राजनीति

2027 की तैयारी : उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ बनाम ‘हार्ड हिंदुत्व’ का नया अध्याय

डॉ. शैलेश शुक्ला 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक नई बहस छिड़ी हुई है — और यह बहस अगले साल फरवरी-मार्च 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों का पहला संकेत है। 5 अप्रैल 2026 को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के इटावा में यमुना के किनारे केदारेश्वर महादेव मंदिर निर्माण की खबर सामने आई। इस मंदिर को उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर से एक इंच नीचे बनाया जा रहा है, दक्षिण भारतीय शैली में, तमिलनाडु के कारीगरों द्वारा, कृष्णशिला पत्थर से। अखिलेश ने इसे ‘दैवीय प्रेरणा का निर्णय’ बताया है और इसका उद्घाटन अगस्त 2026 में होना है — चुनाव से ठीक पहले। भाजपा के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने इसे ‘भाजपा के डर से मंदिर बनाना’ कहा। सपा का जवाब था कि पार्टी का संविधान में आस्था है और सबको अपनी आस्था का अधिकार है।

यह प्रसंग उत्तर प्रदेश की राजनीति की उस गहरी जटिलता को उजागर करता है जिसे समझे बिना 2027 के चुनाव को नहीं समझा जा सकता। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 255 सीटें जीती थीं लेकिन 57 सीटें खोई भी थीं। सपा ने 111 सीटें जीतीं — 2017 की 47 से दोगुने से ज़्यादा। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से सपा ने 37 और भाजपा ने 33 सीटें जीतीं — यानी सपा ने भाजपा से अधिक सीटें पाईं। यह सत्ता-परिवर्तन नहीं था, लेकिन यह एक स्पष्ट चेतावनी थी। अखिलेश के पीडीए — पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक — सूत्र ने एक नया राजनीतिक समीकरण बनाया जिसने भाजपा की जाति-आधारित एकजुटता को चुनौती दी।

भाजपा की भीतरी कमज़ोरी का एक कारण यह भी है कि उत्तर प्रदेश में ओबीसी और दलित मतदाता सत्ता के गलियारों में अपना प्रतिनिधित्व कम पाते हैं। भाजपा की सहयोगी अनुप्रिया पटेल ने कई बार योगी सरकार पर ओबीसी और एससी/एसटी उम्मीदवारों को साक्षात्कार आधारित नियुक्तियों में अयोग्य ठहराने का आरोप लगाया था। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने स्वयं नियुक्ति विभाग को पत्र लिखकर ओबीसी, एससी और एसटी चयन के आँकड़े सार्वजनिक करने की माँग की थी। ये आंतरिक असंतुष्टियाँ भाजपा के लिए 2027 में खतरनाक साबित हो सकती हैं।

योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक रणनीति में इन दिनों एक उल्लेखनीय बदलाव दिख रहा है। ‘बुलडोज़र बाबा’ की छवि से अब वे आर्थिक सुधारक की छवि की ओर बढ़ रहे हैं। विधान परिषद में राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान उन्होंने आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय में वृद्धि, वृद्ध, दिव्यांग और विधवाओं की पेंशन में बढ़ोतरी की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश ‘भय क्षेत्र’ से ‘विश्वास क्षेत्र’ बन गया है। 2017 से अब तक कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ — यह उनके शासन की केंद्रीय उपलब्धि है। रक्षा विनिर्माण गलियारे, एक्सप्रेसवे और अयोध्या-वाराणसी-मथुरा के धार्मिक पर्यटन अर्थव्यवस्था का विकास — ये उनके 2027 के चुनावी आख्यान के स्तंभ हैं।

इस पृष्ठभूमि में नक्सलवाद की समाप्ति की घोषणा का उत्तर प्रदेश के लिए एक सांकेतिक अर्थ भी है। बुंदेलखंड जो कभी बैंडिट क्वीन और दस्यु-समस्या के लिए जाना जाता था, और जो विकास की दौड़ में पिछड़ा हुआ था — वहाँ बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और अन्य परियोजनाओं ने ज़मीनी बदलाव किया है। लेकिन किसान आंदोलन की याद अभी भी ताज़ी है, बेरोज़गारी की समस्या अभी भी गहरी है, और उज्ज्वला योजना के लाभार्थी आज एलपीजी महँगाई से परेशान हैं — ये सब 2027 में भाजपा के लिए चुनौती बनेंगे।

अखिलेश यादव की सपा ने 2024 के चुनाव से जो आत्मविश्वास पाया है उसे 2027 में सत्ता तक पहुँचाना आसान नहीं होगा। कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में लगभग समाप्त होना, बसपा का निरंतर क्षरण — ये दोनों तथ्य एक ओर सपा के लिए अवसर हैं तो दूसरी ओर यह खतरा भी है कि अल्पसंख्यक मतदाताओं के एकत्रीकरण का ‘हिंदुत्व विरोधी’ तमगा उन्हें हिंदू मतदाताओं से दूर कर सकता है। केदारेश्वर मंदिर निर्माण इसी चिंता का प्रतिफल है — ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की एक कोशिश जो हिंदू मतदाताओं को संदेश दे कि सपा धर्म-विरोधी नहीं है।

उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा क्षेत्रों वाले इस राज्य में — जो देश की सबसे अधिक लोकसभा सीटें (80) भेजता है — हर चुनाव एक राष्ट्रीय जनमत संग्रह भी होता है। यहाँ की जनता का निर्णय दिल्ली की सत्ता को हिला सकता है। 2017 में भाजपा ने 312 सीटें जीतकर जो इतिहास रचा था, 2022 में उसे 255 पर संतोष करना पड़ा। अगर 2027 में सपा का पीडीए सूत्र अपेक्षित मतदाता समूहों को एकजुट कर सका, और अगर महँगाई का बोझ सत्ताविरोधी लहर में बदल सका, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक नया अध्याय शुरू हो सकता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि योगी आदित्यनाथ — जो 2017 से अब तक उत्तर प्रदेश के सबसे लंबे समय तक सेवारत मुख्यमंत्री हैं — अपनी ज़मीनी पकड़, आरएसएस की संगठन शक्ति और भाजपा के विशाल संसाधनों के साथ कोई आसान प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं।

डॉ. शैलेश शुक्ला