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योग करें, रोज करें और मौज करें

डॉ.वेदप्रकाश

 विगत दिनों विश्व योग दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के अध्यक्ष एवं आध्यात्मिक विभूति पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि-“योग केवल शरीर का व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का विज्ञान है। योग का अभ्यास केवल एक दिन नहीं अपितु जीवन का संस्कार बनना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि योग करें, रोज करें और मौज करें। सर्वविदित है कि योग भारतीय जीवन पद्धति एवं ज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। योग के आदि चिंतक महर्षि पतंजलि में अपने योगसूत्र नामक ग्रंथ में योग के महत्व, उद्देश्य एवं विविध आयामों पर विस्तार से लिखा है। प्राचीनकाल से ही गुरुकुलों में एवं जन सामान्य के बीच योग का अभ्यास जीवन पद्धति के अंग के रूप में लोकप्रिय एवं अनिवार्य रहा। तदुपरांत विभिन्न ग्रंथों में इस विषय की विस्तृत व्याख्या भी मिलती है।

आज हमें यह भी जानने में समझने की आवश्यकता है कि जैसे-जैसे ज्ञान-विज्ञान और तकनीक बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे जीवन बोझिल हो रहा है। भिन्न-भिन्न रूपों में शारीरिक और मानसिक तनाव और जीवन पद्धति में बदलाव होने के कारण शारीरिक व्याधियां भी जन सामान्य के लिए घातक होती जा रही है। ऐसे में योग हमें न केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ और सक्रिय होने में मदद करता है अपितु  यह  मानसिक रूप से भिन्न-भिन्न प्रकार की व्याधियों और दबावों से दूर रहने में भी हमें मदद करता है।
     योग के कारण ही हमारे संत और ऋषि परंपरा के अनेक लोग लंबा, स्वस्थ और प्रसन्न जीवन जीते हुए समाज और राष्ट्र कल्याण हेतु अपना योगदान करते रहे हैं। आज जब भिन्न-भिन्न रूपों में व्यक्ति की जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं, जीविकोपार्जन के लिए भी अनेक प्रकार से संघर्ष करना पड़ रहा है तब यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति योग को अपने जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना ले।


       आज हमें यह भी समझने की आवश्यकता है कि देश- दुनिया के लोग भारतीय योग, अध्यात्म एवं ज्ञान परंपरा को जानना चाहते हैं। यह किसी एक व्यक्ति की पूंजी नहीं है अपितु सम्पूर्ण मानवता की साझा धरोहर है जो विभाजन नहीं बल्कि संगम, संघर्ष नहीं बल्कि समन्वय और अशांति नहीं बल्कि आत्मशांति का मार्ग है। यह गौरव की बात है कि आज राष्ट्रीय और वैश्विक पलक पर भिन्न जाति, भिन्न संप्रदाय अथवा भिन्न धार्मिक मान्यताओं के लोग, भिन्न संस्कृतियों, भिन्न-भिन्न प्रकार की भौगोलिक परिस्थितियों के लोग खुले मन से योग को अपना रहे हैं।

योग आज सम्पूर्ण मानवता को जोड़ने वाली सबसे बड़ी वैश्विक शक्ति बन चुका है। योग बच्चे, बूढ़े, युवा, स्त्री- पुरुष सभी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। योग ही वह शक्ति है जो तन- मन को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। योग  के साथ-साथ संतुलित व पोषक आहार एवं संयमित जीवन पद्धति व्यक्ति और समाज को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है। जब व्यक्ति और समाज स्वस्थ होगा तो विकसित राष्ट्र की राह और वैश्विक मानवता के कल्याण की भावना भी पुष्ट होगी। इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा और संत परंपरा के संदेश को समझें, स्वयं की शारीरिक, मानसिक आवश्यकता के साथ-साथ राष्ट्रीय एवं वैश्विक आवश्यकता बन चुके योग के महत्व को जानें और इसका व्यापक प्रचार प्रसार करें।


      युवाओं के लिए योग के क्षेत्र में रोजगार के अनेक अवसर खुल रहे हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों के साथ-साथ सामाजिक जीवन और वैश्विक फलक पर योग की स्वीकार्यता बढ़ने से योग के प्रशिक्षित अभ्यासियों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसलिए इस मांग को पूरा करने के लिए हम तैयार हों और योग का सही अर्थ जन जन तक पहुंचाएं।


     ध्यान रहे योग केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन जीने की सर्वोत्तम कला है। आइए, योग को केवल एक दिवस का उत्सव नहीं बल्कि जीवन का संस्कार बनाएँ। साथ ही पूज्य चिदानंद सरस्वती जी द्वारा दिए गए इस सूत्र का व्यापक प्रचार करें- योग की डोज-हर रोज, योग करें- निरोग रहें एवं योग करें, रोज करें और मौज करें…।

( अदिति फीचर्स )


डॉ.वेदप्रकाश