की ही सरकार है। 

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली से सख्त नाराज़ हैं। होना भी चाहिए, क्योंकि यूपी में पुलिस होने का कोइ मतलब नहीँ है। क्योंकि पुलिस अपराधियों का संरक्षण करती है। अपने ही लोगों की हत्या करवाती है। उसकी रणनीति इतनी कमजोर है कि दशकों बाद आपराधिक रिकार्ड वाले लोग खुलेआम गुंडागिरी करते हैं। थाने में राजनेताओं की हत्या कर निकल जाते हैं। 60- 60 मुकदमों के अपराधी आठ पुलिस वालों की हत्या कर तीन प्रदेशों में बेखौफ घूमते हैं,  लेकिन एक भी राज्य की पुलिस विकास दुबे जैसे लोगों की परछाई तक नहीँ कैद कर पाती।

    कानपुर के बिकरू गाँव में 02 जुलाई को गैंग आॅफ विकास और पुलिस में हुई मुठभेड़ में पुलिस इतनी कमजोर क्यों पड़ गई यह अपने आप में बड़ा सवाल है। पुलिस ने अपने ही लोगों के खिलाफ़ मुखबिरी किया।  आमने- सामने की मुठभेड़ में यूपी पुलिस एक भी बदमाश को ढेर क्यों नहीँ कर पाई ? जबकि मीडिया में यह तथ्य आए हैं कि बिकरू गाँव में पुलिस भोर में जाने वाली थीं लेकिन वह रात में ही पहुँच गई थी। जबकि पुलिस एक सीओ समेत आठ जवानों की शहादत दे बैठी। मुठभेड़ में एक भी बदमाश को नहीँ मार पाई। इससे यह साबित हो रहा है कि पुलिस की रणनीतिक और तैयारी में कहीं न कहीं बड़ी चूँक थीं। 

    उत्तर प्रदेश पुलिस विकास को मुठभेड़ में ढेर न करती तो खादी और खाकी के साथ अपराध जगत के गठजोड़ में अनगिनत चेहरे बेनकाब होते। पुलिस ने निश्चित रूप से उसे मार कर जल्दबाजी किया। कम से कम समाज के सामने इस तरह के चेहरों को लाना चाहिए था। पुलिस को यह भी कहीं न कहीं से यह डर था कि विकास अगर जिंदा रहेगा तो पुलिस महकमें और राजनीति के कई चेहरे बेनकाब होंगे। जिसकी वजह से पुलिस ने यह पूरा अध्याय ही ख़त्म कर दिया। विकास दुबे को सजा मिलानी ज़रूरी थीं, लेकिन गिरफ्तारी के बाद भी इतनी जल्दबाजी क्या थी। पुलिस ने ऐसा क्यों किया। 

    कानपुर की हिंसा के बाद जिस हिस्ट्रीशीटर विकास का नाम चौबेपुर थाने के टॉपटेन में नहीँ था। लेकिन आठ पुलिस वालों की हत्या के बाद वह वह यूपी का ‘मोस्टवांटेड’ कैसे बन गया। इसके पूर्व उसका एनकाउंटर क्यों नहीँ किया गया। यूपी पुलिस क्यों पालती- पोषती रहीं। विकास दुबे तो इस दुनिया में अब नहीँ रहा, लेकिन विकास को संरक्षण देने वाले पुलिस के अफसर, राजनेताओं का क्या चेहरा क्या जाँच में बेनकाब होगा। क्या एनकाउंटर की आड़ में सच्चाई का गलादबा दिया जाएगा। अब वक्त आ गया है जब विकास जैसे लोगों को खाद- पानी देने वाली खाकी- खादी और अपराध का गठजोड़ उजागर होना चाहिए। क्योंकि जुर्म करने वाले से अधिक गुनाहगार जुर्म को संरक्षण देने वाला होता है। पुलिस का एनकाउंटर अभियान मानवीय और न्याय के अधिकारों के खिलाफ़ है। इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। जब सारा न्याय पुलिस ही करेगी फ़िर न्याय व्यवस्था का क्या होगा ? 

    प्रभुनाथ शुक्ल
    प्रभुनाथ शुक्ल
    लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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