लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


भारत में भाग्य के सहारे जीने वालों की संख्या कम नहीं है। हर जगह भाग्य वांचने वालों की चाँदी है। भाग्य के सहारे लोग दिन में भी टाटा-बिरला बनने के सपने देखने से गुरेज नहीं करते हैं। इस तरह के माहौल में कर्म पर भरोसा बिरले ही करते हैं। उन बिरलों में से ही एक है-22 साल की अनीता कुमारी।

अनीता कुमारी की वजह से मुज्जफरपुर जिला का पातीसा गाँव आज पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस गाँव को अब सभी लोग ”शहद के गाँव” के नाम से जानने लगे हैं। शाही लीची के लिए प्रसिद्व रहा मुज्जफरपुर अब अच्छी गुणवत्ता वाले शहद के उत्पादन के लिए भी जाना जाने लगा है। अनीता शहद का ब्रांड आज देश-विदेश में लोकप्रिय हो चुका है।

अनीता कुमारी की सफलता की कहानी तकरीबन 8 साल पहले शुरु हुई थी और वह भी शहद के दो बक्सों से। अनीता का उद्देश्‍य था सिर्फ अपने पिता की आमदनी को बढ़ाना। शुरुआती दौर में अनीता की आमदनी मात्र 10000 रुपये थी। धीरे-धीरे उसकी सफलता का कारवां आगे बढ़ता गया।

शहद के 2 बक्सों से अपना कार्य शुरु करने वाली अनीता आज 250 बाक्स शहद का उत्पादन कर रही है। पिछले साल यानि 2009 में अनीता की आमदनी 150000 लाख रुपये थी।

2006 तक गुमनामी की जिंदगी जीने वाली अनीता कुमारी आज की तारीख में महिला सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बन चुकी है। आलम यह है कि अनीता की सफलता की कहानी एनसीआरटी टेक्सटबुक में चौथी की कक्षा के छात्रों को ”अनीता और शहद” के शीर्षक से पढ़ाई जा रही है। उल्लेखनीय है कि गुमनामी की दुनिया से पहचान की दुनिया में अनीता को लाने का काम किया था यूनिसेफ ने। अब तो हर तरफ अनीता के सफलता की कहानी कही जा रही है।

वैसे अनीता का सफर इतना आसान नहीं था। अनीता का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ लड़की को हिकारत की नजरों से देखा जाता था। लड़की को पढ़ाने की कल्पना कोई सपने में भी नहीं कर सकता था। इतना ही नहीं उस गाँव की लड़कियाँ प्राथमिक स्कूल से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाती थी।

अनीता के पिता जर्नादन प्रसाद की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी वे ढंग से नहीं कर पाते थे। जब अनीता ने पढ़ाई करने की बात अपने पिता से कही तो घर में भूचाल सा आ गया। भारी विरोध के बावजूद अनीता ने प्राथमिक शाला में अपना दाखिला करवाया, जबकि उस पर भी नौकरानी के रुप में माँ की तरह काम करने का दबाव था। हालांकि उस बुरे वक्त में भी उसके 2 बड़े भाई, पिताजी और माँ की मदद करने की बजाए, मटरगष्ती किया करते थे।

पातिसा गाँव में महिलाओं द्वारा शहद के उत्पादन की परम्परा काफी पुरानी है। एक अरसे से उस गाँव में महिलाएँ छोटे पैमाने पर शहद का उत्पादन करती आ रही हैं।

गाँव में नर्िवत्तामान सकारात्मक वातावरण को देखकर अनीता को लगा कि शहद के उत्पादन के जरिए उसकी और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है। अनीता ने अपने पिता से इस मुद्वे पर बात की। उसके पिता जर्नादन प्रसाद को अपनी बेटी पर पूरा  भरोसा था। लिहाजा उन्होंने अनीता को एक मौका देने का फैसला किया और अनीता भी अपने पिता के भरोसे पर खरी उतरी।

अनीता ने अपने इस अभियान में पूसा कृषि विश्‍वविद्यालय के लगातार संपर्क में रही। उसे कई प्रकार की सहायता इस विश्‍वविद्यालय से मिली। उस गाँव में पहले देसी तरीके से शहद का उत्पादन किया जाता था। पूसा कृषि विश्‍वविद्यालय की बदौलत से वहाँ अधतन और वैज्ञानिक पद्धति से शहद का उत्पादन किया जाने लगा।

फिलहाल अनीता समाजशास्त्र से स्नात्ताकोत्तर की पढ़ाई कर रही है। उसे पूसा कृषि विष्वविद्यालय से शहद के उत्पादन के लिए पुरस्कार भी मिल चुका है।

अनीता कहती है कि शुद्ध शहद की पहचान करने के लिए शहद को एक ग्लास पानी में डालना चाहिए। यदि शहद ग्लास के निचले तल में जाकर बैठ जाता है और वह पानी के साथ नहीं घुलता है तो उसे शुद्ध शहद माना जाता है।

अपने आरंभिक दिनों में चौतरफा विरोध को झेलने वाली अनीता के साथ आज उसका पूरा परिवार साथ है। आज परिवार के सभी सदस्य मिल-जूल कर शहद का उत्पादन कर रहे हैं।

पातिसा गाँव में मधुमक्खी मुख्यरुप से अपना छत्ता सरसों, सूरजमुखी और लीची के बागानों में लगाते हैं। इस गाँव में बहुतायात रुप में इन फसलों की खेती जाती है। मधुमक्खी छत्ता लगाने का काम अक्टूबर, नवम्बर, मार्च और जून -जुलाई में करते हैं।

इस कार्य को अमलीजामा पहनाने के लिए कच्चा माल पोलेन एवं नेक्टर सरसों और सूरजमुखी के फूलों से प्राप्त किया जाता है। बक्सों को नेक्टर से युक्त फूलों के नजदीक रखा जाता हैं। कुछ ही दिनों के बाद एक बक्से में 30000-35000 मधुमक्खी जमा हो जाते हैं।

अनीता से प्रेरित होकर आज पातिसा गाँव की हर औरत शहद का उत्पादन कर रही है। पूरा गाँव तकरीबन प्रतिवर्ष 10000 क्विंटल शहद का उत्पादन कर रहा है।

अब अनीता चाहती है कि उसके गाँव में प्रोसेसिंग सेंटर की स्थापना की जाए। अनीता ब्रांड का पेटेंट हो, ऐसी चाहत से भी आज वह लबरेज है। उसका कहना है मार्केटिंग की सुचारू रूप से व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि उनको पूरी तरह से उनकी मेहनत का लाभ मिल सके। फिलहाल कंपनियाँ अपनी शर्तों पर शहद खरीदती हैं। बिचौलियों से पूरा बाजार भरा पड़ा है। राज्य सरकार से उनको कोई मदद नहीं मिल पा रही है।

ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में अनीता और उस गाँव की अन्य महिलाओं को उनकी मेहनत का पूरा प्रतिफल नहीं मिल पा रहा है। जरुरत है कि बिहार सरकार महिला सशक्तिकरण के इस महत्ती कार्य में आगे आकर उनके सपनों को साकार करने में उनकी सहायता करे।

One Response to “शहद की रानी- अनीता कुमारी”

Leave a Reply to gautam chaudhary Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *