राजनीति सार्थक पहल स्‍वास्‍थ्‍य-योग

लोक चिकित्सा की ओर लौटता राजस्थान

अमरपाल सिंह वर्मा

राजस्थान के आदिवासी इलाकों में इन दिनों एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। राज्य सरकार ने सदियों से जड़ी-बूटियों और पारंपरिक चिकित्सा का ज्ञान रखने वाले ‘जनजाति गुणीजनों’ और ‘देसी वैद्यों’ की पहचान का अभियान शुरू किया है। उद्देश्य केवल उनकी पहचान करना भर नहीं है बल्कि उनके अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोडऩा भी है।

सरसरी तौर पर यह एक सरकारी योजना भर लग सकती है लेकिन यदि इसे गंभीरता से देखा जाए तो यह स्वास्थ्य सेवा के मामले से आगे की बात है। दरअसल, यह उस ज्ञान परंपरा को  पहचानने की शुरुआत है, जिसे हमने आधुनिकता की दौड़ में लगभग भुला दिया है। राजस्थान के भील, गरासिया, सहरिया, मीणा और अन्य जनजातीय समुदायों में आज भी ऐसे अनेक गुणीजन मिल जाते हैं जिन्हें आसपास उगने वाली जड़ी-बूटियों, पेड़-पौधों, कंद-मूल और औषधीय वनस्पतियों की अद्भुत जानकारी होती है। उन्हें यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय से नहीं मिला है। उनमें यह अनुभव, प्रकृति के साथ लंबे सह-अस्तित्व और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपरा से विकसित हुआ है। कभी गांवों में बुखार, मोच, घाव, सांप-बिच्छू के काटने, प्रसव के बाद की देखभाल या कई सामान्य बीमारियों के लिए लोग सबसे पहले ऐसे ही गुणीजनों के पास जाते थे। वे केवल दवा नहीं देते थे बल्कि मरीज, परिवार और स्थानीय परिस्थितियों को समझ कर उपचार करते थे। ग्राम्य समाज में उनका स्थान किसी चिकित्सक से कम नहीं माना जाता था।

लेकिन बदलते परिवेश में आधुनिक चिकित्सा ने असंख्य लोगों का जीवन बचाया और स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव लाए। अस्पताल बढ़े, नई-नई दवाएं आईं, नई तकनीक विकसित हुई। यह निश्चय ही मानव सभ्यता की बड़ी उपलब्धि है लेकिन इस उपलब्धि के साथ हमने पारंपरिक ज्ञान की विरासत के रूप में बहुत कुछ खो दिया। क्योंकि इसी दौर में यह मान लिया गया कि जो ज्ञान मेडिकल कॉलेजों में नहीं पढ़ाया जाता, उसका कोई महत्व नहीं है। धीरे-धीरे लोक चिकित्सा और पारंपरिक ज्ञान को या तो अंध विश्वास मान लिया गया या फिर उसे पिछड़ेपन का प्रतीक समझा जाने लगा। यह एक ऐसा दृष्टिकोण था, जिसे संतुलित नहीं कहा जा सकता। माना कि हर पारंपरिक उपचार सही नहीं हो सकता। यह भी सच है कि हर देसी वैद्य वैज्ञानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता लेकिन हर पारंपरिक ज्ञान को बिना जांचे-परखे खारिज कर देने को भी सही नहीं ठहराया जा सकता। 

राजस्थान सरकार की नई पहल इसी कारण महत्वपूर्ण दिखाई देती है। सरकार गुणीजनों को स्वतंत्र चिकित्सक घोषित नहीं कर रही बल्कि उन्हें आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का सहयोगी बनाने की कोशिश कर रही है। वे गांवों में मरीजों की शुरुआती पहचान करते हैं। अब इन्हें ये सिखाया जाएगा कि वह जरूरत पडऩे पर कैसे टेली मेडिसिन के जरिए सैटेलाइट सेंटर और एम्स के विशेषज्ञ चिकित्सकों से वीडियो कॉल पर संपर्क कर मरीजों की स्थिति की जानकारी साझा कर सकते हैं। यानी परंपरा और आधुनिक चिकित्सा को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। यदि यह प्रयोग सावधानी के साथ आगे बढ़ता है तो निश्चय ही इसके कई सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। सबसे पहला लाभ उन दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों को होगा जहां के लोगों की आज भी विशेषज्ञ डॉक्टरों तक पहुंच आसान नहीं है। ऐसे इलाकों में अगर स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित और पंजीकृत गुणीजन प्रारंभिक स्वास्थ्य सलाह देने के साथ मरीजों को सही समय पर विशेषज्ञ डॉक्टरों तक पहुंचा सकें तो कई गंभीर बीमारियों की पहचान समय रहते होना संभव है।

इसके साथ-साथ दूसरा बड़ा लाभ उस पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का होगा, जो तेजी से समाप्त हो रहा है। दुर्भाग्य है, आज अनेक बुजुर्ग गुणीजन अपने साथ एक पूरी ज्ञान-परंपरा लेकर विदा हो रहे हैं। उनके बाद उस ज्ञान को संभालने वाला कोई नहीं बच रहा। इस पांरपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने की जरूरत है। यदि अभी भी यह नहीं किया गया तो आने वाली पीढिय़ां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी गांवों में ऐसे लोग हुआ करते थे जो जंगल की वनस्पतियों से उपचार करते थे। स्वास्थ्य के साथ-साथ इस पहल का एक पर्यावरणीय पक्ष भी है। गुणीजनों का ज्ञान केवल रोगों तक सीमित नहीं होता। ऐसे लोग भली-भांति जानते हैं कि कौनसी औषधीय वनस्पति किस मौसम में मिलती है, किस पौधे की जड़ निकालनी चाहिए और किसे नहीं छूना चाहिए, कौन-सा पेड़ काटने से पूरा क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। यानी उनके पास जैव विविधता का ऐसा व्यावहारिक ज्ञान होता है जिसे आज संरक्षित करने की आवश्यकता है।

हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में सावधानी भी उतनी ही जरूरी होगी। केवल लोक विश्वास के आधार पर किसी उपचार को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हर दावे का वैज्ञानिक परीक्षण होना चाहिए। मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि रहनी चाहिए। गुणीजनों का प्रशिक्षण, पंजीकरण और जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए। अगर परंपरा का सम्मान और विज्ञान का अनुशासन दोनों साथ-साथ चलेंगे, तभी यह प्रयोग सफल एवं कारगर साबित होगा। दरअसल, यह मुद्दा केवल स्वास्थ्य का नहीं है। यह उस मानसिकता का भी सवाल है जिसमें हम अपने ही समाज के अनुभवजन्य ज्ञान को कमतर आंकते रहे हैं। पूरी दुनिया आज स्थानीय ज्ञान, पारंपरिक चिकित्सा और जैव विविधता संरक्षण पर नए सिरे से काम कर रही है। ऐसे समय में यदि राजस्थान की सरकार अपने गुणीजनों को पहचानने और उनके ज्ञान को संरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है तो इसे केवल एक सरकारी योजना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।  इस योजना में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की प्रमाणिकता और जनजातीय समाज के ज्ञान का संतुलित मेल करना निहित है। इससे न केवल दूरदराज के लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर ढंग से पहुंचेंगी बल्कि राजस्थान अपनी उस अमूल्य विरासत को भी बचा सकेगा जो धीरे-धीरे हमारे हाथों से फिसलती जा रही है। यदि यह पहल अपनी मूल भावना के अनुरूप आगे बढ़ती है है तो यह केवल गुणीजनों की पहचान नहीं करेगी बल्कि हमारी उस ज्ञान-परंपरा को भी नया जीवन दे सकती है जिसे हम धीरे-धीरे भुलाते जा रहे हैं।

अमरपाल सिंह वर्मा