गजेन्द्र सिंह
गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के सर्वाधिक कालजयी कवियों में से एक हैं। मध्यकाल से लेकर आज तक तुलसीदास की सर्जना ने जिस व्यापकता और गहराई से काव्य-रसिकों, भक्तों, साहित्यकारों और आलोचकों को आकर्षित किया है, वह अद्वितीय है। तुलसीदास केवल एक भक्त कवि नहीं हैं; वे भारतीय समाज, संस्कृति, लोकजीवन और मानवीय मूल्यों के ऐसे कवि हैं, जिनकी रचनाएँ समय की सीमाओं को पार कर आज भी उतनी ही प्रासंगिक दिखाई देती हैं।
तुलसीदास के साहित्य पर देश-विदेश में विपुल शोध हुआ है। उनके जीवन, दर्शन, काव्य, भाषा, भक्ति-दृष्टि और सामाजिक चिंतन पर अनेक शोध-प्रबंध लिखे गए हैं तथा सैकड़ों आलोचनात्मक ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। इसके बावजूद तुलसी-साहित्य की संभावनाएँ समाप्त नहीं हुई हैं। बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि तुलसी को जितना पढ़ा गया है, उतना ही उनके भीतर नए अर्थों और नई व्याख्याओं के द्वार खुलते गए हैं। अनुसंधान और आलोचना की इस विस्तृत और दीर्घ परंपरा के बावजूद तुलसी-साहित्य आज भी शोधार्थियों, अध्येताओं और साहित्य-प्रेमियों के लिए एक चुनौती बना हुआ है। इसका कारण यह है कि तुलसी का साहित्य केवल धार्मिक आख्यान नहीं है। उसमें दर्शन है, लोकनीति है, सामाजिक चेतना है, मानवीय मनोविज्ञान है, नैतिकता है और भारतीय जीवन-दृष्टि का व्यापक स्वरूप है। तुलसी को केवल भक्त कवि के रूप में सीमित कर देना उनके विराट साहित्यिक व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा।
भारतीय जनमानस में राम की जो छवि आज दिखाई देती है, उसे व्यापक लोकस्वीकृति दिलाने में तुलसीदास की भूमिका असाधारण है। राम भारतीय परंपरा में तुलसी से पहले भी थे, लेकिन तुलसी ने राम को संस्कृत के शास्त्रीय आख्यानों से निकालकर जन-जन के जीवन का हिस्सा बना दिया। वाल्मीकि के राम मर्यादा और आदर्श के महानायक हैं, जबकि तुलसी के राम लोकमंगल, करुणा, मर्यादा, धर्म और मानवीय संवेदना के साथ जनजीवन में उतरते हैं। तुलसी ने राम को केवल अयोध्या के राजा या धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में नहीं प्रस्तुत किया, बल्कि उन्हें ऐसे आदर्श के रूप में स्थापित किया, जिसमें व्यक्ति, परिवार, समाज और शासन सभी के लिए मार्गदर्शन दिखाई देता है। इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि तुलसी के बिना राम अधूरे हैं और राम के बिना तुलसी की काव्य-साधना भी अधूरी है। दोनों का संबंध केवल कवि और पात्र का संबंध नहीं है; यह भारतीय सांस्कृतिक चेतना के निर्माण का संबंध है।
तुलसीदास की साहित्यिक साधना अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। उनकी प्रमुख रचनाओं में रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली और हनुमान चालीसा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। रामचरितमानस अवधी में रचित उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रबंध-काव्य है, जिसने श्रीराम की कथा को भारतीय जनमानस में गहराई से प्रतिष्ठित किया। विनय पत्रिका में भक्त और भगवान के बीच आत्मसमर्पण, विनय और भक्ति की अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति मिलती है, जबकि कवितावली और गीतावली में ब्रजभाषा के माध्यम से भक्ति, नीति और भाव-सौंदर्य का प्रभावशाली चित्रण हुआ है। दोहावली में जीवन-दर्शन, नीति और भक्ति से जुड़े गहन विचार संक्षिप्त और प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुए हैं तथा हनुमान चालीसा ने तुलसी की भक्ति को जन-जन तक पहुंचाने में असाधारण भूमिका निभाई है। इन सभी रचनाओं में तुलसीदास के व्यक्तित्व, उनकी रामभक्ति, लोकमंगल की भावना, समन्वयवादी दृष्टि और मानवीय संवेदना के विविध आयाम एक साथ दिखाई देते हैं।
तुलसी के काव्य का भाव पक्ष मूलतः रामभक्ति पर आधारित है, लेकिन उनकी भक्ति केवल व्यक्तिगत मुक्ति या आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहती। उनके राम मर्यादा, करुणा, सेवा, त्याग और धर्म के आदर्श हैं। इसी कारण तुलसी की भक्ति जीवन और समाज से जुड़ जाती है। उनके साहित्य में लोकमंगल की भावना अत्यंत प्रबल है। धर्म उनके लिए केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि ऐसा जीवन-मूल्य है जो व्यक्ति, परिवार और समाज के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। रामराज्य की उनकी कल्पना में न्याय, सुरक्षा, समृद्धि, नैतिकता और सामाजिक संतुलन के तत्व दिखाई देते हैं। इसके साथ ही तुलसी की सबसे बड़ी विशेषताओं में उनकी समन्वयवादी दृष्टि है। उन्होंने ज्ञान और भक्ति, लोक और शास्त्र, वैराग्य और गृहस्थ जीवन तथा शैव और वैष्णव परंपराओं के बीच एक व्यापक सांस्कृतिक समन्वय स्थापित किया। उनके काव्य में मानवीय संवेदना भी उतनी ही गहरी है। राम, सीता, भरत, लक्ष्मण, हनुमान, निषादराज जैसे पात्रों के माध्यम से उन्होंने प्रेम, त्याग, कर्तव्य, करुणा, मित्रता, सेवा और मानवीय संबंधों के अनेक आयामों को अभिव्यक्त किया। यही कारण है कि तुलसी का साहित्य केवल भक्ति का साहित्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों और लोकचेतना का व्यापक दस्तावेज बन गया है।
तुलसीदास की साहित्यिक महानता केवल उनके विचारों में नहीं, बल्कि उनकी अभिव्यक्ति-कला में भी दिखाई देती है। उन्होंने जनभाषाओं को साहित्य की प्रतिष्ठित भाषा बनाया। रामचरितमानस में अवधी तथा विनय पत्रिका और कवितावली जैसी रचनाओं में ब्रजभाषा का प्रभावी प्रयोग मिलता है। दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त आदि छंदों का उनका प्रयोग अत्यंत स्वाभाविक और प्रभावशाली है। उपमा, अनुप्रास और अन्य अलंकारों का प्रयोग उनके काव्य में भावों की अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावपूर्ण बनाता है। तुलसी के साहित्य में प्रबंध और मुक्तक दोनों शैलियों का सुंदर समन्वय मिलता है। कथा कहने की उनकी क्षमता इतनी प्रभावशाली है कि रामचरितमानस केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि लोकजीवन में गाई, सुनी और जी जाती है।
आज जब समाज तेजी से बदल रहा है, तब तुलसी का साहित्य हमें केवल अतीत की ओर देखने के लिए नहीं कहता, बल्कि वर्तमान को समझने की दृष्टि भी देता है। परिवार में संबंधों का संकट हो, सामाजिक तनाव हो, नैतिक मूल्यों का प्रश्न हो या शासन और लोककल्याण की चर्चा तुलसी के साहित्य में इन सभी विषयों पर विचार के सूत्र मिलते हैं। तुलसी की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वे किसी एक युग, वर्ग या समुदाय के कवि बनकर नहीं रह गए। वे भारतीय लोकचेतना के कवि बन गए। उनकी चौपाइयाँ गांवों से लेकर महानगरों तक, मंदिरों से लेकर घरों तक और धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर साहित्यिक विमर्शों तक आज भी जीवित हैं। इसलिए तुलसी का अध्ययन केवल साहित्य का अध्ययन नहीं है। यह भारतीय समाज, संस्कृति, दर्शन, लोकजीवन और मानवीय मूल्यों को समझने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
तुलसी को जितना पढ़ेंगे, राम उतने ही व्यापक दिखाई देंगे; और राम को जितना समझेंगे, तुलसी की काव्य-साधना की विराटता उतनी ही स्पष्ट होगी। शायद यही कारण है कि सदियाँ बीत जाने के बाद भी तुलसी हमारे बीच हैं क्योंकि उन्होंने राम की कथा नहीं मात्र लिखी, बल्कि राम को भारतीय जनमानस की चेतना में प्रतिष्ठित कर दिया।
गजेन्द्र सिंह